Thursday, 10 March 2016

मेरा घरौंदा

कुछ समझे,
नहीं ना,
खैर छोड़ो
चलो फिर मैं कोई
ख्वाब सजाता हुँ
युँ बचपन सा
मिट्टी का घरौंदा बनाता हुँ।
तुम आकर मार देना ठोकर
मेरे अरमानों को
मेरे सपनों को
मेरे घरौंदे को।।
जानते हो ना!!!
घरौंदें की चार दीवारी
टूटती है ऐसे कि जैसे तुमने
मेरे सारे खत
फाड़ दिए हो तुने मेरे सामने।
घरौंदे की छत
आकर गिरती है जमीन पर
कि जैसे
मैं बेहोश होके
गिर पड़ा होऊँ।।
तुम्हारी ठोकर से
वह कागज की नाव भी
कुचल गई है ऐसे
जैसे दिल में अब साँसें भी
ना  बची हो मेरे।।

पर देखो ना!!
फिर से मैं सपने देखुँ
अरमान सजाऊँ
घरौंदा बनाऊँ
तुम ठोकर मारने तो
आओगे ना।
©® जाँगीड़ करन
10/03/2016_7:00 morning

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