Showing posts with label मील का पत्थर. Show all posts
Showing posts with label मील का पत्थर. Show all posts

Monday, 3 August 2015

जागृति

तु होना ना निराश इन अंधेरों से,
इस रात की कोई सुबह तो है|

मानाकि स्वार्थ के समंदर में डुबे है सब यहाँ,
कहीं निस्वार्थ भावना का झरना भी तो है|

दम तोड़ते दिखते है रिश्ते सभी इस भागदौड़ में,
कहीं पे रिश्तों में सुनहरी सी पदचाप भी तो है|

है अमीरों की बस्ती ही ज्यादा रोशन यहाँ,
गुदड़ी के लालों का कहीं पे उजाला भी तो है|

मानाकि हरदम हीं जमाने ने दी है ठोकरें 'करन'
इन्हीं ठोकरों में कहीं मील का पत्थर भी तो है|
©® jangir karan dc

A letter to swar by music 52

Dear swar, कई रोज़ हुए मुझे तुम्हारा कोई ख़त नहीं मिला। पहले तो मैं हर सुबह दरवाज़े की आहट पर चौंक जाता था, जैसे डाकिए के हाथों में तुम्हारे...