Showing posts with label my dreams. Show all posts
Showing posts with label my dreams. Show all posts

Saturday, 18 June 2016

रेत से ख्वाब

मैं अक्सर
भर लेता हुँ
अपनी मुट्ठी रेत से
हाँ ख्वाबों की रेत....
जानते हुए कि
मुट्ठी में रेत
रूकनी तो नहीं,
कण कण ही सही
फिसल जाना है इसे.....
और मैं
मुट्ठी को मजबूत
भी नहीं कर सकता
कहीं रेत का
दम न घुट जायें....
बस हर बार
फिर से भर लेता हुँ मुट्ठी
उसी रेत से
जानते हुए कि
फिर से फिसल जानी है...
मगर एक......
मगर एक आशा है कि
कभी तो प्रेम की
बारिश होगी
रेत पर
जब वो भीग जायेगी
तब शायद
मेरी मुट्ठी में
रूक जायेगी
और मैं बनाऊँगा
एक सपनों का महल उससे
वो रहेंगे फिर हम साथ साथ
सदा के लिये......
©®करन जाँगीड़ kk
10/06/2015_ 7:00 AM

A letter to swar by music 54

  Dear swar, मुझे अब भी खटकता है, तेरा नदी के उस पार होना। सांसें बेशक हैं मगर, जिंदगी का यह कैसा अफसाना।। पता नहीं क्यों, लेकिन इन दिनों...