Monday, 2 November 2015

प्यार के स्वर

जूबाँ पर अपनी अब भी मेरा नाम लाते तो है|
कहती है सखियाँ उसकी वो शरमाते तो है||

कल रात ख्वाबों में वो अनायास ही मुस्कुराये थे,
लगता है मोहब्बत के दिन उन्हें भी याद आते तो है|

मेरे गीतों को गुनगुनाते हुए ही सोते है अब भी,
मेरे लफ़्ज आज भी उनकी जुबाँ पर इतराते तो है|

मालुम है उन्हें मैं देखुँगा चाँद में अक्स उनका,
इस खातिर वो चाँदनी रात में छत पर आते तो है|

कैसी दूरी कैसी मजबूरी उनकी यादे तो है 'करन'
हम भी गुनगुना के 'स्वर' प्यार को निभाते तो है|

©® करन जाँगीड़

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