Thursday, 8 October 2015

खत का पुर्जा

ये झील का पानी भी
उदास है,तुम बिन
कौन अठखेलियाँ करें अब

ये खेत की मेड़ पर
घास भी उदास है, तुम बिन
किसकी पदचाप से झंकृत हो|

ये पंछी भी पेड़ पर
दुबक कर बैठे है, भोर में
किसका चेहरा देख कर चहकें|

वो हिरण भी आजकल
छलांगें नहीं भरता, तुम बिन
कौन उसे प्यार से खिलायें|

ये दीवारें हमारे घर की भी
कहाँ मुस्कुराती है, तुम बिन
खिलखिलाता भी तो कोई नहीं|

और मैं, मैं तो हैरान हुँ
आखिर तु इतनी
लापरवाह कैसे हो गई?

देख, अब बस भी कर
उदास हुँ मैं,
लिहाजा,
लौट के आजा|

©® करन kk

No comments:

Post a Comment

A letter to swar by music 53

डियर स्वर, दिन ढल चुका है। शहर की शोरगुल भरी सड़कें अब धीरे-धीरे शांत होने लगी हैं। दिनभर लोगों की आवाजाही, गाड़ियों के हॉर्न और भागती-दौड़त...