Tuesday, 21 March 2017

मोहब्बत का समंदर

मुझे युँ आजमाने की कोशिश न कर।
अंधेरा  बताने  की  कोशिश  न  कर।।

झर्रे  झर्रे  से  दर्द  ही  रिसता है यहाँ,
मेरे दिल को छलने की कोशिश न कर।

आकाश भर  ऊँचाई  पर है  सपनें मेरे,
राह में  छोड़  जानें की  कोशिश न कर।

मेरे लफ़्जों​ की बुनियाद तुम्हीं हो स्वर,
खुद को चुराने की  युँ  कोशिश न  कर।

मैं  समंदर  मोहब्बत  का  हुँ  करन,
नफरतों से भरने की कोशिश न कर।
©® जाँगीड़ करन kk
21_03_2017___6:00AM

No comments:

Post a Comment

A letter to swar by music 54

  Dear swar, मुझे अब भी खटकता है, तेरा नदी के उस पार होना। सांसें बेशक हैं मगर, जिंदगी का यह कैसा अफसाना।। पता नहीं क्यों, लेकिन इन दिनों...