न कोई पर्दा
न कोई खिड़की ही थी,
चांद आज
बिल्कुल सामने था.....
बस नजरें झुकी थी
चेहरा खामोश था,
आंखों में उलझन थी,
पैरों में रूकावट थी,
हाथ किसी को बुलाते से लगे,
बालों का रंग जरा पक गया लगता है,
हां,
मगर एक बात
अब भी
वैसी ही थी,
बालों में लगी वो
गुलाबी पिन
आज भी गुलाबी ही थी,
हां,
साड़ी का रंग
देखने की फुर्सत मुझे कहा,
मैं तो बस
एकटक
गुलाबी पिन से
अलग होकर उड़ते
कुछ बाल
देख रहा था,
बालों में पड़ते वो
बल,
जो वक्त की
वक्राकार
नियति को दिखाए
मुझे चिड़ा रहे थे आज भी,
और मैं दूर खड़ा
हाथों से हवा में हर बार
जैसे
तुम्हारे उन बालों को उपर करने
की
कोशिश में लगा रहा,
जैसे वक्त को
बदलने की
कोशिश कर रहा था
मैं।
Karan
06_05_2019
और मैं, मेरी चिंता न कर मैं तो कर्ण हुँ हारकर भी अमर होना जानता हुँ
Monday, 6 May 2019
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A letter to swar by music 53
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हर दोपहर जिंदगी जाने कितने ख्वाब बदलती है। ज्यूं सुबह से घटती है परछाई, ख्वाबों की भी किस्मत घटती सी लगती है, दिल में कुछ बैचे...

बहुत ही सुंदर ,
ReplyDeleteयादें,,,, अकेला नही होने देती
वाह
ReplyDeleteबेहद खूबसूरत
वाकई गागर में सागर जैसी कविता
बहुत बहुत शुक्रिया
Deleteवाह शानदार......वो गुलाबी पिन👌
ReplyDeleteबहुत बहुत शुक्रिया सर
Deleteये कल्पना है या वास्तविकता, समझ नही आता
ReplyDeleteकल्पना ही है, हकीकत तो मेरी ज़िंदगी भी नहीं है
DeleteWaaahhh
ReplyDelete👌👌👌👌
thank you जी
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