Tuesday, 31 May 2016

बेटी तो बेटी होती है

बचपन  से ही  तो  वो  सयानी  होती है,
अरमानों  की  उसके  कुरबानी  होती है।

कभी  माँ की ममता सी बन जाती है वो,
बहिन मेरी कुछ ऐसी होती  सयानी है।

बन के जब वो दुल्हन पिया के घर जायें,
माँ भवानी की जैसे कोई कहानी होती है।

कभी बनी वो कल्पना तो कभी बनी सुनिता,
देश के लिये कुरबान इनकी जवानी होती है।

कौन  कहता है  कमजोर  होती है बेटियाँ,
पिता की अर्थी ऊठाकर वो मर्दानी होती है।

नमन करूँ मैं बेटियों को बारंबार ही 'करन',
एक जिंदगी में छिपी कई जिंदगानी होती है।
©® जाँगीड़ करन kk
31/05/2016_01:00 pm

Thursday, 19 May 2016

झील किनारे

समय की ताल पर  कदम थिरकने लगे है।
दिल में बसे अरमाँ फिर से मचलने लगे है।।

उतरा  है चाँद मेरा  झील किनारे दुबारा से
ख्वाब मेरे देखो ये फिस से महकने लगे है।।

मैं गुमसुम सा रहता न जानें किस दुनियाँ में,
लोग मुझे अब पागल आवारा कहने लगे है।।

मेरी मोहब्बत की दास्ताँ जो सुनी बादलों ने,
देखो तो वो भी खुशी से अब गरजने लगे है।।

मुसाफिर  को जब  आवाज दी अजनबी ने,
देखो  चलते  कदम भी अब ठहरने लगे है।।

पल जो बितायें है करन ने  संग चिड़िया के,
कि स्वर  मेरे फिर  से कुछ चहकने लगे है।।
©® जाँगीड़ करन KK
19-05-2016... 8:00 am
फोटो--साभार इंटरनेट

Sunday, 15 May 2016

जीवनचक्र 2030

घटनाक्रम -- 15 मई, 2030

"हैलो डार्लिंग!!! ऊठो भी अब" लगभग चादर खींचते हुए मैं बोला
"गुड मॉर्निंग अंकल!! आप भी ना!!!! अब तो छुट्टियाँ है शांति से सोने दीजिये।" नितेश ने आँखें मलते हुए कहा।
"आज कितनी तारीख है? तुम्हें मालुम है ना!"
"हाँ!! 15 मई!! पर इससे क्या?"
अरे!! तुम भूल गये? ऊठो!! अपना मुँह धोओ! सब याद आ जायेगा"
"ओहो! मुझे सब याद है अंकल! आज चिड़िया आंटी का बर्थडे है। और मुझे क्या करना है यह भी पता है।"
"अहा!! लव यु डार्लिंग! तो रेडी हो जाओ! मैं नाश्ता तैयार करता हुँ।"
"ओके अंकल!"
(नितेश बाथरूम में घुस जाता है , और मैं किचन में)
(थोड़ी देर बाद नाश्ते की टेबल पर)
"अंकल!! एक बात बताओ!"
"हाँ!! पुछो ना!"
" आपको मैं पिछले दस साल से देख रहा हुँ चिड़िया आंटी का बर्थ डे मनाते हुए पर आज तक चिड़िया आंटी नहीं आई कभी और न कभी आप मुझे मिलवाने ले जाते हो"
"बेटा!! एक दिन वो आयेगी"
"यह तो दस साल से सुन रहा हुँ, मगर अब तक नहीं आई!! और अब किस लिये आयेगी?"
"एक गिफ्ट का कुछ हिस्सा मेरे पास पड़ा है उसे जरूरत पड़ेगी उसकी!! वो लेने जरूर आयेगी"
"कौनसा गिफ्ट?"
"वो छोड़ो! तुम्हें याद है ना क्या क्या करना है?"
"हाँ! अभी जंगल जाकर सारे पशु पक्षियों को आमंत्रित करना है। फिर बर्थ डे की विशेष तैयारी भी... मैं जाता हुँ"
..............
(दोपहर लगभग बारह बजे नितेश तैयारी में बिजी है, मैं गाँव में कुछ काम से गया हुआ था, तभी दरवाजे पर घंटी बजती है, नितेश दरवाजा खोलता है, सामने कोई 35 साल की सभ्य महिला खड़ी थी)
"आप?? आप कौन?
" क्या यह करन जी का घर है?"
"जी!!! आप अंदर आइये!!"
(अंदर टी टेबल पर)
"आपके घर का नाम बड़ा प्यारा है- चिड़िया घर"
"हाँ!! वो मेरे करन अंकल ने रखा है"
"करन अंकल? मगर वो दिख नहीं रहे हैं?"
"वो गाँव में कुछ काम से गये है"
"ओहो!! ओके।। और आज घर में बड़ी अच्छी सजावट है कुछ खास है क्या?"
"हाँ!! आज तो चिड़िया आंटी का बर्थडे है"
"(घोर आश्चर्य से) क्या? चिड़िया आंटी? कौन है ये?"
"मैं भी नहीं जानता, अंकल जानें"
"(एक कमरे की तरफ इशारा करते हुए) क्या यह करन जी का कमरा है?"
"हाँ!!! मगर आपको कैसे पता"
"नहीं बस युहीं अंदाज लगाया"
(कमरे के पास जाकर)
"वाह!! क्या लिखा है हैप्पी बर्थ डे स्वर"
"वो भी अंकल ने ही लिखा है"
"मैं यह कमरा खोल सकती हुँ क्या?"
"ह ह ह! मुझे इतने साल हो गये है, पर आजतक इस कमरे में नहीं जा सका, क्योंकि दरवाजे पर पासवर्ड वाला ताला लगा है"
"तो!!"
"तो क्या!! पासवर्ड सिर्फ अंकल जानते है"
"मैं कोशिश करूँ?"
"हाँ!!! क्यों नहीं!! मैं तो थक गया हुँ सालों से कोशिश की है पर नहीं खुला"
(वो महिला ताले के चक्कर को इधर ऊधर घुमाती है और कुछ ही पल में क्लच की आवाज के साथ ही ताला खुल जाता है)
"(नितेश आँखें फाड़कर देखते हुए) आप कौन है?
" मैं!!! मैं चिड़िया हुँ बेटा"
"चीं चीं चीं!! चिड़िया आंटी!! आप!!"
"हाँ!! चिड़िया आंटी!! अब अंदर चलें!"
"नहीं!! मैं नहीं आऊँगा अंदर! अंकल ने मना कर रखा है, आप ही जाओ"
"ओह! ओके!!!"
(कमरा!! कमरा क्या अजायबघर!! चारों तरफ पेंटिंग्स चिड़िया की, बहुत सी डायरियाँ,  सामने टेबल पर एक काँच का छोटा बर्तन था जिसमें घड़ी की चैन के टूटे हुए कुछ हिस्से, एक बर्तन में कागज के कुछ टुकड़े जिन पर कुछ लिखा था, स्टडी टेबल पर एक फ्रेम थी जिसमें करन जी और नितेश का फोटो लगा था, पर जैसे ही फ्रेम उठाई तो फोटो चेंज, चिड़िया आ गई अब, कल की डायरी का पेज पढ़ा तो लिखा था कल चिड़िया का बर्थ डे मनाना है).....
(तभी दरवाजे पर घंटी बजती है और चिड़िया फटाफट कमरा बंद कर बाहर आ कर टी टेबल पर बैठ जाती है)
(नितेश दरवाजा खोलते हुए) अंकल!!! आप आ गये?
"हाँ!! मगर बाहर वो कार किसकी खड़ी है?"
"कार!!! वो किसकी है यह खुद आप देख लीजिये, सामने देखिये"
( और जब दोनों कि आँखें मिलती हैं तो दोनों को एक दुसरे के पहचानने में एक पल का भी वक्त नहीं लगता है, पर न जानें क्यों! दोनों एक दुसरे को एकटक देखते है, कुछ मिनिट तक)
"(नितेश चुटकी बजाते हुए) हैलो!!! अंकल! मैं भी हुँ यहाँ?"
"(झेंपते हुए) ओह!! तो मतलब नीतु!! तु इनसे बात कर चुका है? मतलब कि जानता है कि ये कौन है?
" हाँ!! और बहुत कुछ और भी जान गया"
"क्या?"
"कुछ नहीं!! बस युहीं। आप दोनों यहाँ बैठिये, मैं आपके लिये चाय बनाकर लाता हुँ।"
(और बिना जवाब की प्रतीक्षा किये वो तुरंत किचन में भाग गया, जबकि उसे चाय बनानी नहीं आती, शायद दरवाजे पर खड़ा होकर हमारी जासुसी कर रहा होगा)
(फिर टी टेबल पर)
"और सुनाइये मास्टर जी।"
"मास्टर जी!!! बहुत सालों बाद यह शब्द सुना है, तुम्हें अब भी याद है, मैं ठीक हुँ, तुम सुनाओ"
"आप ना!! बिल्कुल भी नहीं बदलें! पागल ही हो !! वैसे मैं भी ठीक हुँ"
और हाँ शादी क्यों नहीं की?"
"ह ह ह ह!! शादी!! किस्मत में नहीं थी"
"मुझे मत बनाओ, मुझे सब पता है"
"क्या सब पता है!! छोड़ो ये बैकार की बातें।। एक बात तो है तुम आज भी वैसी ही दिखती हो, हाँ, मोटी जरूर हो गई हो!"
"रियली?" तुम तो पागल हो?
"ह ह ह, वो तो मैं हुँ। कोई शक।
"कोई शक नहीं!!"
"और आपके पतिदेव? वो कैसे है?"
"वो तो उनके हाल में मस्त है, उन्हें मेरी या मेरी बच्ची की परवाह नहीं है"
"बच्ची? कहाँ है? साथ लायी?"
"नहीं! लाती तो वो अपने पापा से शाम को बोल देती कि मम्मी दिन में कहाँ गई थी"
"ओफ्फ!! पर लाना चाहिये था! वैसे तुम्हारी तरह क्यूट होगी गुड़िया भी"
"ह ह ह ह, हाँ क्यूट!! पता है किरन नाम रखा है मैनें, उसकी एक आदत आपसे मिलती है ढेर सारे सवाल, बिल्कुल आपकी तरह के, दिन में कई बार पुछती है मम्मी कैसे हो?
खाना खाया? वो अभी छ: साल की ही है पर बिल्कुल आपकी तरह केयर करती है मेरी"
"ओह!! क्या बात है! मुझे किरन से मिलना है।"
"मौका मिला तो मिलवा दुँगी! बस वहीं इक आस है जो जीने पर मजबूर करती है"
"क्यों? क्या हुआ?"
" कुछ नहीं पर!! सबकुछ सुना सुना सा लगता है, और किसी को कहने से रही, मैनें खुद अपनी दुनियाँ इस तरह बसाई है कि खुद पर अफसोस होता है"
"ऐसी बात नहीं है! सब अच्छा ही होगा"
"क्या अच्छा होगा? आप कहते थे ना आदमी जैसा दिखता है जरूरी नहीं अंदर से वैसा हो, अब समझ आता है, पर अब बहुत देर हो चुकी है, और मैनें जो अपराध किया है उसके लिये भी तो खुद को माफ नहीं कर पा रही हुँ"
"अपराध?"
"हाँ अपराध!! आप आज जिस तकलीफ को जानबुझकर सीने पे पत्थर रखकर सहन कर रहे हो, उसकी जिम्मेदार मैं हुँ"
"अरे नहीं यार!! ऐसा कुछ नहीं है, यह मेरी मानसिकता थी, और मैं दुखी कहाँ हुँ, मैं एकदम खुश हुँ देखो!"
"हाँ!! वो दिख रहा है, बड़े नाटकबाज हो, जोकर कहीं के, सबकुछ छुपाकर मुस्कुराना, यह आपसे बेहतर कोई नहीं कर सकता"
"अरे मैं रियली खुश हुँ"
"आप मुझे मेरा वो करन लौटा दो, जिसने कभी जिद्द करी थी कि चिड़िया तुम्हें आना है, वहाँ पर, वो करन चाहिये जो कहें तुम्हारे लिये देखो गजरा लाया हुँ, वो करन चाहिये जो दस बार पुछे कि अबे नौटंकी!! खाना खाया कि नहीं..... बस करन बहुत सहन कर चुकी हुँ, अब नहीं होता, प्लीज मुझे मेरे वो दिन लौटा दो!"
"चिड़िया!! देखो। वो समय अलग था, यह समय अलग है, तुम्हारी खुद की जिम्मेदारियाँ है, मेरी भी?"
"तो तुम भी बदल रहे हो? तुम्हीं कहा करते थे कि करन बदला नहीं करते, बस चुप रह जाते है"
"वो बात नहीं चिड़िया, मैं अगर बदलता तो कब की शादी कर चुका होता, मेरा प्यार सिर्फ नीतु और तुम्हारे लिये है, यह तुम अच्छी तरह से जानती हो, मगर...
" क्या मगर? जमाना? तुम भी डरने लगे?"
"डर? डर नहीं है!! बस जिम्मेदारियाँ! वक्त के साथ सबकुछ अलग तरह से करना पड़ता है"
"हाँ!! पता है!! लेकिन जानते हो, मैं हर रोज आपके ब्लॉग से रचनाएँ पढ़ती हुँ, वो कशिश आज भी उसी तरह बरकरार है, फिर मुझसे क्यों छुपाते हो?"
"तुम भी ना!! देखो रूलाओगी क्या? और हाँ ज्यादा सेंटी मत हो, वो नीतु आसपास छुपकर सब सुन रहा होगा, वो बच्चा नहीं, बाद में चिड़ायेगा मुझे?"
और हाँ ये तुम्हारे बाल भी पक गये है, मुझसे ज्यादा? तुम कहती थी ना कि आपके सर पे इतने जल्दी सफेद बाल आ गये? मेरे तो बहुत कम है सफेद पर तुम्हारे तो?
"हाँ!! तुम्हारी याद में शायद।?"
"अरे नहीं!! तुम मस्त रहा करो! मेरी चिंता न करो, जानती हो ना, मैं कर्ण हुँ हारकर भी अमर होना जानता हुँ।?
" यह हार नहीं जीत है आपकी, हारी तो मैं हुँ।"
"ना, ना, ना!! तुम जीती हो, तुमने वो कर दिया जो तुमने सोचा, मगर मैं नहीं कर सका"
"जो आपने चाहा वो ही तो किया ना आपने, वैसे आप कितने अच्छे हो"
"ह ह ह ह। यह लाइन रहने दो अब! शुरू में सुनी थी तुम्हारे मुँह से अच्छी लगती थी, लेकिन अब?"
"अब क्या हुआ!! अच्छे हो अब भी!!"
"ओफ्फो!! यह बातें छोड़़ो, और बाकी क्या चल रहा है?"
"कुछ नहीं, दिन काट रही हुँ, अच्छा अब चलती हुँ, घरवाले इंतजार कर रहे होंगे"
"अरे!! रुको!! तुम्हारा बर्थडे है। तुम यहाँ हो तो केक काट कर जाओ"
"ओह!! आप!!! तुम कितने अच्छे हो करन"
"अबे पागल!! अब रुलायेगी क्या?" नीतु बाबा!!!! वो केक लाओ तो!"
"(किचन से) अभी लाया अंकल"
(और फिर हैप्पी बर्थडे चिड़िया की आवाज घर में गुँजने लगी, एक दुसरे को केक खिलाया)
"करन, एक कल्पना है कि आप ऐसे ही खिलाते रहो मुझे!"
"ओहो!! जब खाने का मन हो चली आना"
"(बीच में ही) अंकल!!! क्या चल रहा है?"
"नहीं तो!! कुछ नहीं!! तुम यह बाकी का केक छत पर चिड़ियों के लिये डाल आओ"
(बाकी केक हर बार की तरह छत पर चिड़ियों को डालने के लिये नीतु ले गया)
"(चिड़िया ऊठते हुए)तो!! अब मैं चलुँ?"
"हाँ!!!! चलना तो है ही! तुम शुरू से ही बहुत जल्दी में रही हो! पर वो घड़ी अब तुम्हारे हाथ में बहुत टाइट आ रही होगी, बाकी की कड़ियाँ ले जाओ, पड़ी है कमरे में, लगवा देना!
" वो तो मैनें देख ली है, कमरे में, और हाँ घड़ी वास्तव में टाइट लगती है अब!!"
"कैसे देखी?"
"लॉक खोल कर!! पासवर्ड तो वहीं है ना"
"ओहो!!!. तो जाओ लेकर आओ!"
(कमरा!! कमरे में दोनों।। बस यादें। कुछ और सवाल जवाब, आखिर जिंदगी सवालों में ही तो ऊलझी है)
"सॉरी करन जी!! मेरी सब गलतियों की वजह से.....
" श्श्श्श !!!!! बस अब नहीं!! तुम जाओ!! मैं बहुत खुश हुँ यहाँ! हाँ कोई प्रॉब्लम हो तो बता देना!"
"बा। बा। बा। बाय। टेक केयर"
"बाय बाय!! आराम से जाना"
।।।।।
(और फिर घर में कुछ मिनटों तक सन्नाटा, और सन्नाटें को तोड़ती आवाज सीढ़ियों से आई)
"अंकल!! क्या चिड़िया आंटी हमेशा के लिये यहाँ नहीं रह सकती?"
"नहीं बेटा!! वो मजबूर है"
"ओह अंकल!! आप कितने अच्छे है।"
( और दोनों सिर टकराकर रो पड़ते है)
©® जाँगीड़ करन KK.

Friday, 13 May 2016

आवाज का जादु

.....................आवाज का जादु......................
______________________________________

जब दूर कहीं पे चिड़िया चहके लगता है कि तुम हो,
जब कहीं मंदिर में घंटी बजे तो लगता है कि तुम हो।

जब सूनी दोपहर में कहीं पेड़ की छाँव तलें सोया हुँ,
हवा से पतों की सरसराहट हो तो लगता है कि तुम हो।

कभी साँझ ढलें गाय रँभाती है तो लगता है कि तुम हो,
चुल्हें की खटपट आवाज से युँ लगता है  कि तुम हो।

स्कूल में जब मैं वर्णमाला के उच्चारण करवाता हुँ,
तो क से कबूतर की ध्वनि पर लगता है कि तुम हो।

नदियाँ के पानी की कल कल की ध्वनि में भी तुम हो,
कहीं हिरणों की पदचाप सुनँ तो लगता है कि तुम हो।

जब मोबाइल में बजती है तुम्हारी पसंदीदा रिंगटोन,
और स्क्रीन पर उभरता फोटो तो लगता है कि तुम हो।

जब तन्हाई की रात में बैचेन सोया चाँद को निहारता हुँ,
दिल की धक धक से कुछ ऐसा लगता है कि तुम हो।।

हाँ यह सब तेरी आवाज का ही तो जादु है करन,
चिड़िया रूबरू न सही पर युहीं लगता है कि तुम हो।
_________________________________________
©® जाँगीड़ करन KK
13/05/2015_5:00am morning

Thursday, 21 April 2016

गौरी( दो राजस्थानी दोहे)

1.गौरी  थारा  रूप  ने,  देख  समंदर  आज।
   आपो तो वो खो दियो, उलटा करे जहाज।।
.........................

व्याख्या- प्रस्तुत दोहे में एक आवारा अपनी भोली लेकिन बहुत ही सुंदर प्रेमिका के बारे में बखान करता है। यह पंक्तियाँ तब लिखी गई जब वो आवारा अपनी प्रेमिका को समंदर के बीच से नाव चलाते हुए देखता है।। आवारा अपनी प्रेमिका से कहता है कि ए स्वप्न सुंदरी(गौरी) तुम्हारे को जब आज समुद्र ने पहली बार देखा है तो समुद्र का हाल भी बुरा है, उसके मन की लहरे उत्पन्न हो गई है, फलस्वरूप यह बहुत ही उत्तेजित हो गया है और इसमें तुफान आ गया है, और ये बाकी सब नाविकों की नावें पलट रहा है। यहाँ आवारा का सीधा से अपनी गौरी को संकेत है कि वो अपने रूप का जलवा वहाँ न दिखायें जरा घुँघट निकाल लें, ताकि समुद्र शांत हो जायें।
.................
Explanation - in this couplet the Madden lover describing about her simple but beautiful partner. These lines are written when the lover saw his partner in the middle of sea with her boat. Now the lover ask to his lover - O dream Queen, when the sea see you for first time today it's mood also has failed. In its heart there waves are created. So it is in so much disturbance. Now there is a huge storm in it. And it is destroying the boats of the voyage. The male lover ask to his partner that she should not show her beauty and should keep her head in veil, so the sea Can calm down.
..............

2. समंदर आ थु जाण लें, मनड़ो गौरी माय।
    थारा भी  गुण  गाँवुलो, वाने  घर पहुँचाय।।
....
व्याख्या- प्रस्तुत दोहो में पागल प्रेमी अपनी प्रेमिका की रक्षा खातिर समुद्र से निवेदन करता है। जब वह देखता है कि समुद्र में तुफान आने लगा है तो वो भयभीत हो जाता है और समु्द्र से तुफान को रोकने की मिन्नत करता है। वह समुद्र से कहता है कि मेरा मन गौरी(प्रेमिका ) में बसा हुआ है, अगर उसे कुछ हुआ तो मेरा जीना मुश्किल हो जायेगा। आगे प्रेमी कहता है कि हे समु्द्र देव ! अगर आप मेरी गौरी को सुरक्षित घर पहुँचा दोगे तो मैं आपके भी गुण गाऊँगा। आपकी महिमा का बखान अपने लफ़्जों में करूँगा।
प्रस्तुत पंक्तियों में पागल के मन में अपनी प्रेमिका के प्रति प्रगाढ़ प्रेम साफ दिखाई देता है।
.................
Explation- in this couplet the male lover worships to sea for protect his lover. When HE sees storm in the sea he got afraid and pray to God to stop the storm. He tells to God that his heart is with his lover, if there happens anything wrong his lover he can't be alive. Further the lover says that hey God of sea!!! If you take my partner safe at home I will tell the people about you. I will glorify about you in my own words.
In these lines the we can see the true love in the heart of lover.
.....
©® जाँगीड़ करन KK
21/04/2015_18:30 pm

Friday, 15 April 2016

तेरी महफिल

महफिल में भी खुद को तन्हा पाया हुँ।
जाने खुद को किस मोड़ पे ले आया हुँ।।

ये ऊजाले ये चकाचौंध सब बैगाने है,
मैं अंधेरी गुफा में रहता इक साया हुँ।

जरूरतों से बदल जाते है रिश्तों के मायने,
हर मोड़ पर जमाने के लिये आजमाया हुँ।

अहसास खुद के होने का भी नहीं है मुझको,
क्या फिर भी मैं कोई चलती फिरती काया हुँ।

तुमने गौर से देखा नहीं अपने दिल में,
मैं और बस मैं ही तो इसमें छाया हुँ।

और तो मालुम ही नहीं क्या बात है 'करन',
पर सोचुँ तुझे ही और तेरा ही 'स्वर' गाया हुँ।
©® जाँगीड़ करन KK
14/04/2016_20:50 pm

Thursday, 14 April 2016

A letter to swar by music 6

डियर स्वर,

हाँ अब यह 212 है। तुम्हें समझ आ गया है कि मैं क्या कहना चाह रहा हुँ। तुम खुद बहुत समझदार हो। यह मेरा तुम्हें लिखा छठा पत्र है, पर तुमने कभी जवाब दिया, पर मेरी तो आदत बन गई है तुम्हें लिखने की!!!
तुम इन्हें शायद पढ़ती भी हो या नहीं, नामालुम???
।।।।।
खैर,
आज तुम्हें बता रहा हुँ कि अभी मैं वापस उस पोखर के किनारे जो आम का पेड़ है ना वहाँ गया था। घर पे मन नहीं लग रहा था तो थोड़ी देर के लिये ठंडी हवा में आराम करने की सोची!!!
पर वहाँ बैठकर तो मुझे वो सब पुरानी बातें याद आने लगी।
कैसे हम वहाँ पर एकांत में बैठकर गुफ्तगुं किया करते थे।।।
ओह.....
छोड़ो उन्हें वो तो तुम्हें भी मालुम है पर अभी भी देखो मैं वहाँ अकेला हुँ पर तुम्हें महसूस कर सकता हुँ।।
पता है जब मैं वहाँ बैठा था तो पेड़ पर पत्तों की सरसराहट सी हुई, मुझे लगा कि तुम इन पत्तियों के पीछे से झाँक रही हो, बस पास आने से कतरा रही हो शायद।।।
और फिर इन्हीं पत्तों के बीच कुछ फड़फड़ाने की आवाज आई, तुम्हारे होने का पक्का अहसास हो गया, मगर पता है वो एक चिड़िया थी जो उड़ कर दुसरे पेड़ पर जा बैठी।
तुम भी तो चिड़िया हो।।।
।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।
पोखर की और से बहुत ही ठंडी बयार आ रही होती है, पता है वो पल जब तुम अपनी चुनरी के पल्लु से हवा करती थी, बस वहीं अहसास इस बयार से हो गया।
और वैसे ही आँखों में नींद के झौंके आ गये,
पर यह क्या कोई शायद पंछी शायद पोखर के पानी में नहाकर आया और आम की डाली पर बैठकर पंख झिड़कने लगा, जब अर्द्धनिद्रा में यें छीटें मेरे मुँह पर पड़े तो अचानक युँ लगा तुम अभी नहाकर आई हो अपनी गिली जुल्फों को मेरे मुँह पर लाकर झिड़क दिया हो........
कुछ याद आया.........
आयेगा तो सही.....................
मैं फिर पानी को निहारता हुँ, पंछियों की अठखेलियों से इसमें भँवर पड़ते है, इन भँवर को मैं जीवन के भँवर सा सोचकर कुछ ऊलझन सी महसूस करता हुँ कि आखिर क्या हो रहा है?
।।।।।।।।।।।।।।।
अरे देखो तो!!!!!
यें बकरियों का एक झुंड पानी पीने आया है, हाँ मुझे याद आया, तुम भी तुम्हारे गाँव की उस पहाड़ी के आसपास अपनी बकरियाँ चरा रही होगी,
छोड़कर भी तो नहीं आ सकती..........
मजबूर हो ना तुम......
मगर मैं,
मैं आज भी कहीं भी होऊँ तुम्हें सोचता हुँ, तुम्हें ही जीता हुँ, कभी तो तुम अपनी मजबुरियों से ऊपर ऊठकर सोचोगी!
।।।।।।
अपना ख्याल रखना, खासकर उस उस ऊँगली का जिसे सामने करके तुम स्टाइल मारती थी........ ओय्य्य्य!!!!
।।।।।।।।।।
फिलहाल इतना ही........
।।।।।
तुम्हारे इंतजार में.......
संगीत

©® जाँगीड़ करन KK
14/04/2016... 09:45 am

A letter to swar by music 53

डियर स्वर, दिन ढल चुका है। शहर की शोरगुल भरी सड़कें अब धीरे-धीरे शांत होने लगी हैं। दिनभर लोगों की आवाजाही, गाड़ियों के हॉर्न और भागती-दौड़त...