Saturday, 13 April 2019

परछाई 1


सुदूर किसी कौने में
झांक रही थी आंखें,
कुछ तलाश कर रही थी शायद,
तब
मन के किसी कोने में
ख्याल आये,
नीम का पेड़ वहीं,
पीपल भी वहीं,
बस बदली है
तो
मिट्टी की सड़क,
मिट्टी को
उस पक्की सड़क ने
ऐसे दबा दिया है जैसे
मेरे
अरमानों पर
वक्त की
चादर आ पड़ी थी,
खैर मैं हूं
जो
अब भी महसूस कर सकता हूं
सड़क के नीचे
दबी मिट्टी की महक को,
तेरे कदमों के
बनें निशां को,
तेरी जुल्फों के छिटकने से
मिट्टी पर बनें चित्रों को भी,
वो दूर
हैंडपंप की ठक ठक
मेरे कानों अभी भी
गूंज रही है.....
तुम न समझोगे
अरमानों की मिट्टी को,
तुम्हें तो
वक्त की पक्की
सड़कों ने
बदल के
रख दिया होगा ना....

©® Karan DC
13_04_2019___19:00PM

Saturday, 15 December 2018

Alone boy 30

अक्सर
शिकायत रहती है
मेरे सारे दोस्तों को,
चाय से तुम्हारा
इतना
गहरा रिश्ता
कैसे?
हर पल तुम्हें
चाय की
याद सी क्यों रहती है.....
मगर मैं जवाब में
मुस्कुरा देता हूं बस,
कोई
फर्क सिर्फ पड़ता कि कोई
क्यों कर सवाल करता है?
मगर,
जब भी अकेले में सोचता हूं तो
चाय के साथ जुड़े
किस्से याद आते हैं,
साथ ही याद आती है,
तुम्हारे हाथों से
बनी वो आखिरी चाय भी
जिसको पी लेना मेरे बस में न था,
मैं आज भी
हर चाय के साथ वो
पल याद करता हूं,
याद करता हूं
उस अंतिम चाय से
उठते धुएं के उस पार
दिखती
मजबूर तस्वीर को,
याद करता हूं
उन लफ्जों को जो
तुमने खुद न बनाये पर
कहना तो
तुम्हें ही था........
अक्सर एक कप चाय से
तुम्हें
महसूस कर लेता हूं,
कभी खिड़की से,
कभी नीम पर,
कभी जंगल के उन पत्थरों पर.......
अंकित है जहां
तुम्हारे और मेरे
जिंदा होने के सबूत,
वक्त की गर्द ढक देगी हालांकि
इनको
मगर
चाय के कप उठते धूएं में
हर पल
कोई तस्वीर
मजबूरी की
मैं बनाता हूं
मिटाता हूं,
बनाता हूं
मिटाता हूं.......

©® जांगिड़ करन
15_12_2018

Note - 51 से बाद के लैटर के लिए एक पुस्तक छापने के की तैयारी में हुं पर अभी थोड़ा व्यस्त हुं, 2019 के अंत तक या 2020 में पुस्तक जरूर आ जायेगी 😜

Monday, 15 October 2018

Alone boy 29

रुक्सत जो कर गई,
हवाएं
इधर शहर में
घुटन सी होती है।
चुपचाप खड़ी ये
अट्टालिकाएं,
सूरज की
रोशनी को
तरसती है।
शौरगुल से
परेशान पिल्ला
दुबका है,
मोहल्ले की
सबसे
गंदी नाली में।
दीवारों को ताकता
कोई,
डायरी में लिखे
दो लफ्जों से
तस्वीर
बनाने की जुगत में है,
मगर
हर बार
तस्वीर धूंधली ही
नज़र आती उसको,
कई दफा फिर
कोशिश करता है,
और
अंत में
समझ आता है उसको,
कल्पनाओं की
तस्वीरें
सुंदर तो होती है,
मगर साफ
नहीं हो सकती।
जिंदगी की जो
भूल करी
वो भूल
माफ नहीं हो सकती....
किंचित
वो समझ गया सारा ही रहस्य,
तस्वीर को
साफ करने,
वो निकल पड़ा है,
लफ़्ज़ों के
समंदर को
छिपी तस्वीर लाने,
वो निकल पड़ा है
जिंदगी की भूल
का
परिणाम बनाने,
शायद ये
लफ्ज़
अब
उसकी दुनिया है......
...........
A letter to swar by music 51 to 75..
Coming soon...

#करन

Friday, 5 October 2018

Alone boy 28

जैसे आसामां की
गोद में सोया
कोई ख्वाब,
पलकों के उस पार
कहीं कोई फुदकती है अब
आशाओं की डोर नहीं है
जो
बाँध लें उसको,
बस बंद आंखों में
कहीं दूर
आसमां के साये में
पंख फड़फड़ाते हुए से
नजर आते हैं।
इधर बादलों ने
घेरा है,
आंखों में समाकर कुछ
धुंधला सा
कर रहें तस्वीरों को,
मगर जब कभी
आंखें बरसकर साफ हो,
सब कुछ दिख
जाता है,
वहीं जो कई रोज पहले
किसी सपने में देखा करता था...
आसमां में बसते वो
दो तारे,
अक्सर एक दूसरे के
करीब आने
की
कोशिश में रहते, और
रात का घना अंधेरा
इस बात का गवाह होता....
मगर वक्त के
साथ
जानें क्यों
तारों की दूरियां बढ़ने लगी,
लगता कि कोई
एक तारे को
खींच रहा पीछे से....
मगर एक तारा अब भी
वहीं मौजूद, न किसी तारे से राग, न द्वेष,
बस निर्विघ्न
जिंदगी,
न किसी से कुछ कहता है, न सुनता है,
शायद अंधेरे से कुछ बात करता हो
अब भी।

©® करन जांगिड़
04.10.2018 .... 23:00PM

Sunday, 19 August 2018

A letter to swar by music 50

Dear swar, "किसी को पाने के लिए खुद का खो जाना, मानो न मानो मोहब्बत यहीं चीज है.........!!!! .. I respect you and your feelings. Actually the time was enable to blossoms the flowers of love between us. Perhaps we both were wrong............... First you got your way of life and now I am finding my own way without any destination............ So I think I should tell you something.... ........ काल के किसी खंड में (मैं समय और तारीख भी मालूम है पर लिखना ज़रूरी नहीं, तुम्हें खुद याद आ जानी है) तुमने सिर्फ अपनी इच्छाएं जाहिर की थी, वो इच्छाएं जो हर लड़की के ज़हन में अपनी जिंदगी को लेकर पनपती है, वे इच्छाएं जो हर समय कुछ ढूंढते रहने या कुछ पाने को मजबूर करती है..... मैं नादान था उस समय, समझ नहीं पाया था कि इशारे कभी सच जाहिर नहीं किया करते..... तुम्हें याद तो होगा तुम्हारे इरादों और प्रश्नों से बचने के लिए मैंने असफल सा प्रयास भी किया था..... मगर मैं भी इंसान हुं मेरी भी अपनी कमजोरियां होनी थी, कुछ सीमाएं होनी थी.......... बस वहीं से वक्त ने मेरी जिंदगी के पन्नों पर रंगीन स्याही दिखाकर काली सफेद रेखाएं खींचना शुरू कर दी और जैसा कि हर इंसान मन से कमजोर होता है, जो समझ नहीं पाता कि वास्तव में जो हो रहा है वो आगे क्या रंग दिखायेगा!! उधर वक्त अपनी ही रेखाएं बना रहा था और मैं इधर कल्पनाओं में जिंदगी को हसीन रंगों में सजाने की जुगत में था... कभी तुम्हारे चेहरे में चाँद ढूंढता तो कभी जंगल में खिलें किसी फूल का अहसास करता.... कभी चेहरा दूर क्षितिज सा लगता जिसका कोई अंत ही न हो..... तुम्हारी आँखें मुझे झील सी नजर आती कि हर वक्त इनमें डूबा ही रहुं..... कभी तुम्हारी आँखों में खुद को देखकर सँवरने की सोचता..... मेरे मन की इच्छाएं तुम्हारे काले घने बालों में बादल ढूंढ लेती थी, कभी चेहरे पर गिरी जुल्फों के पीछे छिपे चाँद का दीदार आँखें चाहती थी..... पर एक बात याद दिला दूं.... तुम्हें याद है न हम आज तक कभी अकेले में मिलें भी नहीं......(यहीं सच है जिसे कोई भी मित्र या पाठक स्वीकार नहीं करेगा)... हां... मैंने कई बार तुमसे जाहिर किया था कि तुम्हारे कान पकड़कर उमेठने का मन करता है...... तुम्हारे नाक संग चिकीविकी खेलने का मन करता है.... तुम्हारी जुल्फें खींचकर चिड़ाने का मन करता है......, पर कभी नहीं कर पाया... मतलब कि वक्त मौका ही नहीं दिया!! चलो छोड़ो...... ये वक्त की बातें हैं, दोष तुम्हारा या मेरा नहीं था! हां, तो मैं कहां था..... कल्पनायें... इन कल्पनाओं की अपनी वजह थी..... जब तुम्हें देखता आंगन में नृत्य करते हुए तो मन के कौनें में हिरणी बन फुदकती कुदती सी नजर आती थी... जब जब तुमने मेरे किसी गीत को गुनगुनाया मुझे यूं लगा कि , "जिंदगी-स्वर से बढ़कर कुछ भी नहीं है!".... तुम्हारी आवाज़ में खोया मैं फोन कट जाने पर भी फोन कानों से दूर हटाना भूल जाता था... मैं यकीन के साथ कह सकता हूं कि तुम आज भी उतना ही मधुर गाती हो जैसे पेड़ पर बैठी कोई कोयल राग सुना रही हो.... और तुम्हारी यह आवाज ऐसी ही बनी रहेगी... इन बातों से इतर....... तुमने और मैंने जिंदगी के सपने बुने थे, वे सपने जो हकीकत की जिंदगी से ताल्लुक रखते थे.... वे सपने मुझे तुम्हारा होने और तुम्हें मेरा होने पर गर्व का अहसास दिलाते थे..... हर सपने की नींव हम दोनों ने साथ रखी थी.... तुम्हारे हर सपने को मैंने अपना समझा था.... तुम्हारे सपनों की खातिर मैंने अपने सपनों को ही तोड़ा था..... मैंने वो सपना भी तोड़ दिया जिसके लिए तो मैं मरा जा रहा था... (DC).... बचपन में जब रेडियो पर RJ को सुनता या टीवी पर एंकर को देखता तो मन में ख्याल आया कि बनना तो कुछ ऐसा ही है.......... पर जब थोड़ा बड़ा हुआ और आगे पढ़ाई को जीवन से जोड़ कर देखा गया तो सबने यहीं सलाह दी थी कि Mass communication का कोर्स महंगा है और जॉब की सिक्योरिटी भी नहीं है... मैं भी अपनी पारिवारिक स्थिति से वाकिफ था.... पढ़ना मेरे बस में था, पर बाहर किसी शहर में रहकर खर्च वहन करना और परिवार को संकट में डालने की हिम्मत नहीं हुई थी..... फिर 2004 में जब कला वर्ग में पढ़ाई शुरू की तो सपना ही बदल गया.... पर दिमाग सपने कौनसे छोटे देखता है.... अब भी सपना तो बड़ा ही था... हां, अब यह था कि मेहनत खुद को करनी थी..... सपना था DC.. .. फिर वक्त ने मोड़ बदला.... सीनियर के बाद सबसे ज्यादा चाहने वालों ने भी जब BSTC की सलाह दी तो मुझे माननी पड़ी... मन में DC तो था ही........ BSTC की... 2012 में मास्टर जी बन गये.... नौकरी की खुशी में समय निकल पड़ा... पर सपना भूला नहीं था... तैयारी शुरू हो गई थी... इस बीच तुमसे मुलाकात...... तुम्हें भी सबसे ज्यादा इस DC पर बहुत आश्चर्य हुआ था न कि यह क्या है? जो केवल दो लोग जानते थे तुम्हें भी बताना ही पड़ा..... तुमने यह तक कहां था आपका सपना जरूर पूरा होगा............... और फिर तुम, मैं और सपना साथ...... पहली बार 2015 में पहली बार इसके लिए परीक्षा दी थी (केवल समझने के लिए की मुझे किस तरह तैयारी करनी पड़ेगी, मेहनत थी पर इतनी ज्यादा नहीं कि कोई उम्मीद इस परीक्षा से नहीं की थी, हां... पर परीक्षा देकर इतना तो समझ आ गया, यस!! आई केन डू इट)....... मैं लग गया था तैयारी में.... मगर वक्त शायद कुछ और चाहता था.... तुम्हें मजबूर किया वक्त ने और तुमने फिर.... वो शुरू किया जो मुझे एक शायर की तरह बनना पड़ा... उससे पहले मैंने कभी तुम्हारे लिए भी खुद ने नहीं लिखा था.... पर जब शुरू हुआ तो जैसा तुम जब बिहेव करती कलम वैसा ही पोजिटिव या निगेटिव.... कागज़ को रंग देती।। इससे पहले के 49 letters किसी न किसी घटना से जुड़े हैं जो तुमसे जुड़ी हो...... मैं बस सपने छोड़..... इधर खोया रहने लगा.... तुम नाराज़ तो मैं उदास, तुम खुश तो मैं खुश.... मगर कई दिनों पहले... वक्त ने एक झटके में तंद्रा तोड़ दी
ख्वाबों में खोया मैं हकीकत से रूबरू होकर काँप गया..... पीछे देखता हूं तो वो हसीन पल याद आते हैं और अब सब उजड़ा उजड़ा सा लगता है.... यहां से पांवों में अब और चलने की हिम्मत नहीं रहीं, ऐसा महसूस होता है जैसे जमीं ने मुझे रोक दिया है अपनी शक्ति से...……. आंखें आकाश को अब भी देखती है पर किसी उम्मीद में नहीं, बस शून्य में ताकती है कि इसमें ही कहीं समा जाऊं.............. पर इन सबसे इतर मेरे पास जीने की कुछ और वजह है, वो सबकुछ जिसने मुझे यहां तक पहूंचाया है, जो हर समय मेरे साथ रहें हैं....... मैं कैसे भी रहुं पर अब हारूंगा तो नहीं!! हां, अब से कोई मकसद नहीं, कोई सपना नहीं, सिर्फ रास्ता..... आखिर सांस तक चलने का इरादा है बस!!!
...................
जरा सी आहट हो तो
ज़िन्दगी कुछ ख्वाब बन लेती है,
पैरों में जहाँ रखने की
जहमत उठाया करते है सब,
ज़िन्दगी हर बार कोई
परिंदा बीमार रख लेती है.
समय कितना गहरा है,
आदमी का क्या है ,
रेत पर बने निशान भी 
आँखे संभाल लेती है.
अब तलक ढूंढ़ता रहा किनारे,
समंदर की लहरे अब 
मुझको संभाल लेती है.......
..... और अब मुख्य बात, तुम परेशान नहीं होना.... दोष तुम्हारा बिल्कुल नहीं है, हालांकि मेरे साथ बहुत गलत हुआ है इतना ज्यादा कि इस गलती को सुधारने के लिए अब वक्त नहीं है.... खैर रहने दो यह सब.... भगवान से दुआ करता हूं कि खुश रहो तुम और खुश रहने के लिए मुझसे दूर रहना जरूरी है इसलिए.... एक चेतावनी है दुनिया गोल है कभी न कभी आमना-सामना हो सकता है मगर मुझसे बोलने की हिम्मत भी मत करना अब वरना left hand सीधे तुम्हारे गाल पर पड़ेगा.... Good bye
Its only of mine Music ©® JANGIR KARAN DC 05_08_2018__08:00AM

Tuesday, 17 July 2018

Alone boy 27

अक्सर आंखें
ढूंढ ही लेती
उदास होने की वजह...
मौसम जरूर
Jangir Karan
बरसात का है,
खिलने का है, मिलने का है
मगर,
उस टूटे हुए पत्ते को पूछो,
क्या मौसम उसको भाता है,...
उसकी नियति सड़ना है,
गलना है, कटना है......
खिलना तो वो भूल गया,
सावन से वो रूठ गया।
मगर हर मौसम भी
उसको ऐसे ही चुभता है,
पानी से गलना,
सूरज से जलना,
हवा से भटकना..
कुछ और नहीं वो कर सकता है,
बस मन ही मन सिसकता है।
करुणाई तो देखी उसने,
हवा उसे सहलाती है,
मिट्टी प्यार जताती है,
नदी उसे झुलाती है।
मगर क्या यह करुणाई,
फिर उसे जोड़ पायेगी,
पीले पड़ते चेहरे पे,
रंग हरा ला पायेगी.......
खूब समझता पत्ता भी,
ढांढस का सब खेल यह,
अपने अश्रु छिपा रहा,
जग से हाथ मिला रहा.....
मुस्कुराते जब उसको देखा,
मेरा मन भी मुस्काया!!!
अक्सर आंखें कह देती है,
क्या तुमने खोया, क्या पाया!!!!!!
©® JANGIR KARAN
17_07_2018____10:00AM

Thursday, 10 May 2018

A letter to swar by music 49

Dear swar,
गणित तुम्हारी आदत है, मगर मुझे तो यूं लगता है कि तुम्हें गिनती भी नहीं आती होगी, हैरान होने की बात नहीं है!! तुम्हें कैलेंडर में तारीख देखना भी नहीं आता शायद?
पूरा एक साल निकल गया है, एक साल मतलब कि पुरे 365 दिन यानि कि 5,25,600 मिनिट्स... नहीं है है ना याद?
हां,
तुम गणित को सिर्फ आंकड़ों का खेल मानती हो, मगर मैं तुम्हारी इस गणित को जिंदगी से जोड़कर देखता हूं! उस वक्त से जब तुमने पहली बार आवाज दी थी, हां वो पल, दिन, वार, समय... उस पल की हर एक बात, कितने अक्षर थे वो भी याद है!
लेकिन तुम्हें तो इतना भी याद नहीं कि एक साल में तुमने मेरी किसी बात का जवाब नहीं दिया....
अब तुम्ही बताओ गणित कैसा है तुम्हारा?
.......
और इधर आजकल...
......
हर तरफ से वक्त ने छीना है सुकून जिंदगी का,
मैं वक्त तुम्हें ढूंढ चैन पाने निकला हूं।
....
आवाज़ नहीं दी होगी तुमने,
शायद मेरा सुनना भी वहम था।
.....
कल फिर तुम्हें सोचना है,
कल फिर तुम्हें चाहना है।
आज की खातिर भला
क्यों तुम्हें भुलाने की कोशिश करूं?
……….....................................
अब सुनो प्रिये,
यह जिंदगी मेरी रेल की पटरी सी हो चली है! हां, तुमने गणित में देखे है रेल और पटरी के सवाल...
रेलगाड़ी की लंबाई, पटरी की लंबाई, चाल, समय, सापेक्ष चाल आदि आदि!! हां मेरी जिंदगी के गणित में भी रेल की पटरी से सवाल उलझे हैं.... पटरी से कितनी रेलगाड़ियां गुजरती है, कौनसी कितनी लंबी थी, क्या गति थी, आमने-सामने से कब कौनसी रेल गुजरी? जिंदगी की पटरी इन सवालों से ज्यादा अलग तरह के अहसासों के उलझन में है!
हां....
हर गुजरती रेलगाड़ी के निकल जानें की दुआ करती है वो, क्योंकि रेलगाड़ी की गड़गड़ाहट भी उसे तन्हा सफर देती है जिसमें उसे कुछ और नहीं सुनाई देता...
क्योंकि पटरी को एक बात तो पता है रेलगाड़ी का तो गुजरना तय है वहां हमेशा के लिए रुकने से तो रही....
और पटरी को अपनी नियति भी पता है, मगर वो समझती कहां?
हर गुजरती रेलगाड़ी के साथ एक और ख्याल आता होगा पटरी के मन में कोई रेलगाड़ी ऐसी भी हो जो हर क्षण के लिए यहीं रुक जाये...
हां, वो रेलगाड़ी आती जरूर है मगर रुकती कहां!
पल भर में फिर रवाना हो जाती है, जब उसमें जान है चलना है..... जिस दिन थक जायेगी तब जाके कहीं रुकेगी, जब उसको जंग लग जायेगी तब वो रुकेगी शायद...
पर अब उसमें भी एक डर है, तब तक वो पटरी खुद पुरानी और कबाड़ न हो जाये कि निकालकर कबाड़ख़ाने में डाल दी जाये कहीं.... और बस फिर तो!!!
रेलगाड़ी से मिलन का ख्वाब भी ख्वाब नहीं, एक बीता हुआ कल रह जायेगा...
यहीं जिंदगी है..
जिसके सवाल ऐसे हैं जिनके जवाब तुम्हारी गणित के पास नहीं है, जवाब तुम्हारे ज़हन में है...
पर तुम अपने ज़हन की सुनती कहां हो,
तुम्हें तो गणित के सुत्रों पर चलना है ना!!!

..........
खैर इस एक साल में दो बातें तो महसूस करी है....
पहली, बदलना बहुत आसान है मगर, बदलने वालों को बदलना मुश्किल है जरा।
दुसरी, प्रेम इंसान को जीने के अलग अलग तरीके सीखा देता है।
!!!!!!
और हां,
एक खुशखबरी सुनाये!!!
हम जिंदा है
शरीर से नहीं मन से भी!
कभी कागज पर
कभी दिलों में
हां,
जिंदा है हम
पंछियों की उड़ान में
स्कूल जाते बच्चों की मुस्कान में
जिंदा है हम....
!!!!!!!
With love
Always yours
Music
©® Karan KK
10_05_2018___15:00PM
  • Photo from Google with due thanks

A letter to swar by music 53

डियर स्वर, दिन ढल चुका है। शहर की शोरगुल भरी सड़कें अब धीरे-धीरे शांत होने लगी हैं। दिनभर लोगों की आवाजाही, गाड़ियों के हॉर्न और भागती-दौड़त...