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Saturday, 18 February 2017

जिंदगी हुँ मैं

हकीकत  को बयां करूँ,
किसी चेहरे से मैं न डरूँ,
आईना हुँ मैं, बुरा तो लगना ही है।
......
कितनी  बार   तोड़ोगे,
क्या फिर साथ छोड़ोगे,
जिंदगी हुँ मैं, ख्वाब तो बुनना ही है।
......
पीछे  ही  रह  जाओगे,
जो तुम केवल निभाओगे,
वक्त हुँ मैं, हर पल तो चलना ही है।
.........
ना तो बादल है कहीं,
मौसम भी है साफ वहीं,
आँख हुँ मैं, बेवजह तो बरसना ही है।
........
तुम न समझोगे,
बस रूसवा करोगे,
धरा हुँ मैं, बोझ तो सब सहना ही है।
..........
शापित है यौवन,
कुपित  है मोहन,
हाँ, कर्ण हुँ मैं, प्रत्यंचा को टूटना ही है।

©® जाँगीड़ करन kk
18/02/2017__11:00AM

A letter to swar by music 54

  Dear swar, मुझे अब भी खटकता है, तेरा नदी के उस पार होना। सांसें बेशक हैं मगर, जिंदगी का यह कैसा अफसाना।। पता नहीं क्यों, लेकिन इन दिनों...