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Thursday, 18 June 2026

A letter to swar by music 52

Dear swar,



कई रोज़ हुए मुझे तुम्हारा कोई ख़त नहीं मिला।
पहले तो मैं हर सुबह दरवाज़े की आहट पर चौंक जाता था, जैसे डाकिए के हाथों में तुम्हारे शब्द चले आ रहे हों। फिर धीरे-धीरे इंतज़ार आदत बन गया और आदत के बाद एक ख़ामोशी। अब तो हालत यह है कि कभी-कभी अपने ही मन को समझाना पड़ता है कि शायद तुम व्यस्त होगे, शायद रास्ते बदल गए होंगे, या शायद तुम्हें मेरा पता ही याद न रहा हो।

ख़ैर, छोड़ो।

शिकायतें हमेशा दूरियों को और लंबा कर देती हैं। इसलिए आज शिकायत नहीं करूंगा। बस इतना बताने आया हूं कि मैं अब तुम्हारे शहर में हूं।

अजीब बात है न? कभी तुम्हारे शहर तक पहुंचना एक सपना लगता था। सोचता था कि जिस दिन यहां आऊंगा, तुम सामने मिलोगे। उन गलियों में साथ चलेंगे जिनका ज़िक्र तुम अपने ख़तों में किया करते थे। उन रास्तों को देखूंगा जिन्हें तुमने अपनी आंखों से देखा था। उन पेड़ों की छांव में बैठूंगा जिनके नीचे बैठकर तुमने कभी मुझे याद किया होगा।

लेकिन देखो, नियति भी कैसी है।

मैं तुम्हारे शहर में हूं, तुम्हारी हवाओं के बीच हूं, उन्हीं रास्तों पर चल रहा हूं जहां शायद कभी तुम्हारे कदम पड़े होंगे, मगर फिर भी तुमसे मिल नहीं पाया। और सबसे विचित्र बात यह है कि यहां आकर भी मैं तुमसे आमने-सामने बात नहीं कर रहा, बल्कि तुम्हें ख़त ही लिख रहा हूं।



शायद कुछ रिश्ते ऐसे ही होते हैं। उनके बीच की दूरी किलोमीटरों से नहीं नापी जाती। कभी-कभी दो लोग एक ही शहर में होते हैं और फिर भी उनके बीच वर्षों का फ़ासला होता है। और कभी कोई बहुत दूर होकर भी हर पल हमारे साथ रहता है।

आज शाम मैं शहर की एक सड़क पर अकेला चल रहा था। लोग अपने-अपने कामों में व्यस्त थे। दुकानों पर रोशनी थी, चाय की भाप हवा में घुल रही थी, बच्चे खेल रहे थे, और मैं भीड़ के बीच खड़ा होकर तुम्हें याद कर रहा था। अचानक लगा कि अगर इस वक्त तुम सामने आ जाओ तो शायद मैं कुछ कह ही न पाऊं। जो बातें बरसों से मन में जमा हैं, वे शब्दों में नहीं उतरेंगी। इसलिए सोचा, एक बार फिर ख़त का सहारा लिया जाए।

तुम जानती हो, समय बहुत कुछ बदल देता है। चेहरे बदल जाते हैं, शहर बदल जाते हैं, रास्ते बदल जाते हैं। लेकिन कुछ प्रतीक्षाएं ऐसी होती हैं जो उम्र के किसी मोड़ पर भी वैसी ही रहती हैं। तुम्हारा इंतज़ार भी शायद उन्हीं में से एक है।

मैं नहीं जानता कि यह पत्र तुम तक पहुंचेगा या नहीं। यह भी नहीं जानता कि तुम्हें मेरा पता याद है या नहीं। मगर इतना जानता हूं कि जब तक स्मृतियां जीवित हैं, तब तक कोई भी रिश्ता पूरी तरह समाप्त नहीं होता। वह कहीं न कहीं, किसी कोने में, किसी पुराने ख़त की तरह सुरक्षित रहता है।

आज तुम्हारे शहर में बैठकर यह पत्र लिखते हुए मुझे महसूस हो रहा है कि शायद हम दोनों के बीच शब्द ही सबसे सच्चा पुल रहे हैं। मुलाक़ातें नहीं हुईं, आवाज़ें कम सुनीं, मगर शब्द हमेशा आते-जाते रहे। इसलिए एक बार फिर इन्हीं शब्दों के सहारे तुम्हारे दरवाज़े तक पहुंचने की कोशिश कर रहा हूं।

अगर कभी यह ख़त पढ़ो तो जवाब ज़रूर देना।

क्योंकि कई रोज़ हुए मुझे तुम्हारा कोई ख़त नहीं मिला...

और देखो, मैं अब भी वहीं खड़ा हूं, जहां आख़िरी बार तुम्हारे शब्दों का इंतज़ार छोड़ आया था।

तुम्हारा
Music

Friday, 29 September 2017

A letter to swar by music 38

Dear swar,
.......
बरसात का दौर थम सा गया है, और उधर खेतों में फसल भी पकने को आई है तो खेत खाली किए जा रहे हैं, नदी के पानी में भी ठहराव सा आ गया है, मौसम भी थोड़ा समझ से परे है बिल्कुल तुम्हारी तरह ही, क्योंकि ठंड और गर्मी का मिश्रण सा है अभी तो बीमार होने की आशंकाएं भी ज़्यादा है, और फिर उजड़ा हुआ चेहरा, सुखे होंठ, सूझा हुआ नाक सबकुछ बड़ा अटपटा सा लगता है....
और उधर सूने होते खेत जैसे मेरे सपने उड़ा कर ले गया कोई, जैसे कि दिल बस खाली खाली सा कर गया कोई, नदी का जो पानी ठहरा तो लगा जिंदगी ठहर सी गई है और ठहरा पानी हो या जिंदगी..... जानती हो ना अच्छा नहीं लगता।
पर करें भी तो क्या?
नदी को बहते रहने के लिए बरसात की जरूरत है और मुझे चलते रहने के लिए.....
हां, तुम्हारी!!
अब बोलो आगे अकेला चलकर कहां जाऊं?
क्यों जाऊं?
किसके लिए जाऊं?
मगर.....
देखो मैं......... मुझे अहम नहीं है कि मैं बार बार खुद को दिखाता हूं कि मैं हुं,
पर मैं.. मुझे कुछ बातों का यकीन अब भी है,
रास्तों की हकीकत कुछ भी हो ख्वाबों में फूल खिलाना मेरी फितरत में है तो है....
और तुम तो हर उस ख्वाब में साथ रही जब कभी भी मैंने देखा हो......
बात ख्वाबों की है....
चाहें जागते देखूं या नींद में.....
अरे हां....
कल रात एक ख्वाब देखा,
मतलब कि आया...
अरे हां बाबा जो भी हो समझ तो गई ना......
तो सुनो.....
ख्वाब भी क्या ख्वाब था....
हम तुम अनजान थे बिल्कुल भी, न मुझे मालूम था कि तुम करता सोचती हो न तुम्हें मालूम था कि मैं किस तरह का इंसान हूं... एक दिन किसी कारणवश मैं तुम्हारे शहर में आया, बाजार से कुछ सामान लेना था शायद... उधर तुम भी अपनी मम्मी के साथ शॉपिंग(हां, तुम्हारी भाषा में यहीं बोलते हैं ना) करने आई हुई थी.....
मुझे शुरू से ही आईसक्रीम बहुत पसंद हैं तो मैं तो मौका देखता कि कब शहर हो आऊं ताकि आईसक्रीम खाने का मौका मिल सकें....
तो हुआ यूं कि उस दिन में जैसे ही आईसक्रीम पार्लर में घुसा तो एक लड़की ( यानि तुम) को आईसक्रीम वाले से बहस करते सुना, पर क्या बहस थी यार, और बहस की वजह सिर्फ छोटी सी थी आईसक्रीम खाने की चम्मच और कप प्लास्टिक के थे, और तुम एक ही रट लगाए थी इनसे शरीर को नुकसान कितना होता है.. एकबारगी तो मैंने भी सोचा कि कहीं तुम कोई ऑफिसर तो नहीं हो जो इस तरह उस दुकानदार से बात कर रही थी.... लेकिन बाद में पता चला कि तुम तो उस शहर की वासी हो और रोज ही उस दुकानदार से बहस करती हो कि ये कप और चम्मच बदल दो... और रोज आईसक्रीम तो खाकर ही जाती हो..... माजरा समझ से परे था... पर मुझे क्या?
मुझे तो आईसक्रीम खानी थी तो जाकर एक कुर्सी पर बैठ गया......
पर?
पर यह क्या?
तुम अचानक उधर से दौड़कर आई और बोली, "ओये मिस्टर! यह टेबल मेरी है?"
मैं तो बोलता भी क्या तुम्हें देखता रहा आगे तुमने क्या क्या कहां मालूम नहीं, पर जब तुमने अपने हाथ से मेरी आंखों के सामने चुटकी बजाई तो तंद्रा टूटी..... पर पता नहीं क्या हुआ कि मैं उठ ही नहीं पाया!
और तुम थोड़ी देर खड़ी रहकर कुछ बोली मुझे तो लास्ट में इतना सा सुनाई दिया idiot कहीं का....
फिर दुसरी टेबल पर जाकर मम्मी के साथ बैठ गई....
और चुपचाप आईसक्रीम खाने लगी मेरी नज़र अब भी तुम पे थी......
और वो दुकानदार तुमसे कुछ कह रहा था वो मुझे भी जानता था क्योंकि मैं अक्सर यहां आईसक्रीम खाने आता रहता हूं....
फिर....
तुम लोग तो आईसक्रीम खाकर चलें गये....
मैंने आईसक्रीम खाकर पैसे देने चाहें तो दुकानदार बोला कि पैसे तो वो देकर चली गई...
(अब यह ड्रामा समझ से परे लगा अचानक)
पर जल्द ही समझ आ गया क्योंकि दुकानदार ने बताया कि उसने आप लोगों को बताया कि मैं भी आईसक्रीम का बहुत शौकीन हूं और दुसरा जांगिड़ हूं.... मतलब तुम ने मेजबानी कर ली.....
वो भी बिना किसी जान पहचान के...
अजीब लगा... पर करता भी क्या?
कहां ढूंढता?
..............
सुनो,
मेरी नींद उड़ गई (घरवालों ने उठा दिया मुझे और आईसक्रीम की बजाय चाय पी)....
पर सुबह ही चेहरा वही....
टेबल भी...
हां,
कप प्लास्टिक का नहीं स्टील का गिलास है....
........
वो तो एक ख्वाब था नींद का.... जागते हुए भी तो मैंने हर पल तेरे ही ख्वाब देखें है!
पर!
ख्वाब तो ख्वाब होते हैं कहां पूरे होते हैं....
बस एक पंक्ति याद आ रही है....
....
रास्ते अजनबी नहीं मगर,
पैरों में थकान सी है.
तेरे शहर में आयें या नहीं,
धड़कन भी हैरान सी है।
......
बस....
दिल कहता है खुश रहना...
....
With love
Yours
Music

©® जांगिड़ करन kk
29_09_2017____11:00AM

A letter to swar by music 54

  Dear swar, मुझे अब भी खटकता है, तेरा नदी के उस पार होना। सांसें बेशक हैं मगर, जिंदगी का यह कैसा अफसाना।। पता नहीं क्यों, लेकिन इन दिनों...