Saturday, 28 November 2015

मैं वहीं आम का पेड़ हुँ

हाँ मैं वहीं आम का पेड़ हुँ,
जिस डाल पर बैठकर
कोई चिड़िया गीत सुनाती थी।
मेरी हरियाली भी
चिड़िया के मन को भाती थी।
हाँ,
जब चिड़िया अपने पंखों को फड़फड़ाती
तब मैं रोमांचित सा ऊठता, मेरे पत्ते हिल हिल कर अपनी खुशी जाहिर करते,
मेरी ही डाल पर
बैठकर उसने प्रेम का
गीत लिखा,
उसे गुनगुनाया,
पता है,
उस गीत में मैं इतना खो गया
कि मैें खाने पीने की
भी सुध खो बैठा,
हाँ।।।
पर नियती का क्या??
चिड़िया तो उड़ चली,
पर मैं
मैं कहाँ जाऊँ?
बस अब उदास सा
ठुँठ बन कर
रह गया हुँ,
न कोई हरियाली,
न कोई गीत।
कान तरस रहे है
अब भी
कि फिर से चिड़िया आयेगी,
फिर से डाली पर बैठकर
कोई गीत नया गायेगी।
मैं फिर हरा भरा हो
जाऊँगा।।

©® करन जाँगीड़

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