Thursday, 23 March 2017

कोई बात नहीं

नजर  यहां  हर एक नजर को छलती है।
आँसु की इक बूंद ही आँखों में पलती है।।

जिसको  देखकर मुस्करा  देता हुँ मैं युहीं,
उन निगाहों में मेरी जिंदगी खटकती है।।

क्या खोया कितना खोया किसको कहें अब,
ये रात की खामोशी बस युहीं जलती है।।

कोई तो वजह बता के जाता ए जाने वाले,
क्या मेरी चाहत ही मेरी आखिरी गलती है।।

किसका  यकीं करें तो  करें यहां पे करन,
मासुमियत भी यहां खंजर लिए चलती है।।
©® जाँगीड़ करन kk
23_03_2017___6:00AM

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