Sunday, 9 August 2026

A letter to swar by music 53

डियर स्वर,

दिन ढल चुका है।
शहर की शोरगुल भरी सड़कें अब धीरे-धीरे शांत होने लगी हैं। दिनभर लोगों की आवाजाही, गाड़ियों के हॉर्न और भागती-दौड़ती ज़िंदगी के बीच जो शहर कभी थमता हुआ नहीं लगता, वही शाम के इस पहर में अचानक कितना ख़ामोश हो जाता है।

ऐसे ही किसी अकेले लम्हे में, जब मैं अपने हाथों में चाय का प्याला थामे खिड़की के पास बैठता हूँ, तो न जाने क्यों मेरा ध्यान अनायास ही तुम्हारी ओर चला जाता है।

चाय की भाप के साथ कुछ पुरानी यादें भी उठती हैं और कमरे की ख़ामोशी में धीरे-धीरे फैल जाती हैं। कभी तुम्हारी आवाज़ सुनाई देती है, कभी तुम्हारी हँसी, कभी तुम्हारी किसी छोटी-सी बात पर मेरा बेवजह मुस्कुरा देना... और कभी-कभी बस तुम्हारा चेहरा याद आता है।

अजीब बात है न?

इंसान बाहर से कितना भी आगे बढ़ने का नाटक कर ले, कितनी भी व्यस्त ज़िंदगी जी ले, कितने ही नए रास्तों पर चल पड़े... मगर उसके भीतर का एक हिस्सा हमेशा उसी पुराने मोड़ पर ठिठका रह जाता है, जहाँ किसी अपने ने हाथ छुड़ाकर कहा था—अलविदा।

और हाँ...

तुमने कितनी आसानी से कह दिया था—अलविदा।

शायद तुम्हारे लिए वह सिर्फ़ एक शब्द था।
एक बातचीत का आख़िरी वाक्य।
एक रिश्ते पर खींची गई आख़िरी लकीर।

मगर तुम्हें कहाँ ख़बर कि वह शब्द मेरे लिए आज भी ख़त्म नहीं हुआ।

आज भी कभी-कभी अचानक तुम्हारा वही "अलविदा" मेरे कानों में गूँजने लगता है। इतना साफ़, जैसे तुम अभी मेरे सामने बैठी हो और वही शब्द दोबारा कह रही हो।

कभी अकेले में खुद से बातें करता हूँ, तो हमारी उस आख़िरी बातचीत तक पहुँच जाता हूँ। फिर जाने कैसे, बातचीत के बीच से वही शब्द निकल आता है—अलविदा।

जैसे कोई अधूरी धुन हो...

जो हवा में तैरती तो है, मगर कभी पूरी नहीं होती।

तुमने तो शायद एक ही पल में सब कुछ समेट लिया था। हमारी बातें, हमारी मुलाकातें, हमारी छोटी-छोटी नोकझोंक, साथ बिताई हुई शामें... शायद सब कुछ एक तरफ़ रखकर आगे बढ़ गईं।

लेकिन मेरे लिए वह एक शब्द ठहर चुका ज़माना बन गया।

ऐसा ज़माना जिसे मैं आज भी रोज़ थोड़ा-थोड़ा जीता हूँ।

कभी याद बनकर,
कभी ख़ामोशी बनकर,
कभी मुस्कान बनकर
और कभी आँखों में उतर आई उस नमी की तरह, जिसका किसी को पता भी नहीं चलता।

लेकिन इस उदासी के बीच भी तुम्हारी यादें कमाल करती हैं।

वे मुझे उदास होकर भी मुस्कुराने की कोई न कोई वजह ढूँढ ही लेती हैं।

और मज़े की बात सुनो...

तुम कुछ शब्दों को कभी-कभी ग़लत बोलती थीं ना?

याद है?

"फायदा" को "फायता" कह देती थीं।

उस समय मैं तुम्हें कितना चिढ़ाया करता था। तुम पहले तो अपनी गलती मानने से इनकार करतीं, फिर खुद ही हँसने लगतीं और कहतीं—"अच्छा बाबा, जो बोलना है बोलो!"

तुम्हारी वही छोटी-सी बात अब भी मेरे साथ है।

कल शाम की ही बात है।

दफ़्तर में किसी ने मुझसे किसी काम के नफ़ा-नुकसान के बारे में पूछा। मैं बड़ी गंभीरता से उसे समझा रहा था कि अचानक मेरे मुँह से निकल गया—"फायता..."

सामने वाला कुछ पल तक मुझे हैरानी से देखता रहा।

उसे शायद लगा होगा कि मैं क्या बोल गया।

और मैं?

मैं भी चुप हो गया।

फिर जाने क्यों मेरे चेहरे पर एक हल्की-सी मुस्कान आ गई और मैंने नज़रें झुका लीं।

उस एक शब्द ने मुझे कुछ पल के लिए फिर वहीं पहुँचा दिया, जहाँ तुम थीं।

जहाँ तुम अपनी उसी मासूमियत से कुछ शब्द ग़लत बोलती थीं और मैं तुम्हें सुधारने के बहाने देर तक परेशान किया करता था।

कितनी अजीब और खूबसूरत बात है न?

तुम चली गईं, मगर तुम्हारी कुछ छोटी-छोटी नादानियाँ आज भी मेरे भीतर साँस ले रही हैं।

लोग कहते हैं कि वक्त के साथ यादें धुँधली पड़ जाती हैं।

शायद उनकी यादें पड़ती होंगी।




मेरी तो कुछ यादें वक्त के साथ और साफ़ होती चली गईं।

तुम्हारी आवाज़ का उतार-चढ़ाव, तुम्हारी हँसी, तुम्हारा किसी बात पर अचानक नाराज़ हो जाना, फिर थोड़ी देर बाद खुद ही सामान्य हो जाना... तुम्हारी वो बेवजह की बातें और मेरी बेवजह की मुस्कान—सब कुछ आज भी वैसा ही है।

बस फर्क इतना है कि तब ये सब मेरे साथ था...

और अब सिर्फ़ मेरी यादों में है।

कभी-कभी सोचता हूँ...

क्या तुम भी कभी किसी शाम यूँ ही चुपचाप बैठकर पीछे मुड़कर देखती होगी?

क्या कभी चाय की चुस्की लेते हुए तुम्हें मेरी किसी बेवकूफ़ी पर हँसी आती होगी?

क्या कभी किसी रास्ते से गुजरते हुए तुम्हें हमारी कोई पुरानी शाम याद आती होगी?

क्या कभी कोई गीत सुनकर तुम्हारा मन भी अचानक ठहर जाता होगा?

क्या कभी तुम्हारे मुँह से भी अनायास मेरा नाम निकल जाता होगा?

शायद हाँ...

और शायद नहीं भी।

शायद तुम बहुत आगे निकल चुकी हो।

शायद तुम्हारी ज़िंदगी में अब बहुत कुछ बदल चुका है। नए लोग, नई बातें, नई व्यस्तताएँ और नए सपने...

और सच कहूँ तो मैं तुम्हारी ज़िंदगी को रोकना भी नहीं चाहता।

क्योंकि प्यार का मतलब हमेशा किसी को अपने पास रखना तो नहीं होता।

कभी-कभी प्यार का सबसे सच्चा रूप यही होता है कि हम किसी को उसकी खुशी के साथ दूर से भी चाह सकें।

मेरे लिए प्यार का मतलब तुम्हें पा लेना कभी था ही नहीं।

मेरे लिए प्यार तो उस अहसास का नाम है, जो तुम्हारे जाने के बाद भी मेरे भीतर उतनी ही शिद्दत से ज़िंदा है।

तुम मेरे साथ नहीं हो, लेकिन इसका मतलब यह तो नहीं कि तुम मेरी कहानी का हिस्सा भी नहीं रहीं।

कुछ लोग हमारी ज़िंदगी से चले जाते हैं, लेकिन हमारे भीतर से कभी नहीं जाते।

तुम शायद उन्हीं लोगों में से एक हो।

मौसम बदल रहे हैं।

हवाओं में अब पहले से थोड़ी ज़्यादा ठंडक घुलने लगी है। रास्ते के पुराने पेड़ धीरे-धीरे अपने पत्ते गिरा रहे हैं। सड़कें वही हैं, शहर वही है, आसमान भी शायद वही है...

मगर सब कुछ फिर भी बदला-बदला सा लगता है।

शायद इसलिए क्योंकि देखने वाली आँखें बदल गई हैं।

और उस सबके बीच एक चीज़ आज भी बिल्कुल वैसी ही है—

वह पुराना पेड़।

याद है?

वही पेड़, जिसके नीचे हमने न जाने कितनी बेफ़िक्र शामें बिताई थीं।

कितनी बातें की थीं, जिनका कोई मतलब नहीं था...

और शायद इसीलिए वे इतनी खूबसूरत थीं।

कभी तुम कुछ कहती थीं, मैं सुनता था। कभी मैं कुछ कहता था और तुम बीच में ही मेरी बात काट देती थीं। कभी हम दोनों चुप बैठे रहते थे और फिर भी ऐसा लगता था जैसे बहुत कुछ कह रहे हों।

वह पेड़ आज भी वहीं खड़ा है।

वैसा ही।

अपनी घनी छाँव फैलाए हुए।

जैसे हमारी सारी कहानियों को अपने भीतर समेटे बैठा हो।

कभी-कभी वहाँ से गुजरता हूँ तो कुछ पल के लिए रुक जाता हूँ।

पेड़ को देखता हूँ और मन ही मन सोचता हूँ—

क्या समय सच में इतना आगे निकल गया है?

या हम ही पीछे छूट गए?

और पता है...

कभी-कभी दिल करता है कि उसी पेड़ के नीचे बैठकर तुम्हारा इंतज़ार करूँ।

शायद तुम आओ...

शायद नहीं।

लेकिन इंतज़ार में भी एक अजीब-सी मिठास है।

क्योंकि इंतज़ार में उम्मीद ज़िंदा रहती है।

इसलिए अगर कभी तुम्हारा मन बहुत भारी हो जाए...

अगर कभी तुम्हें लगे कि इस भागदौड़ भरी दुनिया में कोई तुम्हें उस पुरानी सादगी से सुनने वाला नहीं है...

अगर कभी बहुत सारे लोगों के बीच भी तुम्हें अकेलापन महसूस हो...

तो बस एक बार वहाँ चली आना।

उसी पुराने पेड़ के नीचे।

मैं तुम्हें वहीं मिलूँगा।

न कोई शिकायत लेकर...

न कोई सवाल लेकर...

न तुम्हारे बीते हुए कल का हिसाब माँगूँगा...

न यह पूछूँगा कि इतने साल कहाँ थीं।

बस तुम्हें देखूँगा।

शायद कुछ पल चुप रहूँगा।

और फिर शायद वही पुरानी मुस्कान चेहरे पर आ जाएगी।

क्योंकि कुछ रिश्तों को शब्दों की ज़रूरत नहीं होती।

वे बहुत दूर चले जाने के बाद भी मन के किसी कोने में वैसे ही मौजूद रहते हैं, जैसे शाम ढलने के बाद भी आसमान में थोड़ी-सी रोशनी बची रहती है।

और अगर तुम उस दिन भी कुछ शब्द ग़लत बोल गईं...

तो शायद मैं फिर तुम्हें चिढ़ाऊँगा।

और अगर तुमने फिर "फायदा" को "फायता" कहा...

तो शायद मैं इस बार तुम्हें सुधारूँगा नहीं।

बस मुस्कुराकर कहूँगा—

"हाँ स्वर... फायता ही सही।"

क्योंकि तुम्हारी आवाज़ में कहा हुआ वह ग़लत शब्द भी मेरे लिए किसी सही याद से कम नहीं।

बस एक बात है...

अगर कभी लौटना हो तो देर मत करना।

क्योंकि उम्र भले आगे बढ़ती रहे, मौसम भले बदलते रहें, शहर भले बदल जाए...

लेकिन कुछ इंतज़ार ऐसे होते हैं जिन्हें इंसान अपनी आख़िरी साँस तक निभाता रहता है।

और शायद मेरा इंतज़ार भी उन्हीं में से एक है।

तुम्हें पाने की उम्मीद नहीं है...

बस इतना चाहता हूँ कि कभी किसी शाम हवा पुराने दिनों की ख़ुशबू लेकर आए और तुम भी उसी हवा के साथ वहाँ चली आओ।

मैं वहीं मिलूँगा।

उसी पुराने पेड़ के नीचे...

जहाँ हमारी कहानी कभी ख़त्म हुई ही नहीं थी।

शायद बस एक शब्द के पीछे छिप गई थी—

अलविदा।

तुम्हारी यादों के साथ,
म्यूजिक

Thursday, 18 June 2026

A letter to swar by music 52

Dear swar,



कई रोज़ हुए मुझे तुम्हारा कोई ख़त नहीं मिला।
पहले तो मैं हर सुबह दरवाज़े की आहट पर चौंक जाता था, जैसे डाकिए के हाथों में तुम्हारे शब्द चले आ रहे हों। फिर धीरे-धीरे इंतज़ार आदत बन गया और आदत के बाद एक ख़ामोशी। अब तो हालत यह है कि कभी-कभी अपने ही मन को समझाना पड़ता है कि शायद तुम व्यस्त होगे, शायद रास्ते बदल गए होंगे, या शायद तुम्हें मेरा पता ही याद न रहा हो।

ख़ैर, छोड़ो।

शिकायतें हमेशा दूरियों को और लंबा कर देती हैं। इसलिए आज शिकायत नहीं करूंगा। बस इतना बताने आया हूं कि मैं अब तुम्हारे शहर में हूं।

अजीब बात है न? कभी तुम्हारे शहर तक पहुंचना एक सपना लगता था। सोचता था कि जिस दिन यहां आऊंगा, तुम सामने मिलोगे। उन गलियों में साथ चलेंगे जिनका ज़िक्र तुम अपने ख़तों में किया करते थे। उन रास्तों को देखूंगा जिन्हें तुमने अपनी आंखों से देखा था। उन पेड़ों की छांव में बैठूंगा जिनके नीचे बैठकर तुमने कभी मुझे याद किया होगा।

लेकिन देखो, नियति भी कैसी है।

मैं तुम्हारे शहर में हूं, तुम्हारी हवाओं के बीच हूं, उन्हीं रास्तों पर चल रहा हूं जहां शायद कभी तुम्हारे कदम पड़े होंगे, मगर फिर भी तुमसे मिल नहीं पाया। और सबसे विचित्र बात यह है कि यहां आकर भी मैं तुमसे आमने-सामने बात नहीं कर रहा, बल्कि तुम्हें ख़त ही लिख रहा हूं।



शायद कुछ रिश्ते ऐसे ही होते हैं। उनके बीच की दूरी किलोमीटरों से नहीं नापी जाती। कभी-कभी दो लोग एक ही शहर में होते हैं और फिर भी उनके बीच वर्षों का फ़ासला होता है। और कभी कोई बहुत दूर होकर भी हर पल हमारे साथ रहता है।

आज शाम मैं शहर की एक सड़क पर अकेला चल रहा था। लोग अपने-अपने कामों में व्यस्त थे। दुकानों पर रोशनी थी, चाय की भाप हवा में घुल रही थी, बच्चे खेल रहे थे, और मैं भीड़ के बीच खड़ा होकर तुम्हें याद कर रहा था। अचानक लगा कि अगर इस वक्त तुम सामने आ जाओ तो शायद मैं कुछ कह ही न पाऊं। जो बातें बरसों से मन में जमा हैं, वे शब्दों में नहीं उतरेंगी। इसलिए सोचा, एक बार फिर ख़त का सहारा लिया जाए।

तुम जानती हो, समय बहुत कुछ बदल देता है। चेहरे बदल जाते हैं, शहर बदल जाते हैं, रास्ते बदल जाते हैं। लेकिन कुछ प्रतीक्षाएं ऐसी होती हैं जो उम्र के किसी मोड़ पर भी वैसी ही रहती हैं। तुम्हारा इंतज़ार भी शायद उन्हीं में से एक है।

मैं नहीं जानता कि यह पत्र तुम तक पहुंचेगा या नहीं। यह भी नहीं जानता कि तुम्हें मेरा पता याद है या नहीं। मगर इतना जानता हूं कि जब तक स्मृतियां जीवित हैं, तब तक कोई भी रिश्ता पूरी तरह समाप्त नहीं होता। वह कहीं न कहीं, किसी कोने में, किसी पुराने ख़त की तरह सुरक्षित रहता है।

आज तुम्हारे शहर में बैठकर यह पत्र लिखते हुए मुझे महसूस हो रहा है कि शायद हम दोनों के बीच शब्द ही सबसे सच्चा पुल रहे हैं। मुलाक़ातें नहीं हुईं, आवाज़ें कम सुनीं, मगर शब्द हमेशा आते-जाते रहे। इसलिए एक बार फिर इन्हीं शब्दों के सहारे तुम्हारे दरवाज़े तक पहुंचने की कोशिश कर रहा हूं।

अगर कभी यह ख़त पढ़ो तो जवाब ज़रूर देना।

क्योंकि कई रोज़ हुए मुझे तुम्हारा कोई ख़त नहीं मिला...

और देखो, मैं अब भी वहीं खड़ा हूं, जहां आख़िरी बार तुम्हारे शब्दों का इंतज़ार छोड़ आया था।

तुम्हारा
Music

Wednesday, 31 December 2025

प्रकृति और ईश्वर

 प्रकृति की गोद में ईश्वर कहें या ईश्वर की गोद में प्रकृति ...... 

जी हां, आज मैं आपको एक ऐसे प्राकृतिक स्थल के बारे में बताऊंगा जहां जाकर आप अपने आप को ईश्वर के नजदीक महसूस करेंगे, जहां अपार शांति है, जहां आवाज के नाम पर चिड़ियों की चहचहाहट है या फिर पानी की कलकल....... 

जी हां, मैं बात कर रहा हूं ऋषि मुनियों की पावन धरती सूरजकुंड (राजसमंद) की बात ... हा अपनी अरावली में ही है।

हम शुरुआत करतें हैं गोमती चौराहे से (उदयपुर कांकरोली से देवगढ़ भीम हाइवे पर स्थित है), गोमती चौराहे से हमें निकलना गढबोर चारभुजा की तरफ़, गढबोर से कोई 1-2 किलोमीटर आगे एक जगह दो रास्ते घूम रहे हैं, वैसे दोनों ही रास्ते जाते हैं , हमें जो (बाइक पर) बढ़िया लगा वो बायी ओर केलवाड़ा की तरफ़ का रास्ता ... इस रास्ते पर कोई 7-8 किलोमीटर के बाद एक दरवाजा आएगा उस दरवाजे से आपको अंदर जाना है और फिर आगे से आगे निशान (जैसे स्काउट केंप में निशान छोड़ते हैं) बनें हुए है जिनको फ़ॉलो करतें हुए आपकी बाइक वहां तक लें जाएं जहां तक आप लें जा सकतें हैं (अंतिम दो तीन किलोमीटर की बाइक राइडिंग भी वहां दुर्गम हैं और एक बढ़िया अनुभव देती हैं).


फिर आता है असली मजा, फिर वहां से आप और प्रकृति इसके अलावा कुछ नहीं .. क्योंकि मोबाइल के नेटवर्क भी नहीं आते हैं (इसलिए जब भी जाएं पहले ही घर पर संपर्क कर के बता दें कि अगले 5 घंटे फोन नहीं लगेगा)..... और इस सफर में आनंद इसी बात का है कि न तो पैदल रास्ता व्यवस्थित है और न ही जाना पहचाना (हां, बस निशान बनें हुए है उन्हें फ़ॉलो करतें जाइए) , घने जंगल में गुज़रते हुए डर लगना भी लाज़मी है लेकिन मंजिल की चाहत आपको रुकने नहीं देगी .... रास्ते भर में पहले लगभग 1 किलोमीटर की चढाई और फिर 2-²½ किलोमीटर का उतार और उसके बाद शुरू होता है एक गर्त (भुगोल की भाषा में गॉर्ज कहते हैं शायद), दोनों तरफ़ ऊंचे ऊंचे पहाड़ और बीच में बहता पानी और हमें चलना है उस पानी के किनारे किनारे और प्रकृति का आनंद लीजिए और देखिए कि पानी कितना क्रिस्टल क्लियर ऐसा एक्वेरियम में भी नहीं होता होगा, पानी में नन्ही मछलियां साफ़ दिखती है (बारिश के मौसम में निकलना शायद संभव नहीं होता होगा) ...... और ऐसे ही आनंद लेते लेते आपको जब पशु पक्षियों की चहचहाहट लगातार सुनाई दें तो समझ जाइए आप अपनी मंजिल तक आ गये है ... 😍

और वो स्थान देखकर ही आपकी थकान छु मंतर हो जाएगी, आपकी आस्था ऋषि मुनियों के प्रति और बढ़ जाएगी कि सच में ऐसे निर्जन वन में कैसे शुरुआत की होगी, एक बारगी तो मन करेगा कि यहीं रहकर शान्ति से जीवन जिया जाएं.. सब कुछ नहीं बताऊंगा कभी पहुंचकर महसूस कीजिए, ..... 

हां, वहां पर आपको चाय और भोजन प्रसाद की व्यवस्था


निशुल्क मिलेगी.......... 

एक और बात वहां अभी भी कुड़ा कचरा नहीं है, कहना क्या चाहता हूं समझ गये होंगे आप 😍

तो फिर ...... अरावली के इस हिस्से को महसूस कर आइए .... 

विशेष - जिन्हें ट्रेकिंग करने में कोई दिक्कत न हो वो ही जाएं .... आते समय चढ़ाई ज्यादा करनी पड़ती है तो शरीर साथ देना जरूरी है 😀 

#surajkund #SurajkundRajsamand

करन जांगिड़ 31/12/2025

Sunday, 2 May 2021

Alone boy 31

मैं
अंधेरे की नियति
मुझे चांद से नफरत है......
मैं आसमां नहीं देखता अब
रोज रोज,
यहां तक कि मैं तो
चांदनी रात देख
बंद कमरे में दुबक जाता हूं,
बस अमावस को
आसमां में
काला स्याह अंधेरा देखता हूं.....
तारों से तो कभी
अपना कोई वास्ता भी नहीं रहा,
बस कभी कभी
इनके बीच की दूरी
खटकती है,
क्या इनको भी
फकत अंधेरा ही रास आता है?
खैर छोड़ो तारों को
तुम बताओ
कभी तुम्हारे उजाले में
मेरी परछाई तक देखी है?
तुम्हें अफसोस होगा
तुम्हारे चांद होने का,
तुम्हें खुद के उजाले से
नफ़रत करने को
मजबूर न कर दूं तो कहना........
दरअसल मुझे तुमसे
नफरत नहीं....
तुम्हारी नज़रों से खुद को
देखने पर
खुद से है,
इसलिए तो मुझे
अंधेरे में रहने दो..........
मुझे खुद से
प्रेम करने दो.....
@karan DC 2.5.2021
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Friday, 27 March 2020

A letter to swar by music 51

Dear swar,
सबसे पहले तो थैंक्यू बनता ही है, देर से ही सही तुमने मेरे पत्र का जवाब तो दिया, हां मुझे याद है तुम्हें 50वा पत्र मैंने 19 अगस्त 2018 को लिखा था, आज पूरे 575 दिनों बाद उसका जवाब पत्र
प्राप्त हुआ है। खैर तुमने जो पत्र में कारण बताया है वह मुझे अच्छी तरह मालूम है ......तुम्हारी व्यस्तताएं। हां अब तो तुम्हारे काम और भी बढ़ गए होंगे घर, स्कूल, खेत और कभी-कभी कॉलेज भी...... हां पत्र न तुम्हारा तो मन बहुत बेकरार था शायद कैसी होगी?
क्या कर रही होगी?
क्या कुछ खाती भी है या दिन घर पर काम ही काम ।
हाँ, तुम उधर काम में ही व्यस्त रहती हो मगर तुम्हें मालूम तो है मैं बिल्कुल यहां आवारा हूँ, कहीं कोई काम नहीं मुझे मेरा सबसे बड़ा काम है तुम्हारे नंबर बार-बार सेव करके यह चेक करना कि तुमने whatsapp दुबारा चालू कर दिया हो शायद, तुम्हारे नाम को facebook पर बार-बार सर्च करना कि अपनी id फिर से Activate कर ली हो शायद,..... यहीं मेरी दिनचर्या हैं बस।

हां तुमने पत्र में जिक्र किया है कि अभी अभी तुम फुरसत में हो, कारण भी तो तुमने बता दिया स्कूल कॉलेज बंद, घर के बाहर जाना भी लगभग बंद ही है, घर में बैठे-बैठे अकेली करती भी क्या , ........ इसलिए पत्र ही लिख डाला।

 
PIC- captured by me during the writting of letter, A pigeon sitting on my home's street light(THE MESSANGER)


हां तो, अब मैं अपनी बात पर आता हूं मुझे तो तुम्हारे द्वारा लिखा गया एक लफ्ज भी दुनिया की सर्वोत्तम कृति लगता है, तुमने तो पत्र लिखा है पूरा का पूरा....... पत्र में चाहे जो लिखा हो, उससे हमारा कोई वास्ता ही नही, हां वही तुम्हारी पत्रकार वाले अंदाज़ में, कि फलाने की भैंस ने इतनी दौड़ लगाई कि उसके पीछे दोनों लोग लुगाई ने दौड़कर ओलंपिक का नया रिकॉर्ड बना लिया हो, जमुनी की बकरी ने 2 दिन पहले चट्टान से छलांग लगाकर अपनी एक टाँग तुड़वा ली, शंभूकाका के कारखाना में फसल कटाई के नई बनाई जा रही है.... हालांकि मुझे इन बातों से कोई मतलब नहीं है मगर तुमने लिखी है ना ,लगता है साहित्य में Ph.d करने की ठान ली है......


अब सुनो, प्रकृति ने पिछले कई दिनों से अपने पैंतरे बदल दिए हैं ऐसा लगता है किसी राक्षस ने देवताओं को छेड़ दिया है और अब देवतागण कुपित होकर अपने अस्त्र शस्त्र से प्रहार कर रहे हैं, पता नहीं क्या होने वाला हैं?

हां एक बात तो है, प्रकृति का यह रूप अभी वैसा ही सुंदर, सुरम्य, सुहाना, अतीव रमणीय लगता है,जिसे हर बार, हर बार देखते ही मुझे तुम्हारी याद आ जाती है। तुम्हें याद है ना तुम हवा में अपने हाथों को ऐसे लहराती थी जैसे पेड़ से गिरकर पता हवा में लहराता हुआ जमीं पर आता है, नहाने के बाद तुम बालों को झटकती तो ऐसा लगता था जैसे हवा का कोई झोंका आया और पेड़ की टहनिया इधर उधर हिलने लगी।
चलो, छोड़ो इन बातों को तुम भी पक गई होओगी और सोच रही होओगी कि यह फिर से शुरु गया, हर बार की तरह फिर से क्या करने लगा है? पर क्या करूं मजबूर हूँ, जब भी तुम्हारा ख्याल आता है कलम अपने आप तुम्हारे लिए चल पड़ती है, दिल दिमाग में विचारों का झोंका सा आता है, तुम्हें लिखने बैठ जाता हूँ....... और मैं कर भी तो क्या सकता हूँ ।।

खैर, यह छोड़ो......
तुम बताओ, क्या चल रहा है आजकल? सुना है तुमने अपनी सारी बकरियां बेच दी है ? बेचोगी भी क्यों नहीं अकेली क्या-क्या संभालती!! और इस प्राकृतिक आपदा (मैं इसे मानव निर्मित मानता हूं) में तुम्हारी समस्या और भी बढ़ जाती।।
अब जबकि तुम घर पर हो, प्रकृति ने बाहर कदम न रखने की सख्त हिदायत दे रखी है तो मैं इतना ही कहूंगा अपना ख्याल रखना, हो सके तो बाहर जाने से बचना। पिछले दो चार दिन से दिमाग में बुरे ख्याल से आने लगे हैं कि जाने क्या होगा? प्रकृति के इस प्रकोप से कौन-कौन बच पाएगा, किसकी किस्मत में क्या लिखा है पता नहीं?
मन में यह शंका घर करती है कि तुम जवाब दोगी भी या भी पाओगी (नही, नही ऐसा नही हो सकता ) या तुम्हें अगला पत्र लिखने के लिए मैं यहाँ मौजुद रहूंगा भी या नहीं? यह उस परमपिता के हाथ में हैं, हमें इतनी भी चिंता नहीं करनी चाहिए।
अंत में इतना ही कहूँगा, STAY HOME, STAY SECURE....
.....
PIC- Karan DC writting a letter on the roof of his home..

नैसर्गिक बंधन तो हालाकि पलभर हैं,
                                    टूट जाएंगे आज नहीं तो कल को।।
समाज के बंधनों में जो बंधी हो तुम,
                                  तुमसे काफी है मुलाकात एक पल को।।

प्रकृति का यह रौद्र रूप भी एक दिन समाप्त हो ही जाएगा बस तुम अपना ख्याल रखा।।

                                                                                                With love
                                                                                             Yours
                                                                                             Music
                                                                                             27.3.2020... शुक्रवार

नोट- पत्र में लिखी गई सारी बातें काल्पनिक हैं इनका जीवित या मृत किसी व्यक्ति से कोई संबंध नहीं है।

@ जांगिड़ करन

Saturday, 22 February 2020

सफ़र


जब भी होता हूँ सफ़र में,
दिल में कोई सफर चलता है।

सफ़र उस राह तक का
सफ़र उस रात तक का
जिस रोज तुमने पहनी थी चूड़ी
सफ़र खनकती बाँह तक का,
कोई ख्वाब जबकि अब भी पलता है।
जब भी ........................

सफ़र उस छाँव का
मिट्टी से महकते गाँव का
न तुमको खबर थी न मालुम हमको
कदम पीछे हटा किस पाँव का,
क्यूँ ये वक़्त भी बेवक़्त छलता है।
जब भी ..........................

हमने शहर कहाँ देखा है
तेरे मेरे बीच यहीं तो रेखा है
तुम्हारा इरादा तो अच्छा ही होगा
किस्मत का भी यही लेखा है,
दिल है कि अब भी जलता है।
जब भी ............................

तुम रहो जिन्दगी के सफ़र में 
मोड़ पर बैठ गया मगर मैं 
बालों में सफेदी आने तो दो
तुम भी रहोगी तन्हा शहर में,
देखना करन सूरज कहाँ ढलता है।
जब भी................................
@ जांगिड़ करन(बलराम)
22.02.2020....... 20:30 PM

Monday, 6 May 2019

परछाई 2

न कोई पर्दा
न कोई खिड़की ही थी,
चांद आज
बिल्कुल सामने था.....
बस नजरें झुकी थी
चेहरा खामोश था,
आंखों में उलझन थी,
पैरों में रूकावट थी,
हाथ किसी को बुलाते से लगे,
बालों का रंग जरा पक गया लगता है,
हां,
मगर एक बात
अब भी
वैसी ही थी,
बालों में लगी वो
गुलाबी पिन
आज भी गुलाबी ही थी,
हां,
साड़ी का रंग
देखने की फुर्सत मुझे कहा,
मैं तो बस
एकटक
गुलाबी पिन से
अलग होकर उड़ते
कुछ बाल
देख रहा था,
बालों में पड़ते वो
बल,
जो वक्त की
वक्राकार
नियति को दिखाए
मुझे चिड़ा रहे थे आज भी,
और मैं दूर खड़ा
हाथों से हवा में हर बार
जैसे
तुम्हारे उन बालों को उपर करने
की
कोशिश में लगा रहा,
जैसे वक्त को
बदलने की
कोशिश कर रहा था
मैं।
Karan
06_05_2019

A letter to swar by music 53

डियर स्वर, दिन ढल चुका है। शहर की शोरगुल भरी सड़कें अब धीरे-धीरे शांत होने लगी हैं। दिनभर लोगों की आवाजाही, गाड़ियों के हॉर्न और भागती-दौड़त...