Showing posts with label karan's letter. Show all posts
Showing posts with label karan's letter. Show all posts

Sunday, 9 August 2026

A letter to swar by music 53

डियर स्वर,

दिन ढल चुका है।
शहर की शोरगुल भरी सड़कें अब धीरे-धीरे शांत होने लगी हैं। दिनभर लोगों की आवाजाही, गाड़ियों के हॉर्न और भागती-दौड़ती ज़िंदगी के बीच जो शहर कभी थमता हुआ नहीं लगता, वही शाम के इस पहर में अचानक कितना ख़ामोश हो जाता है।

ऐसे ही किसी अकेले लम्हे में, जब मैं अपने हाथों में चाय का प्याला थामे खिड़की के पास बैठता हूँ, तो न जाने क्यों मेरा ध्यान अनायास ही तुम्हारी ओर चला जाता है।

चाय की भाप के साथ कुछ पुरानी यादें भी उठती हैं और कमरे की ख़ामोशी में धीरे-धीरे फैल जाती हैं। कभी तुम्हारी आवाज़ सुनाई देती है, कभी तुम्हारी हँसी, कभी तुम्हारी किसी छोटी-सी बात पर मेरा बेवजह मुस्कुरा देना... और कभी-कभी बस तुम्हारा चेहरा याद आता है।

अजीब बात है न?

इंसान बाहर से कितना भी आगे बढ़ने का नाटक कर ले, कितनी भी व्यस्त ज़िंदगी जी ले, कितने ही नए रास्तों पर चल पड़े... मगर उसके भीतर का एक हिस्सा हमेशा उसी पुराने मोड़ पर ठिठका रह जाता है, जहाँ किसी अपने ने हाथ छुड़ाकर कहा था—अलविदा।

और हाँ...

तुमने कितनी आसानी से कह दिया था—अलविदा।

शायद तुम्हारे लिए वह सिर्फ़ एक शब्द था।
एक बातचीत का आख़िरी वाक्य।
एक रिश्ते पर खींची गई आख़िरी लकीर।

मगर तुम्हें कहाँ ख़बर कि वह शब्द मेरे लिए आज भी ख़त्म नहीं हुआ।

आज भी कभी-कभी अचानक तुम्हारा वही "अलविदा" मेरे कानों में गूँजने लगता है। इतना साफ़, जैसे तुम अभी मेरे सामने बैठी हो और वही शब्द दोबारा कह रही हो।

कभी अकेले में खुद से बातें करता हूँ, तो हमारी उस आख़िरी बातचीत तक पहुँच जाता हूँ। फिर जाने कैसे, बातचीत के बीच से वही शब्द निकल आता है—अलविदा।

जैसे कोई अधूरी धुन हो...

जो हवा में तैरती तो है, मगर कभी पूरी नहीं होती।

तुमने तो शायद एक ही पल में सब कुछ समेट लिया था। हमारी बातें, हमारी मुलाकातें, हमारी छोटी-छोटी नोकझोंक, साथ बिताई हुई शामें... शायद सब कुछ एक तरफ़ रखकर आगे बढ़ गईं।

लेकिन मेरे लिए वह एक शब्द ठहर चुका ज़माना बन गया।

ऐसा ज़माना जिसे मैं आज भी रोज़ थोड़ा-थोड़ा जीता हूँ।

कभी याद बनकर,
कभी ख़ामोशी बनकर,
कभी मुस्कान बनकर
और कभी आँखों में उतर आई उस नमी की तरह, जिसका किसी को पता भी नहीं चलता।

लेकिन इस उदासी के बीच भी तुम्हारी यादें कमाल करती हैं।

वे मुझे उदास होकर भी मुस्कुराने की कोई न कोई वजह ढूँढ ही लेती हैं।

और मज़े की बात सुनो...

तुम कुछ शब्दों को कभी-कभी ग़लत बोलती थीं ना?

याद है?

"फायदा" को "फायता" कह देती थीं।

उस समय मैं तुम्हें कितना चिढ़ाया करता था। तुम पहले तो अपनी गलती मानने से इनकार करतीं, फिर खुद ही हँसने लगतीं और कहतीं—"अच्छा बाबा, जो बोलना है बोलो!"

तुम्हारी वही छोटी-सी बात अब भी मेरे साथ है।

कल शाम की ही बात है।

दफ़्तर में किसी ने मुझसे किसी काम के नफ़ा-नुकसान के बारे में पूछा। मैं बड़ी गंभीरता से उसे समझा रहा था कि अचानक मेरे मुँह से निकल गया—"फायता..."

सामने वाला कुछ पल तक मुझे हैरानी से देखता रहा।

उसे शायद लगा होगा कि मैं क्या बोल गया।

और मैं?

मैं भी चुप हो गया।

फिर जाने क्यों मेरे चेहरे पर एक हल्की-सी मुस्कान आ गई और मैंने नज़रें झुका लीं।

उस एक शब्द ने मुझे कुछ पल के लिए फिर वहीं पहुँचा दिया, जहाँ तुम थीं।

जहाँ तुम अपनी उसी मासूमियत से कुछ शब्द ग़लत बोलती थीं और मैं तुम्हें सुधारने के बहाने देर तक परेशान किया करता था।

कितनी अजीब और खूबसूरत बात है न?

तुम चली गईं, मगर तुम्हारी कुछ छोटी-छोटी नादानियाँ आज भी मेरे भीतर साँस ले रही हैं।

लोग कहते हैं कि वक्त के साथ यादें धुँधली पड़ जाती हैं।

शायद उनकी यादें पड़ती होंगी।




मेरी तो कुछ यादें वक्त के साथ और साफ़ होती चली गईं।

तुम्हारी आवाज़ का उतार-चढ़ाव, तुम्हारी हँसी, तुम्हारा किसी बात पर अचानक नाराज़ हो जाना, फिर थोड़ी देर बाद खुद ही सामान्य हो जाना... तुम्हारी वो बेवजह की बातें और मेरी बेवजह की मुस्कान—सब कुछ आज भी वैसा ही है।

बस फर्क इतना है कि तब ये सब मेरे साथ था...

और अब सिर्फ़ मेरी यादों में है।

कभी-कभी सोचता हूँ...

क्या तुम भी कभी किसी शाम यूँ ही चुपचाप बैठकर पीछे मुड़कर देखती होगी?

क्या कभी चाय की चुस्की लेते हुए तुम्हें मेरी किसी बेवकूफ़ी पर हँसी आती होगी?

क्या कभी किसी रास्ते से गुजरते हुए तुम्हें हमारी कोई पुरानी शाम याद आती होगी?

क्या कभी कोई गीत सुनकर तुम्हारा मन भी अचानक ठहर जाता होगा?

क्या कभी तुम्हारे मुँह से भी अनायास मेरा नाम निकल जाता होगा?

शायद हाँ...

और शायद नहीं भी।

शायद तुम बहुत आगे निकल चुकी हो।

शायद तुम्हारी ज़िंदगी में अब बहुत कुछ बदल चुका है। नए लोग, नई बातें, नई व्यस्तताएँ और नए सपने...

और सच कहूँ तो मैं तुम्हारी ज़िंदगी को रोकना भी नहीं चाहता।

क्योंकि प्यार का मतलब हमेशा किसी को अपने पास रखना तो नहीं होता।

कभी-कभी प्यार का सबसे सच्चा रूप यही होता है कि हम किसी को उसकी खुशी के साथ दूर से भी चाह सकें।

मेरे लिए प्यार का मतलब तुम्हें पा लेना कभी था ही नहीं।

मेरे लिए प्यार तो उस अहसास का नाम है, जो तुम्हारे जाने के बाद भी मेरे भीतर उतनी ही शिद्दत से ज़िंदा है।

तुम मेरे साथ नहीं हो, लेकिन इसका मतलब यह तो नहीं कि तुम मेरी कहानी का हिस्सा भी नहीं रहीं।

कुछ लोग हमारी ज़िंदगी से चले जाते हैं, लेकिन हमारे भीतर से कभी नहीं जाते।

तुम शायद उन्हीं लोगों में से एक हो।

मौसम बदल रहे हैं।

हवाओं में अब पहले से थोड़ी ज़्यादा ठंडक घुलने लगी है। रास्ते के पुराने पेड़ धीरे-धीरे अपने पत्ते गिरा रहे हैं। सड़कें वही हैं, शहर वही है, आसमान भी शायद वही है...

मगर सब कुछ फिर भी बदला-बदला सा लगता है।

शायद इसलिए क्योंकि देखने वाली आँखें बदल गई हैं।

और उस सबके बीच एक चीज़ आज भी बिल्कुल वैसी ही है—

वह पुराना पेड़।

याद है?

वही पेड़, जिसके नीचे हमने न जाने कितनी बेफ़िक्र शामें बिताई थीं।

कितनी बातें की थीं, जिनका कोई मतलब नहीं था...

और शायद इसीलिए वे इतनी खूबसूरत थीं।

कभी तुम कुछ कहती थीं, मैं सुनता था। कभी मैं कुछ कहता था और तुम बीच में ही मेरी बात काट देती थीं। कभी हम दोनों चुप बैठे रहते थे और फिर भी ऐसा लगता था जैसे बहुत कुछ कह रहे हों।

वह पेड़ आज भी वहीं खड़ा है।

वैसा ही।

अपनी घनी छाँव फैलाए हुए।

जैसे हमारी सारी कहानियों को अपने भीतर समेटे बैठा हो।

कभी-कभी वहाँ से गुजरता हूँ तो कुछ पल के लिए रुक जाता हूँ।

पेड़ को देखता हूँ और मन ही मन सोचता हूँ—

क्या समय सच में इतना आगे निकल गया है?

या हम ही पीछे छूट गए?

और पता है...

कभी-कभी दिल करता है कि उसी पेड़ के नीचे बैठकर तुम्हारा इंतज़ार करूँ।

शायद तुम आओ...

शायद नहीं।

लेकिन इंतज़ार में भी एक अजीब-सी मिठास है।

क्योंकि इंतज़ार में उम्मीद ज़िंदा रहती है।

इसलिए अगर कभी तुम्हारा मन बहुत भारी हो जाए...

अगर कभी तुम्हें लगे कि इस भागदौड़ भरी दुनिया में कोई तुम्हें उस पुरानी सादगी से सुनने वाला नहीं है...

अगर कभी बहुत सारे लोगों के बीच भी तुम्हें अकेलापन महसूस हो...

तो बस एक बार वहाँ चली आना।

उसी पुराने पेड़ के नीचे।

मैं तुम्हें वहीं मिलूँगा।

न कोई शिकायत लेकर...

न कोई सवाल लेकर...

न तुम्हारे बीते हुए कल का हिसाब माँगूँगा...

न यह पूछूँगा कि इतने साल कहाँ थीं।

बस तुम्हें देखूँगा।

शायद कुछ पल चुप रहूँगा।

और फिर शायद वही पुरानी मुस्कान चेहरे पर आ जाएगी।

क्योंकि कुछ रिश्तों को शब्दों की ज़रूरत नहीं होती।

वे बहुत दूर चले जाने के बाद भी मन के किसी कोने में वैसे ही मौजूद रहते हैं, जैसे शाम ढलने के बाद भी आसमान में थोड़ी-सी रोशनी बची रहती है।

और अगर तुम उस दिन भी कुछ शब्द ग़लत बोल गईं...

तो शायद मैं फिर तुम्हें चिढ़ाऊँगा।

और अगर तुमने फिर "फायदा" को "फायता" कहा...

तो शायद मैं इस बार तुम्हें सुधारूँगा नहीं।

बस मुस्कुराकर कहूँगा—

"हाँ स्वर... फायता ही सही।"

क्योंकि तुम्हारी आवाज़ में कहा हुआ वह ग़लत शब्द भी मेरे लिए किसी सही याद से कम नहीं।

बस एक बात है...

अगर कभी लौटना हो तो देर मत करना।

क्योंकि उम्र भले आगे बढ़ती रहे, मौसम भले बदलते रहें, शहर भले बदल जाए...

लेकिन कुछ इंतज़ार ऐसे होते हैं जिन्हें इंसान अपनी आख़िरी साँस तक निभाता रहता है।

और शायद मेरा इंतज़ार भी उन्हीं में से एक है।

तुम्हें पाने की उम्मीद नहीं है...

बस इतना चाहता हूँ कि कभी किसी शाम हवा पुराने दिनों की ख़ुशबू लेकर आए और तुम भी उसी हवा के साथ वहाँ चली आओ।

मैं वहीं मिलूँगा।

उसी पुराने पेड़ के नीचे...

जहाँ हमारी कहानी कभी ख़त्म हुई ही नहीं थी।

शायद बस एक शब्द के पीछे छिप गई थी—

अलविदा।

तुम्हारी यादों के साथ,
म्यूजिक

Wednesday, 2 December 2015

A letter to THe GOD by Karan

मैं चाहता हुँ कि आप यह पत्र अवश्य पढ़े पर पढ़ने से पहलें यह जान लें....
पहला, पत्र की सारी बातें मेरी व्यक्तिगत सोच ह इसका किसी से कोई संबंध नहीं है। कोई धार्मिक या व्यैक्तिक ठैस पहुँचे उसके लिये क्षमा।।
दुसरे, कोई संवेदनापूर्ण कमेंट न करें।

A letter to the God by me....

प्रणाम प्रभु,

मैं करन हुँ!!
पहचाना?
हाँ, वहीं करन हुँ।।
याद करो कोई 25 वर्ष पहले तुमने मुझे धरती पर भेजा था। भेजने का फैसला तुम्हारा सही या गलत था यह मैं नहीं कहता!!!
पर मैं तो तुम से यह पुछता हुँ कि क्या तुमने कुछ गलत नहीं किया?
क्या तुम्हारी कारीगिरी में कोई दोष आ गया था उस वक्त?
या तुम्हारे पास संसाधनों की कमी थी!
खैर!! तुमने जैसे तैसे अपना काम तो कर दिया! मुझे धरती पर भेजकर छुटकारा पाया ना तुमने??

हाँ!! आज इतने सालों बाद तुम्हैं लिख रहा हुँ कि मैं सही सलामत पहुँच गया था।
बस एक बात से हैरान था कि तुमने मुझ में कमी क्यों रख दी? हैरान भी और दुखी भी!
करूँगा क्या मैं इस हालत में यहाँ?
पर जैसा नियम है संसार का कि चलना है मैं भी चल पड़ा जिंदगी की राह पर।
ठीक उस पंछी की उड़ान की तरह जिसका एक पर काट दिया गया हो और उड़ने के लिये छोड़ दिया हो।
मैं भी तुम्हारी बनाई इस दुनियाँ में चलने लगा था। पता है आसपास के लोग मुझे कौतुहल भरी नजरों से देखते थे कि जैसे मैं इंसान न होकर आठवाँ अजुबा हुँ।
पर तुम्हें एक बात का धन्यवाद जरूर दुँगा(आभार व्यक्त नहीं कर रहा हुँ) कि तुमने मुझे अच्छे इंसान के घर जन्म दिया जिन्हें मैं गर्व से माँ-बाप कह सका! वो भी तुम्हारे द्वारा सताये हुए थे पर उनके चेहरे पर हमेशा मुस्कुराहट रहती थी।। बिना किसी हिचकिचाहट के मुझे अपनाया!
साथ ही मुझे सीखाना भी शुरू कर दिया कि दुनियाँ में कैसे जीना है!!!
पर
पर
तुम्हारे दिमाग की मैं क्या कहुँ?
शायद शतरंज खेल खेलने के मूड में थे तुम मेरे साथ।
और चाल भी बहुत शातिर!!
यकींन नहीं हुआ मुझे!!
मात्र सात साल का था मैं, क्या मुझे माँ की जरूरत नहीं थी??
ओहहह।।
तुम्हें तो मुझे हराना था ना! कुछ भी मंजूर था तुम्हें!
और मुझे उस समय ऐसा लगा कि जैसे मेरा एक हाथ भी काट दिया गया हो।
ह ह ह ह।।
फिर भी न जानें क्या मुझे खींच रहा था आगे की ओर।
चलना मंजूर थी मुझे!
मेरे पिता बहुत जिंदादिल इंसान थे, पूरी कोशिश करते कि मुझे माँ की कमी महसूस न हो! और साथ ही यह भी अहसास नहीं होने देते कि मैं आम मनुष्य कि जैसे काम नहीं कर सकता! हर परिस्थिति में मेरे साथ थे वो।
हमेशा आगे ही बढ़ने का हौंसला दिया था।
मुझे पूरा भरोसा था कि मेरी जीत पर वो बहुत खुश होंगे!!!!
ह ह ह ह।।
लेकिन तुम
हाँ प्रभु तुम!!
तुम तो तुम्हारे गेम पर थे ना!!
मेरी जीत से शायद तुम्हारे वजूद को खतरा महसूस हो रहा था।
हर हाल में तुम्हारा उद्देश्य मुझे हराना ही था।
हाँ लगभग 13 साल का था उस समय मैं।
तुम्हारी चाल तुमने चल दी!!
अब भला मैं क्या करता??
तुम्हारी नजरों में तो मेरी हार निश्चित थी।
लेकिन उस समय भी मुझे कुछ ओर ही मंजूर था।
कंधे पर मेरे एक हाथ आया था(धन्यवाद उसके लिये फिर से)।
बस फिर क्या मैं चल पड़ा फिर से!!
रेंगते हुए ही सही पर दिल बस जीतने का जुनुन था।
लेकिन तुम कहाँ मानने वाले थे और भी तुम्हारी बहुत चालें हुई है मुझे गिराने की।
सब यहाँ नहीं बता रहा हुँ। अगर बताई तो शायद दुनियाँ का तुम पर से विश्वास न उठ जायें।
बस तुम इतना सा जान लो(जानते तो हो ही) कि कैसे भी सही पर अब मैं दुनियाँ के साथ चल रहा हुँ। कभी गिरा भी तो फिर से उठ खड़ा हुआ लेकिन रूकने का नाम नहीं लिया!
न कोई गम था न खुशी!!
संवेदनाओं को एक ताक रख चुका था मैं।।
बस जुनुन था।।
लेकिन।।।
लेकिन यह क्या!!!!
जब लगभग मैं मंजिल के करीब आने को था तो तुमने अजीब सी यह चाल और चल दी!!
और इस चाल में मैं खुद बुरी तरह से ऊलझ गया हुँ!
मैं स्वीकार करता हुँ कि इस चाल का मेरे पास फिलहाल तो मेरे पास भी कोई हल नहीं है।
।।
कभी तो लगता है कि अब हारने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचा है।
पर फिर भी मैं कोशिश में हुँ कि कभी तो मेरी दहलीज पर जीत कदम रखेगी...
तब शायद.......
छोड़ो इन बातों ज्यादा अच्छा नहीं लगेगा।

सुनो प्रभु,
वैसे मेरा जहाँ तक इरादा है तो मैं जीतकर तुम्हारे पास आऊँगा! पर मानाकि मैं हारा भी तो तुम्हारे पास आकर जिन सवालों के जवाब चाहुँगा,
तुम नहीं दे पाओगे,
सिर्फ नजरें नीची रहेगी तुम्हारी...
तुम्हें उस समय तो हारना ही है...
फिर से प्रणाम स्वीकार करें..................

हाँ तुम्हारे माध्यम से ही मैं तुम्हारी इस कृति(संसार) से भी सभी विकलाँग साथियों की ओर से कहना चाहुँगा.....
क्यों तुम हैरान हो?
क्या मेरा यह रूप
तुम्हारी समझ से
परे है?
क्यों तुमने सिर्फ मुझे
अपनी संवेदनाओं के
काबिल समझा है?
क्या मैं तुम्हारी संवेदनाओं
के ही काबिल हुँ।
पर तुमने कभी
सोचा है
कटे हुए परों से भी
पंछी उड़ान भर लेता है
या दिल में उनके यहीं
अरमान होते है कि
वो भी उड़े दूर तक
सब पंछियों की तरह,
नाप लें सारी धरती,
यह आकाश भी।
पर उन्हें कभी जरूरत
नहीं रही संवेदनाओं की,
बस इक हौंसला चाहिये।
बस इक हौंसला!!
क्या तुम दे पाओगे??

                     शायद तुम्हारा
                           करन
Karan dc(2/12/2015-19:40)

A letter to swar by music 54

  Dear swar, मुझे अब भी खटकता है, तेरा नदी के उस पार होना। सांसें बेशक हैं मगर, जिंदगी का यह कैसा अफसाना।। पता नहीं क्यों, लेकिन इन दिनों...