Friday, 15 September 2017

A letter to swar by music 36

Dear SWAR,

Time make the situation, & situation create the art.... & Art....
Art is..…...........
It's not necessary to tell you...
You can understand yourself.......
......
हां तो,
सबसे पहले तो जिंदगी के हर पल में खुशियों की सौगात रहे यह दुआ दिल से करते हैं हम। बाकी मालूम तुमको भी है कि वक्त परीक्षा लेता रहता है तुम्हारी भी और मेरी भी.... हमारी ही नहीं सबकी लेता है... कभी पास रखकर तो कभी दुरियां बनाकर अहसास दिलाता है खुद के होने का, जरूरी भी है ना सब... बाकी खुद को समझने और खुद के होने का पता कैसे चलता....
और दुसरी बात.....
कला....
मनुष्य ने जन्म से ही कला का दामन थामा है, लकड़ी के पहिए और पत्थरों के औजारों से हुई शुरुआत आज कहां आकर पहुंची है..... और, कला मेरी नज़रों में अपने आप में तो उपजती नहीं इसके पीछे आवश्यकता सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण बात होती है.....
और
इसी आवश्यकता ने हमें भी तो कुछ कला सीखाई है...... एक मान्यता है कि रसोई का काम संभालना औरतों का काम है पर अगर अब देखा जाये तो क्योंकि औरतों ने हर उस क्षेत्र में अपनी सहभागिता दर्ज की है... तो जरूरी नहीं कि रसोई का काम सिर्फ औरत ही करें.... आवश्यकता पड़ने पर पुरूष को भी काम करने से हिचकिचाना नहीं चाहिए....
अब आते हैं असली बात पर...... मैं तो बचपन से ऐसे माहौल में रहा हूं जहां रसोई से पाला पड़ा है और बचपन में तो किस्मत ने रसोई से जोड़ें रखा.... वो भी एक वक्त था शायद भगवान को इसकी अपनी स्क्रिप्ट में आवश्यकता थी इसलिए लिख दिया ऐसा ही बचपन.... खैर.. वो छोड़ो!!!
अब यह सुनो,
वक्त का चक्र......
पता नहीं कब क्या दिखा दें।
मेरा तो इस वक्त से जैसे कोई 36 का आंकड़ा है, कुछ न कुछ नया कारनामा दिखाता रहता है....
अभी पिछले सप्ताह वापस रसोईघर का मुंह दिखा दिया वैसे तुम्हें मालूम तो है ना रसोईघर का काम तो मुझे भली-भांति आता है.......
तो चलो आज तुम्हें रसोईघर का मेरा यह अनुभव बताता हूं...
सबसे पहली बात तो मुझे उलझन उन डिब्बों में हुई मालुम है ना 20 डिब्बे सब एक जैसे किसमे क्या रखा है कैसे मालूम हो। हर डिब्बे को उतार उतार कर देखता था कि जो चाहिए मिल जाएं..... पर एक बात बतायें तुमको इन डिब्बों को उतारते वक्त एक ख्याल तो आया ना दिल में... हां!! सच्ची में।।।
मैंने सोचा कि तुम यहां होओगी तो जब रसोईघर में काम करते वक्त उंचाई पर पड़े डिब्बों में से कोई डिब्बा उतारना पड़ा तो मुझे ही बुलाओगी ना.... और!! वो मौका भी गज्जब का होता.. तुम्हारे हाथ आंटें से लथपथ, जुल्फें ओढ़नी से बाहर झांकती हुई.... मैं खुद को रोक तो नहीं पाता ना....
और तुम भी मुझे नहीं रोक सकती.....
.......आज शरारत करने दो काम बाकी करेंगे कल...........
खैर.... यह मेरी एक कल्पना थी और कल्पना को तो किसी हादसे से भंग होना ही है... शायद तवे पर रखी रोटी जलने लगी है (मुझे तो नहीं मालूम पड़ा क्योंकि मैं तो तेरे ख्वाब में खोया था पर बाहर से आवाज आई मारसाहब रोटी जल रही है) और कल्पना की गाड़ी को रोक में जल्दी से गैस की तरफ भागा.... देखा तो चांद सी गोल और सफेद रोटी में चट्टानों सा काला निशान बन गया है.... हाथ से जल्दी ही उसको तवे से हटाकर साइड में रखा... और फिर बेलन चकले की आवाज आने लगी फिर.... खैर एक बात तुम्हें और बता दूं मुझे अभी भी पुरी तरह गोल रोटी बनाना नहीं आता है...
सुनो!!!
एक काम करें मैं तुम्हारी तरह गोल रोटी बनाना सीखता हूं तुम मेरी तरह बेइंतहा मोहब्बत सीख जाओ ना और...
और तो हर पल तुम्हारी जीत की दुआ करता आया हूं... अब यही चाहता हूं कि तुम्ही जीत जाओ... पता नहीं मगर..
शायद मेरी आवाज़ तुम तक पहुंचती भी है या नहीं...
खैर छोड़ो....
आगे सुनो,
सब्जी में जब मसालें को पकाता हूं तब छन छम छन की सी आवाज आती है जैसे कोई संगीत बजा हो, जैसे तुमने पाजेब पहने घर में कदम रखा हो, जैसे कि तुमने अपनी चुड़ियों को खनखाया हो....
और मैं युही पता नहीं किस धुन में खोकर बर्तन से चंग की धाप जैसे बजाने लगता हूं!!! इस इंतजार में कि कहीं से चहकती नाचती गाती हुई आ धमको तो....
तुम्हें मालूम है इसी धुन और तुम्हारे ख्यालों में खोयें रहने से स्कूल में अक्सर लेट हो जाता हूं... फिर वहां भी बहाना तुम्हारा ही बनाता हूं कि वो वहां से फोन आ गया तो रास्ते में बात करते हुए आ रहा था तो देर हो गई....
मालुम है ना....
झूठ भी कितने कायदे का बोल लेता हूं यह तो तुमसे ही सीखा है..... सच्ची मुच्ची!!!
कुछ परिस्थितियां बनती है रोज ही रसोईघर में अलग अलग तरह की.....
कभी तो तुम्हारी धुन में खोया रहा और सब्जी में नमक दो बार तो कभी बिल्कुल भी नहीं, कुकर की सिटी बजती तो तुम्हारा सिटी बजाना याद आता, और कढ़ाई में तेल गरम होने पर आती खुशबू मेरे घर को महकाती जैसे कि तुमने अपने होने का अहसास कराया हो......
खैर यह सब तो चलना है....
तुम सुनाओ अपना...
अपनी बकरियों का ख्याल रखती हो या नहीं?
तुम्हारे यहां जंगल में झाड़ अब और भी हरे हो गए हैं ना?
नदी नालों में साफ पानी आ रहा होगा ना?
देखना.....
उस पहाड़ी पर एक दिन मैं फिर आऊंगा इस तुम्हारे लिए घर से मैं खुद खाना बनाकर टिफिन पैक करके लाऊंगा.....
तुम..... खाओगी ना!!!!

With love
Yours
MUSIC

©® Karan KK
15_09_2017___7:00AM

Saturday, 9 September 2017

A letter to love by karan

सुनो प्रेम,

जग में अमर बस प्रेम है, हर कोई कहता ये बात।
हां  मगर  यह  जान लो, मैं प्रेम  को  दुँगा मात।।
.........
इस दुनियां के उद्भव के साथ ही उस परम पिता ने जीवों में कुछ महसूस करने योग्य शक्तियां भेजी है। अक्सर लोगों को कहते सुना होगा कि केवल मनुष्य ही वो प्राणी है जिसमें प्रेम, घृणा आदि मन के भाव पैदा होते है जबकि सच तो यह है कि संसार के लगभग प्रत्येक प्राणी में ये सब भाव पाये जाते है। हां सब के इन भावों को दर्शाने के तरीके अलग अलग होते हैं।
क्या कभी देखा है कोई गाय उस समय चुपचाप बैठी रहती है जब कोई अन्य गाय या पशु उसके बछड़े पर हमला कर दें, नहीं ना... गाय का अपने बछड़े के प्रति प्रेम नहीं तो और क्या है?
हम अक्सर देखते है कि रोटी या हड्डी के टुकड़े के लिए कुत्ते आपस में झगड़ते हैं क्या यह घृणा, ईर्ष्या, गुस्सा नहीं है?
हां, बाकी प्राणी जगत के पास इन भावनाओं को प्रकट करने के कोई प्रभावशाली तरीके नहीं है। और हम मनुष्यों को इसके लिए अलग से कुछ कुछ शक्तियां मिली है जो इन भावों को प्रकट करने में हमारी सहायता करती है। अब देखिए ना हम अपने जीवन के अधिकतर कार्य सिर्फ और सिर्फ प्रेम, ईर्ष्या, घृणा, क्रोध के वशीभूत होकर करते है। हम धन का संचय इसलिए करते हैं कि आने वाली पीढ़ी सुखी रहें,
यह हमारा उनके प्रति प्रेम ही तो है।
..........
आओ,
अब बात करते हैं प्रेम की, सिर्फ और सिर्फ प्रेम की। अक्सर हम लोगों को कहते हुए सुनते हैं कि प्रेम समझ से परे है, हां, यह सत्य भी है, हम सभी यह समझ नहीं पाते है कि किसी के प्रति हमारे मन में प्रेम के आगमन का ठीक ठीक समय क्या था? इसकी भूमिका बनने में कौनसी परिस्थिति उत्तरदायी थी?
यह प्रेम कब तक यूं जारी रहेगा या
प्रेम की सफलता निश्चित है या अनिश्चित?
हम बस प्रेम करने या न करने में उलझे रहते हैं। क्या कभी हमने सोचा है कि इस प्रेम और हमारे जीवन का क्या संबंध है? क्यों अक्सर किसी एक के प्रति हम अपने मन में इतनी गहरी भावना लिए घूमते रहते हैं?
इन सवालों के जवाब तो खुद प्रेम के पास भी नहीं है। वो खुद हैरान हैं कि क्यों कुछ लम्हों में उसका रूप बदल जाता है?
किसी के मन में उसकी कितनी गहरी जड़ें है?
और मैं.......
और मैं खुद प्रेम से उलझ पड़ा हुं कुछ ऐसे ही सवालों के साथ.......
।।।।।।।।।।।।।
हां तो सुनो प्रेम.....

सबसे पहले तो उस वक्त और तुम्हारे फैसले का अभिनंदन करता हुँ जब तुमने मेरे मन में अपने बोयें थे। पर एक सवाल है कि क्या तुमने उस वक्त जरा भी सोचा कि किस तरह की प्रवृत्ति के इंसान में अपनी उपस्थिति दर्ज करा रहे हो?
क्या तुमने मेरे सोचने की शैली के बारे में सोचा? क्या तुमने उस वक्त यह सोचा कि तुम्हारे आगमन से मन पर किस तरह का प्रभाव पड़ेगा? क्या तुम्हें अब भी वो परिस्थितियां याद है जब तुम अपने होने का अहसास मुझे करा रहे थे?
हां,
मैं तुम्हारे उस रूप की बात कर रहा हुँ जिसका मतलब अक्सर तुम्हारा नाम लेते ही निकल आता है, हां, वहीं नैसर्गिक प्रेम, हां!! वहीं प्रेम जो दो इंसानों को जीवन के कुछ पलों को साथ जीने के लिए प्रेरित करता है। हां, वहीं प्रेम जो जीवन पथ की बैलगाड़ी के दो बैलों की कहानी बनाता है।
हां, तो सुनो,
तुम्हें कुछ भी है या याद नहीं होगा शायद!
पर, मैं नहीं भूला हूं अब तक भी वो बातें, वो लम्हें जो तुम ख्वाबों में दिखलाते थे....
मुझे याद है कि तुमने किसी के माध्यम से मेरी जिंदगी के स्वर में एक नई धुन डाली थी, मुझे जिंदगी के एक अलग पहलु का अहसास कराया था।
हां, तुमने किसी के मन में मेरे प्रति अनुराग पैदा किया था...
मैं उस वक्त से बदला बदला सा रहने लगा था जैसा कि तुम अपने इस काम के लिए मशहूर हो तुम्हारी जीत थी यह...
है ना!!!
मगर सुनो प्रेम,
तुम भूल गए, मैंने कहा ना तुम्हें कि तुम यह देखना भूल गए कि जिसको शिकार बनाना चाह रहे थे वो किस तरह का इंसान हैं।
तुम सिर्फ अपनी जीत के गुमान में रह गए...... है ना!! यह सोचकर कि तुमने मुझे किसी का दीवाना बना दिया....
हां प्रेम.... मैं उस वक्त से आज तक भी दीवाना हूं उसका और रहूंगा....
अब सुनो तुम,
तुम्हारी वो जीत कुछ पल की जीत थी बाकी तुम खुद जानते हो क्या हो रहा है?
सुनो!
हालांकि मैं अभी जीता नहीं हूं मगर तुम्हारी हार तय है...
तुम्हारी हार के कारण गिनाता हूं तुम्हें.....
तुमने जिस इंसान को कब्जे में किया उसकी खासियत देखो....
सुनो प्रेम,
मैं तब भी प्रेम में हूं जब कोई मुझसे कोसों दूर है दूर भी ऐसे कि उसे मालूम तक नहीं कि मैं कितनी शिद्दत से आज भी उसकी खोज खबर की कोशिश करता हूं, इतना दूर कि उसे मेरे नजदीकियों से तलक नफरत है, इतना दूर कि फुर्सत तक नहीं कि कभी मेरे हालात का जायजा लें....  मगर मैं तब भी उससे प्रेम करता हूं उतना ही जितना कि सूरज को शाम से है, जितना कि तारों को सुबह से है.....
मुझे आने वाले वक्त का मालूम है मगर फिर भी मुझे प्रेम है......
और सुनो प्रेम,
तुम्हारा वो फैसला, तुमने अधिकतर महसूस किया होगा वक्त के साथ लोग बदलते हैं, भी ग़लत साबित करेंगे हम...
सुनो तुम,
मेरा प्रेम जैसा आज है वैसा ही रहेगा....
उस समय भी जब वो नदी के उस छोर पर होगी और मैं इस छोर पर,
उस समय भी जब महकते हुए हाथ उम्र के इक पड़ाव पर कांपने लगेंगे,
उस वक्त भी जब उसके मोती से चमकते दांत हिलते हुए मिलेंगे,
आज जिन आंखों में झांककर मैं प्यार के नगमें गुनगुनाता हूं वो आंखें लगभग बंद से होगी मगर तब भी मैं प्रेम करूंगा,
और सुनो,
जिन होंठों को आज लरजते हुए देखता हूं जब उम्र के इक मोड़ पर थर-थर कांपेंगे मगर तब मैं इनके छुने की कोशिश करता रहूंगा,
मैं तब भी प्रेम करता रहूंगा जब वक्त के चक्र में उसके बाल पककर सफेद हो जायेंगे,
सुनो प्रेम,
वक्त का वो दौर मुझे नहीं हिला पायेगा....
मैं जानता हूं तुम अपनी जीत यही मानते हो कि वक्त के साथ इंसान वो सब भूल जायें जिसका अहसास तुम शुरुआत में करवाते हो...
मगर...
मैं नहीं भूलने वाला....
तुम्हें भी नहीं
खुद को भी नहीं
और
उसको तो कभी नहीं.....
सुनो प्रेम,
तुम मुझसे हार जाओगे.....
©® करन जांगिड़ KK
09_09_2017__21:00PM

Alone boy 24

चंदा हम तुम कितने तन्हा
रात तारों भरी
मगर उदासी है....
बादलों में फैली
तुमको
तलाश है धरती पर किसकी?
.......
मैं देखता तुमको
तारों के बीच
कुछ ढूंढता
हूं
क्या तुम देखा
मेरे चाँद को कहीं
सवाल वहीं फिर मुझसे तुम्हारा
तुम्हें आसमां में तलाश किसकी?
........
चंदा हम तुम
चलो
सो जाये....
शायद वो
ख्वाब में आ जाये
कर रहे हम कब से
तलाश जिसकी!!

@karan kk

Photo by karan

Friday, 8 September 2017

धड़कन

रात सुनी धड़कन सुनी इक छन की तलाश में,
आंख सुनी नजरें सुनी इक चांद की तलाश में।

बादल आज बरसने को बैताब हर जगह पर,
लेकर जाएं उनको बैठे इक हवा की तलाश में।

आदतन जिंदगी कब चाहती है दूर रहें मुझसे,
बैठी होगी द्वार पर इक मौके की तलाश में।

गौरी कब सिंगार करेगी पिया से मिलने रातों में,
काजल बिंदिया कंगन झुमके कब से तलाश में।

आंख हो या हो नदी या हो समंदर भी करन,
नीर की नियति बहना है बिन मौके की तलाश में।।
©® Karan KK

Monday, 21 August 2017

A letter to swar by music 35

Dear swar,
......................
रंगों से भरी है दुनिया
रंग ही जीवन
रंग ही खुशी
रंग से चलती है सौगातें
रंग हर जुबां की भाषा
..........
सुनो,
यह धरती जब से बनी है तब से यहां पर रंगों का अपना महत्त्व रहा हैं, गर्म लावे से उबलती धरती का लाल रंग भी किसी को भाया होगा लेकिन पता है फिर किसी को शायद यह रंग अच्छा न लगा उसे अपनी पसंद का रंग चाहिए था तो उसने धरती का रंग ही बदलने की ठान ली और यही से तो शुरुआत हुई थी जीवन की.......
हां,
पता नहीं मैं तो नहीं जानता पर कई हजारों पहले किसी अलौकिक शक्ति ने, धरती के इस लाल उबलते रंग से ही धरती पर पानी की कवायद शुरू की और फिर महासागरों का निर्माण किया जो आज हमें नीले सफेद रंग में लुभाते हैं....
और सुनो,
इसी लाल लावे से बनी धरती से निर्माण हुआ पीले और काले पर्वत और पहाड़ों का जो हमें अक्सर अपनी ओर खींचते हुए से लगते हैं.....
और देखो, पहाड़ों से निकलती सफेद नदी कितनी लुभावनी सी लगती है इतनी साफ की इसके नीचे के काले पत्थर पानी के उस पार साफ दिखाई देते हैं....
और सुनो,
इसी के साथ प्रकृति ने शुरू की अपने रंग बिरंगे पेड़ पौधों फल फुलों की सौगात, न जाने कितने रंग समेटे हुए है यह प्रकृति......
मालूम है ना,
जब सर्वप्रथम मनुष्य का जन्म हुआ होगा तब प्रकृति के रंगों का उसे भान नहीं रहा होगा वो हर पल उदास रहा होगा पर ज्यों ज्यों उसने इन रंगों को देखा और समझा उसके जीवन में खुशियों की शुरुआत हुई होगी.....
और फिर......
आज जिसे देखकर मैं सबसे ज्यादा खुश होता हूं उस रंग का अस्तित्व भी आया, आया क्या वो तो पहले से था पर लोगों की नजर में आया....
हां... वो नीला आसमान, नीले से थोड़ा हल्का सा, है ना... तुम्हें काफी पसंद है वो रंग.....
तुम्हें मालूम हो कि मैं अक्सर इस नीले आसमान को देखता रहता हूं इस आसमान में बनती बिगड़ती आकृतियों को देखता हूं। देखता हूं तुम्हारा रूप आसमान के इस नीले रंग के नीचे तैरते सफेद बादलों के बीच....
तुम इस आसमानी रंग में ही नजर आती हो और दुसरे पल गायब....
कभी किसी गाड़ी पर सवार,
कभी तेज धावक सी भागती हुई,
कभी रण में लड़ते किसी योद्धा सी लगती हो,
तो कभी किसी राजकुमारी सी.......
मैं देखता हूं तुम्हारे हर रूप को आसमान में और देखता रहता हूं उस समय तक भी जब तक की आसमान में काले बादल न छा जायें और रिमझिम बारिश शुरू न जायें...
और फिर मालूम है ना जब पानी बरसता है तो प्रकृति अपनी छटा बिखेरती है, हरे पत्ते, कई रंगों के फूल.....
हां,
कहीं गुलाब के से गुलाबी फूल भी तो खिलते हैं.....
तुम्हें मालूम है ना मुझे गुलाबी रंग बहुत पसंद हैं.... मैं अक्सर ढूंढ लेता हूं इस रंग में रंगी वस्तु को वो चाहे पेन ही क्यों न हो.....
अरे हां,
पेन से याद आया....
दोनों पेन आज भी जेब में साथ ही रखता हूं जानती हो ना बात पेन की नहीं बात रंगों की है आसमानी और गुलाबी रंग की....
और मेरी जिंदगी तो अब रंगों का खेल मात्र रह गई है....
कभी सफेद तो कभी काला.....
और सुनो जान,
अक्सर मैं रात के काले अंधेरे में आंखों से आसमान की ओर ताकता हूं, मुझे मालूम है वहां भी रंग काला ही है मगर मेरी आंखें देख लेती है एक साथ कई रंग इस काले आसमान में भी.....
देखो जान,
मैं जब आंखें बंद करता हूं ना रात में तो मुझे मेरी जिंदगी बहुत ही खिलखिलाती हुई और रंगीन नजर आती है....
हरे घास के मैदान, पीले पीले फूल,रंग बिरंगी तितलियां, काली पीली बकरियां, पानी के किनारे अटखेलियां करता हुआ सफेद सारस का जोड़ा, उपर नीला आसमान और.......
सामने से तुम सभी रंगों को समेटे भागती हुई आ रही हो जैसे....
हां,
नीली आंखें, थोड़े कम काले केश, वहीं गुलाबी जूड़ा, हाथों में हरे कंगन, साड़ी के किनारे पर सूरज की चमक सी पीली बॉर्डर, आसमान को अपनी ललाट पर बिंदिया के रूप में सजायें हुए और फिर भागते हुए ही अपने हाथों से पानी को उछाल कर बनाती सफेद धाराएं......
शायद तुम्हारे पीछे आसमान में इसलिए ही तो इंद्रधनुष बना हुआ दिख रहा है मुझे....
.......
रंग बिरंगी धरती पर
कितने रंग और बनें....
तेरी मुस्कुराहट से,
सब रंग चहुं ओर बनें।।
........
खिलें हुए चेहरे से
रंगों की बरसात हुई.....
अक्सर ऐसे मौकों पर,
जज़्बातों के पैबंद बनें।।
........
सुनो जान,
मैं जानता हूं कि.........
चलो अब जानें भी दो कहने से भी कोई मतलब तो नहीं है.....
बस....
काफी है...
हां,
जिंदगी अब भी यहां बेरंग है.....
तुम इंद्रधनुष बन आ जाना....
.....
With love
Yours
Music

©® jangir Karan DC
20_08_2017___10:00AM

फोटो खुद ही अलग अलग जगह और समय पर खींचे हैं....
1. स्वर
2. पेन (बात रंगों की है)
3. स्कार्फ (बांधना नहीं आता पर बात रंगों की है)
4.शर्ट(बात रंगों की है)
5. शर्ट(पहला सेलेक्शन रंग से)
6. टी-शर्ट+पेन(बात वहीं है)

Sunday, 13 August 2017

A letter to swar by music 34

Dear Swar,
..................
बहारें तस्वीर से आयें या हकीकत से,
जिंदगी तो हर हाल में खिलखिलानी है।।
........
और देखो,
इधर बरसात के बाद रौनक ही रौनक छाई है, हर एक के चेहरे पर खुशी, हर तरफ हरियाली, नदी में बहता वो निर्मल पानी... कुछ कुछ तुम्हारे ख्यालों से मिलता जुलता है। देखो ना..... मिट्टी से कोई खुशबु निकल रही है जैसे।
नदी के पानी में अठखेलियां करते पंछी न जानें किस बात की याद दिलाना चाहते हैं, इनके परों से उछलते पानी की कलाकृतियां अपने आप में अद्भुत होती है, शाम को सूरज की लाल पीली किरणें जब नदी के बहते पानी पर पड़ती है तो जिंदगी के सभी रंगों को अद्भुत तरीके से प्रस्तुत करती है।
सुनो,
नदी के पानी की कल-कल जिंदगी के सुमधुर संगीत की याद दिलाती रहती है, क्या तुमने कभी अकेले में सुना है नदी के इस संगीत को, क्या कभी झरने से बात करने की कोशिश की है, क्या तुम्हें याद है नदी के पानी में हम दोनों अपने पैरों को डुबाये कुछ गुनगुनाते थे, चलो मैं ही बता देता हूं.......
...........
तु जब जब मुझको पुकारे, मैं दौड़ी आऊं नदी किनारे......
...........
हां, अब तो याद आया ही होगा.....
आवाज़ में तुम्हारी कैसी मासुमियत थी ना, अरे! वो तो अब भी है, बस मजबूरियों की बंदिश लगा दी तुमने अपनी जुबान पर.....
सुनो,
मैं अब भी वहां बैठ कर नदी की कल कल के साथ वही गीत गुनगुनाता है, किसी जवाब की प्रतीक्षा में मगर नदी की कल कल और हवा की सरसराहट के अलावा कुछ भी नहीं सुनाई देता.........
खैर मैं बैठ कर तुम्हें याद तो कर ही लेता हूं......
.....
अब सुनो,
तुमने अभी अभी कुछ कहां था मुझे, ऐसा मुझे लगा। हां, मेरे कानों में वही प्यारी सी आवाज आई... "चिशमिश"?????
अबे!!! तुम भी तो idiot हो ना....
और सुनो,
चश्मे की अपनी कहानी, पता है मैं हर रोज जब चाय पीता हूं तो चाय के कप से उठती भाप चश्मे के काँच पर छा जाती है, पता है तब चाय या कटोरी नहीं दिखती मुझे। हां, इस धुंध लगे काँच से जब धुंध हटती है धीरे धीरे तब ना!!! तब तुम्हारी तस्वीर बनाती जाती है और काँच बिल्कुल साफ होने पर चाय में भी तुम ही नजर आती हो, और मगर....
मगर यह क्या मैं ज्यूं ही कप को होठों से लगाने के लिए उठाता हूं तो तुम गायब... हां, ठीक है... पता है तब चाय का स्वाद और भी बढ़ जाता है!!!!
अरे हां याद आया!!! और idiot, चाय बनाना सीख गई या वहीं चासनी जितनी मिठी? और फिर कहना कि थोड़ा दूध और डाल दो ठीक हो जाएगी!
.......
और सुनो,
इस बारिश के मौसम में चश्मा पहने मैं जब बाइक पर कहीं जा रहा होता हूं तो पता है बारिश आ ही जाती है और चश्मे के काँच पर पानी आ ही जाता है कुछ पल मैं परेशान हो जाता हूं कि सामने देखूं कैसे?
और परेशान होकर मैं चश्मे को सर पे ऊपर चढ़ा लेता हूं पर यह क्या यह तो वापस नीचे खिसककर आंखों के सामने ठहरता है और साथ ही फ्रेम के कॉर्नर पर तुम दिखाई देती हो चश्मे के काँच से पानी साफ करते हुए।
बारिश रुक जाती है, चश्मा साफ है मैं तुम्हें देखने के लिए चश्मा उतार कर देखता हूं मगर तुम वहां नहीं हो,
तुम सच में वहां थी क्या?
या
यह मेरा भ्रम था!!
.......
और सुनो,
तुम्हें मालूम है ना जब भी तुम सामने आती हो मैं चश्मा उतार कर देखता हूं तुम्हें...
...
खैर तुम नहीं समझोगी, मैं तो युही कहता रहता हूं, मगर करूं भी तो क्या?
यही कर सकता हूं ना!!
......
दिल में बसी कोई तस्वीर जो है,
बिन नैन खोलें भी देख लेता हूं मैं
......
हां,
सुन idiot अपना ख्याल रखना...
...
With love
Yours
Music

©® जांगिड़ करन kk
13_08_2017__19:00PM

Wednesday, 9 August 2017

A letter to swar by music 33

Dear swar,

Whether I deserve something but didn't get it.
........
आसान राहें चुनी ही नहीं मैंने,
दोष किसको दूं जो थक गया हूं।
.........
तुम्हें शायद यह मालुम नहीं है कि मैं बचपन से ही जिंदगी से दो दो हाथ करता आया हूं, जिंदगी हर वक्त मेरी राहों में कुछ न कुछ अड़चन डालने को उद्धत रहती है। पता नहीं क्यों इसे मेरे से इतनी जलन होती है, मैंने तो कोई ऐसा महान काम किया नहीं जो यह मुझसे जलें.... मगर इसकी फितरत तो देखो, एक मासूम से बच्चे को सताना शुरू किया था इसने आज तक भी यह क्रम जारी है..... बचपन में ज्यादा फर्क नहीं पड़ता था क्योंकि दोस्तों के संग समय निकल जाता था और इतनी समझ भी नहीं थी कि दुखों से जीवन पर असर कोई असर पड़ता, लेकिन धीरे-धीरे समझदारी बढ़ती गई वैसे वैसे ये घटनाएं दुखों का पहाड़ बनती गई। और देखो ना, मैं किसी भी तरह हर बुरे वक्त में मुस्कुरा देता हूं पर अगली बार फिर उससे ज्यादा गहरा घाव देती है जिंदगी........
..........
फक़त इश्क से ही निपटना होता तो कोई बात नहीं,
जिंदगी ने हर कदम इक नई जंग से रूबरू कराया है।
..........
सुनो,
कभी कभी थक सा जाता हूं, इतना ज्यादा कि पता ही नहीं चलता कि मैं कहां हूं और क्यों हूं? किस दिशा में हूं?
एक बात सुनो, कभी कभी अकेले में मेरे चीखने की आवाज भी मेरे कान बेंध देती है फिर कई कई दिनों तक वहीं आवाज बजती है कानों में..... मैं खुद से डरने लगा हूं अकेले बैठने पर जैसे वक्त मुझे काटने को दौड़ता है पर बात यह भी है कि यह दर्द सुनाऊं भी किसको? और कौन सुनेगा?
और हां, कोई इलाज नहीं है मेरे साथ होने वाली इस बदनसीबी का, कोई कुछ नहीं कर सकता तो सुना कर भी क्या करूं?
और उल्टा सबको परेशान करना है?!!
सुनो जान,
मैं बस वक्त की इस बेरहमी पर अकेले में बैठकर चुपचाप अश्रु बहा लेता हूं और आंखें सूख जाने पर ही सबके सामने आ पाता हूं,
जानती हो क्यों?
क्योंकि उन सबके सवालों के जवाब नहीं दे पाता हूं मैं, मुझे मालूम है कि देर सबेर सबको मालूम होना है पर अभी तो...............
......
देखो,
मैं जानता हूं कि तुम्हारे अपने सपने हैं, तुम्हारी अपनी मजबूरियां हैं मगर.......
तुम यह जान लो कि मैं वक्त की इस बेरहम चाल से छलने वाला हूं, उस वक्त मेरी स्थिति क्या होनी है मैं नहीं जानता,
मगर इतना जानता हूं,
मुझे उस समय सबसे ज्यादा जरूरत तुम्हारी होगी,
हां मेरी जान,
मैं उस वक्त सिर्फ तुम्हारे कंधे पर सर रखकर थोड़ा रो सकूंगा, तुम साथ रहोगी तो मेरे थके कदमों में कुछ जान आयेगी, तुम्हारे होने से मुझे यूं लगेगा कि आगे जिंदगी में कुछ बाकी है....
सुनो ना!!!
तुम्हें उस वक्त आना है,
हर हाल में आना है,
क्योंकि,
मैं वक्त की चाल नहीं बदल सकता मगर तेरा साथ पाकर चलने की कोशिश तो कर ही सकता हूं, मुस्कुराने भर की कोशिश तो कर सकता हूं....
सुनो......
.....
वक्त जब छलने आये,
किस्मत को बदलने आये,
तुम मुस्कान लिए अपनी.....
इसको ठेंगा दिखा देना,
मेरी जीत की राह सजा देना.........
.....
मंजूर मुझे नहीं हां यह भी,
किस्मत पर मगर जोर कहां?
बात यहीं कि सहना है,
यहीं दर्द फिर ओर कहां?
तुम आकर वक्त को बता देना...........
..................
I know the stumping time. But I can't do anything to stop it or to win the game before stumping. It's not my fault but really I am in a bond of time, the bond of nature.
Only can see the game with wet eyes, with trembling lips....
You know.........
I will wait for you on the time to discover my world....
.........
With love....
Yours
Music

©® जांगिड़ करन kk
08_08_2017__12:00PM

प्रकृति और ईश्वर

 प्रकृति की गोद में ईश्वर कहें या ईश्वर की गोद में प्रकृति ......  जी हां, आज मैं आपको एक ऐसे प्राकृतिक स्थल के बारे में बताऊंगा जहां जाकर आ...