कई रोज़ हुए मुझे तुम्हारा कोई ख़त नहीं मिला।
पहले तो मैं हर सुबह दरवाज़े की आहट पर चौंक जाता था, जैसे डाकिए के हाथों में तुम्हारे शब्द चले आ रहे हों। फिर धीरे-धीरे इंतज़ार आदत बन गया और आदत के बाद एक ख़ामोशी। अब तो हालत यह है कि कभी-कभी अपने ही मन को समझाना पड़ता है कि शायद तुम व्यस्त होगे, शायद रास्ते बदल गए होंगे, या शायद तुम्हें मेरा पता ही याद न रहा हो।
ख़ैर, छोड़ो।
शिकायतें हमेशा दूरियों को और लंबा कर देती हैं। इसलिए आज शिकायत नहीं करूंगा। बस इतना बताने आया हूं कि मैं अब तुम्हारे शहर में हूं।
अजीब बात है न? कभी तुम्हारे शहर तक पहुंचना एक सपना लगता था। सोचता था कि जिस दिन यहां आऊंगा, तुम सामने मिलोगे। उन गलियों में साथ चलेंगे जिनका ज़िक्र तुम अपने ख़तों में किया करते थे। उन रास्तों को देखूंगा जिन्हें तुमने अपनी आंखों से देखा था। उन पेड़ों की छांव में बैठूंगा जिनके नीचे बैठकर तुमने कभी मुझे याद किया होगा।
लेकिन देखो, नियति भी कैसी है।
मैं तुम्हारे शहर में हूं, तुम्हारी हवाओं के बीच हूं, उन्हीं रास्तों पर चल रहा हूं जहां शायद कभी तुम्हारे कदम पड़े होंगे, मगर फिर भी तुमसे मिल नहीं पाया। और सबसे विचित्र बात यह है कि यहां आकर भी मैं तुमसे आमने-सामने बात नहीं कर रहा, बल्कि तुम्हें ख़त ही लिख रहा हूं।
शायद कुछ रिश्ते ऐसे ही होते हैं। उनके बीच की दूरी किलोमीटरों से नहीं नापी जाती। कभी-कभी दो लोग एक ही शहर में होते हैं और फिर भी उनके बीच वर्षों का फ़ासला होता है। और कभी कोई बहुत दूर होकर भी हर पल हमारे साथ रहता है।
आज शाम मैं शहर की एक सड़क पर अकेला चल रहा था। लोग अपने-अपने कामों में व्यस्त थे। दुकानों पर रोशनी थी, चाय की भाप हवा में घुल रही थी, बच्चे खेल रहे थे, और मैं भीड़ के बीच खड़ा होकर तुम्हें याद कर रहा था। अचानक लगा कि अगर इस वक्त तुम सामने आ जाओ तो शायद मैं कुछ कह ही न पाऊं। जो बातें बरसों से मन में जमा हैं, वे शब्दों में नहीं उतरेंगी। इसलिए सोचा, एक बार फिर ख़त का सहारा लिया जाए।
तुम जानती हो, समय बहुत कुछ बदल देता है। चेहरे बदल जाते हैं, शहर बदल जाते हैं, रास्ते बदल जाते हैं। लेकिन कुछ प्रतीक्षाएं ऐसी होती हैं जो उम्र के किसी मोड़ पर भी वैसी ही रहती हैं। तुम्हारा इंतज़ार भी शायद उन्हीं में से एक है।
मैं नहीं जानता कि यह पत्र तुम तक पहुंचेगा या नहीं। यह भी नहीं जानता कि तुम्हें मेरा पता याद है या नहीं। मगर इतना जानता हूं कि जब तक स्मृतियां जीवित हैं, तब तक कोई भी रिश्ता पूरी तरह समाप्त नहीं होता। वह कहीं न कहीं, किसी कोने में, किसी पुराने ख़त की तरह सुरक्षित रहता है।
आज तुम्हारे शहर में बैठकर यह पत्र लिखते हुए मुझे महसूस हो रहा है कि शायद हम दोनों के बीच शब्द ही सबसे सच्चा पुल रहे हैं। मुलाक़ातें नहीं हुईं, आवाज़ें कम सुनीं, मगर शब्द हमेशा आते-जाते रहे। इसलिए एक बार फिर इन्हीं शब्दों के सहारे तुम्हारे दरवाज़े तक पहुंचने की कोशिश कर रहा हूं।
अगर कभी यह ख़त पढ़ो तो जवाब ज़रूर देना।
क्योंकि कई रोज़ हुए मुझे तुम्हारा कोई ख़त नहीं मिला...
और देखो, मैं अब भी वहीं खड़ा हूं, जहां आख़िरी बार तुम्हारे शब्दों का इंतज़ार छोड़ आया था।
तुम्हारा
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