Dear swar,
मुझे अब भी खटकता है, तेरा नदी के उस पार होना।
सांसें बेशक हैं मगर, जिंदगी का यह कैसा अफसाना।।
पता नहीं क्यों, लेकिन इन दिनों तुम्हारी बहुत याद आती है। ऐसी याद, जिसे किसी काम में उलझकर भी टाला नहीं जा सकता। दिन अपने हिसाब से गुजरता रहता है, लोग मिलते हैं, बातें होती हैं, हँसी-मजाक भी होता है… लेकिन दिन खत्म होने पर मन फिर वहीं आकर रुक जाता है—तुम्हारे पास।
शायद तुम्हें यह सब थोड़ा अजीब लगे, लेकिन सच कहूँ तो तुम्हारे दूर होने के बाद मुझे छोटी-छोटी चीज़ों में भी तुम्हारी कमी महसूस होने लगी है। कोई अच्छी बात होती है तो सबसे पहले तुम्हें बताने का मन करता है। कोई परेशानी होती है तो लगता है तुमसे बात कर लूँ, शायद मन थोड़ा हल्का हो जाए। और कई बार तो बिना किसी वजह के ही फोन उठाता हूँ, तुम्हारा नाम देखता हूँ और फिर रख देता हूँ।
हमारे बीच बस एक नदी है, लेकिन कभी-कभी लगता है जैसे उसके साथ-साथ बहुत कुछ बह गया है—वो बेफिक्र बातें, वो साथ बिताए पल, वो बिना किसी वजह के मुस्कुरा देना।
तुम उस पार हो और मैं इस पार।
दोनों की दुनिया शायद अपनी जगह चल रही है, लेकिन मेरा मन अभी भी तुम्हारे आसपास ही कहीं अटका हुआ है।
मैंने बहुत बार खुद से कहा है कि दूरी की आदत डाल लेनी चाहिए। आखिर हर चीज़ हमेशा हमारे मुताबिक तो नहीं होती। लेकिन दिल को समझाना इतना आसान कहाँ होता है? उसे तो बस तुम्हारी याद आती है और वह पुराने दिनों की तरफ लौट जाता है।
कभी तुम्हारी कोई बात याद आती है, कभी तुम्हारी हँसी। कभी तुम्हारा यूँ ही नाराज़ हो जाना और फिर थोड़ी देर बाद खुद ही सामान्य हो जाना। ये सब बातें शायद तुम्हारे लिए बहुत मामूली हों, लेकिन मेरे लिए नहीं हैं। मेरे पास अब इन्हीं छोटी-छोटी यादों का सहारा है।
तुमसे दूर रहकर एक बात समझ में आई है—किसी की मौजूदगी की असली कीमत तब पता चलती है, जब वह पास नहीं होता।
तुम्हारे साथ रहते हुए शायद मैंने कभी नहीं सोचा था कि तुम्हारी एक छोटी-सी बातचीत भी मेरे दिन को कितना बेहतर बना देती है। अब समझ आता है।
मैं यह पत्र तुम्हें किसी शिकायत के लिए नहीं लिख रहा। न ही तुम्हें किसी बात के लिए मजबूर करना चाहता हूँ। बस मन में जो था, उसे कह देना चाहता था। क्योंकि कुछ बातें जितनी देर दिल में रहती हैं, उतनी ही भारी होती जाती हैं।
कभी-कभी सोचता हूँ, काश यह नदी थोड़ी छोटी होती। काश तुम्हारे और मेरे बीच इतना फासला न होता। काश किसी शाम अचानक तुम इस किनारे आ जातीं और मैं बिना कुछ कहे बस तुम्हें देखता रहता।
शायद उस दिन मुझे किसी शिकायत की जरूरत नहीं पड़ेगी।
मैं तुमसे यह भी नहीं पूछूँगा कि तुम्हें मेरी याद आती है या नहीं। शायद कुछ सवालों के जवाब जान लेना जरूरी नहीं होता। कुछ रिश्ते जवाबों से नहीं, उस एहसास से चलते हैं कि कहीं न कहीं कोई हमें
याद करता है।
बस इतना जान लो कि इस किनारे पर एक इंसान आज भी तुम्हें याद करता है।
जिंदगी चल रही है, बिल्कुल पहले की तरह।
बस पहले जैसी लगती नहीं।
सांसें चल रही हैं, दिन गुजर रहे हैं, रातें भी कट जाती हैं… लेकिन तुम्हारे बिना इनमें एक खाली जगह है, जिसे मैं चाहकर भी भर नहीं पाता।
और शायद इसी वजह से तुम्हारा नदी के उस पार होना आज भी खटकता है।
कभी समय मिले तो इस पार जरूर आना।
शायद बहुत सारी बातें हैं, जो सामने बैठकर कहनी हैं।
तुम्हारा,
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