Thursday, 10 May 2018

A letter to swar by music 49

Dear swar,
गणित तुम्हारी आदत है, मगर मुझे तो यूं लगता है कि तुम्हें गिनती भी नहीं आती होगी, हैरान होने की बात नहीं है!! तुम्हें कैलेंडर में तारीख देखना भी नहीं आता शायद?
पूरा एक साल निकल गया है, एक साल मतलब कि पुरे 365 दिन यानि कि 5,25,600 मिनिट्स... नहीं है है ना याद?
हां,
तुम गणित को सिर्फ आंकड़ों का खेल मानती हो, मगर मैं तुम्हारी इस गणित को जिंदगी से जोड़कर देखता हूं! उस वक्त से जब तुमने पहली बार आवाज दी थी, हां वो पल, दिन, वार, समय... उस पल की हर एक बात, कितने अक्षर थे वो भी याद है!
लेकिन तुम्हें तो इतना भी याद नहीं कि एक साल में तुमने मेरी किसी बात का जवाब नहीं दिया....
अब तुम्ही बताओ गणित कैसा है तुम्हारा?
.......
और इधर आजकल...
......
हर तरफ से वक्त ने छीना है सुकून जिंदगी का,
मैं वक्त तुम्हें ढूंढ चैन पाने निकला हूं।
....
आवाज़ नहीं दी होगी तुमने,
शायद मेरा सुनना भी वहम था।
.....
कल फिर तुम्हें सोचना है,
कल फिर तुम्हें चाहना है।
आज की खातिर भला
क्यों तुम्हें भुलाने की कोशिश करूं?
……….....................................
अब सुनो प्रिये,
यह जिंदगी मेरी रेल की पटरी सी हो चली है! हां, तुमने गणित में देखे है रेल और पटरी के सवाल...
रेलगाड़ी की लंबाई, पटरी की लंबाई, चाल, समय, सापेक्ष चाल आदि आदि!! हां मेरी जिंदगी के गणित में भी रेल की पटरी से सवाल उलझे हैं.... पटरी से कितनी रेलगाड़ियां गुजरती है, कौनसी कितनी लंबी थी, क्या गति थी, आमने-सामने से कब कौनसी रेल गुजरी? जिंदगी की पटरी इन सवालों से ज्यादा अलग तरह के अहसासों के उलझन में है!
हां....
हर गुजरती रेलगाड़ी के निकल जानें की दुआ करती है वो, क्योंकि रेलगाड़ी की गड़गड़ाहट भी उसे तन्हा सफर देती है जिसमें उसे कुछ और नहीं सुनाई देता...
क्योंकि पटरी को एक बात तो पता है रेलगाड़ी का तो गुजरना तय है वहां हमेशा के लिए रुकने से तो रही....
और पटरी को अपनी नियति भी पता है, मगर वो समझती कहां?
हर गुजरती रेलगाड़ी के साथ एक और ख्याल आता होगा पटरी के मन में कोई रेलगाड़ी ऐसी भी हो जो हर क्षण के लिए यहीं रुक जाये...
हां, वो रेलगाड़ी आती जरूर है मगर रुकती कहां!
पल भर में फिर रवाना हो जाती है, जब उसमें जान है चलना है..... जिस दिन थक जायेगी तब जाके कहीं रुकेगी, जब उसको जंग लग जायेगी तब वो रुकेगी शायद...
पर अब उसमें भी एक डर है, तब तक वो पटरी खुद पुरानी और कबाड़ न हो जाये कि निकालकर कबाड़ख़ाने में डाल दी जाये कहीं.... और बस फिर तो!!!
रेलगाड़ी से मिलन का ख्वाब भी ख्वाब नहीं, एक बीता हुआ कल रह जायेगा...
यहीं जिंदगी है..
जिसके सवाल ऐसे हैं जिनके जवाब तुम्हारी गणित के पास नहीं है, जवाब तुम्हारे ज़हन में है...
पर तुम अपने ज़हन की सुनती कहां हो,
तुम्हें तो गणित के सुत्रों पर चलना है ना!!!

..........
खैर इस एक साल में दो बातें तो महसूस करी है....
पहली, बदलना बहुत आसान है मगर, बदलने वालों को बदलना मुश्किल है जरा।
दुसरी, प्रेम इंसान को जीने के अलग अलग तरीके सीखा देता है।
!!!!!!
और हां,
एक खुशखबरी सुनाये!!!
हम जिंदा है
शरीर से नहीं मन से भी!
कभी कागज पर
कभी दिलों में
हां,
जिंदा है हम
पंछियों की उड़ान में
स्कूल जाते बच्चों की मुस्कान में
जिंदा है हम....
!!!!!!!
With love
Always yours
Music
©® Karan KK
10_05_2018___15:00PM
  • Photo from Google with due thanks

घरौंदा

मन के बनायें घरौंदे,
न तेरे प्रेम की मिट्टी चाहिए,
ना ही तेरी रहमतों का पानी.....
कोई फर्क नहीं पड़ता
इसपर
तेरी नफ़रत की आंधियां का भी.....
मैं खुद ही
दीवार बना और
बिगाड़ लेता हूं,
कहां क्या रखना है सब
तुम्हारी इच्छा पर
बनाता हूं........
और जब तेरी याद
याद आती है,
कल्पनाओं का
झरोखा खोल
किचन में देख लेता हूं तुमको,
एक बारगी पुकार लूं तुम्हें
एक कप चाय,
पर नहीं,
मैं तो बस तुम्हें
बिन बताए तुम्हें देखना चाहता हूं.....
अक्सर तेरी याद में
खोया
किवाड़ की सिटकनी भूल जाता हूं मैं...
पर यह अच्छा है,
तुम्हें आने में कोई तकलीफ़ न होगी...
मन के घरौंदे है
और भागदौड़ जिंदगी की
हकीकत है,
अचानक तंद्रा टूटती है,
साथ ही टूट जाता है घरौंदा
और एक कमरे की चार दीवारों में कैद
मैं
फिर एक घरौंदा बनाता हूं!

©® KARAN KK

10_05_2018___5:20AM

Sunday, 6 May 2018

A letter to swar by music 48

Dear swar,
.............
मुकम्मल जिंदगी मुकम्मल ख्वाब ये तो हुई लोगों की बात...
उखड़ा हुआ चाँद और एक आवारा करन...
यह हूं मैं
....
महकना है दिन को मेरे आजकल,
अरसे बाद चाँद को देखा है मैंने।।
😘😘
......
आंखों से कोई नूर बरसता है,
चाँद ने पूनम की रात दिखाई है...
😘😍😘😍😘
.......
बहका था मैं आज कुछ पल को,
जमाने की मगर बंदिश थी यारा।
😘😍😘
........
यह वो सबकुछ है जो पलभर की मुलाकात के बाद दिलो-दिमाग में आया था...
!!!!!!!!
बाकी......
गुस्सा लाजवाब था...... गुस्से में भी तुम इतनी खूबसूरत लगती हो कि पूछो ही मत.. मेरी!! मेरी तो भी वहीं हालत है तुम हो जो सामने तो दिल दिमाग शरीर सबकुछ हेंग हेंग सा हो जाता है.... तुमसे मिलने से पहले बहुत सोचा कि यह कहूंगा वो कहूंगा पर मिलने पर कुछ भी न कह सका, बस देखता ही रहा!!
क्या देखता हूं मैं....
और ख्याल आयें भी तो...
तुम्हारी गणित के, जैसे तुमने जोड़ लिया है खुद में एक खूबसूरत चाँद खुद में, घटा दिया है पहले जैसा मुस्कुराना, गुणा किया है अपनी गंभीरता को, भाग दे दिया है जिंदगी में जानें किसका.........
मैं सिर्फ सोचता रहा कि किस बिंदु पर खड़ी हो तुम, आसपास कितने बिंदु और थे जिनकी तरफ किरण बनकर या रेखा बनकर तुम बढ़ सकती हो.....
उन दुसरे बिंदुओं में तुम्हारे लिए मैं शायद नहीं हुं और मानकि हुं भी दूर अनंत में कुछ धूंधला सा....
तुम्हारा रेखाखंड हो जाना तो निश्चित है अब किस बिंदु तक पहुंच के रुक जाना है यह सिर्फ वक्त जानता है पर जानती हो रेखाखंड हो जाना इतना आसान नहीं है, और तुम्हारे लिए तो शायद बहुत मुश्किल है क्योंकि तुम्हें शुरू से किरण हो जानें का शौक रहा है कोई और समझें न समझें मैं समझता हूं और जिस दिन ये पंक्तियां तुम पढ़ोगी मेरा दावा है समझ गई तो रोओगी भी और तुम्हें इस बात का गर्व होगा कि तुम ऐसे इंसान के करीब भी रही थी जो तुम्हारे मन की बात को चंद गणित में कह सका और वो भी सटीक सटीक.... पर तुम्हारा रोना, बहुत देर हो चुकी होगी शायद, तब न तुम कोई बिंदु बदल पाओगी और मानाकि बदलना चाहोगी तो भी मैं तब धूंधला बिंदु इतना धूंधला हो जाऊंगा कि नजर भी आऊं या नहीं भी...
अभी तो तुम समझकर नासमझ ही बनोगी क्योंकि तुम्हारे आसपास कई बिंदुओं का संगम है.....
किरण हो जाने का वक्त नहीं है अब और रेखाखंड होकर रुक जाना है,
दुआ है खुश रहो.....
!!!!!!
जब तुमको देखा था ना पूरे 5 महीने बाद तो दिल दिमाग कुछ कहने पर मजबूर हो गया, बाकी मैं तो अब तक भी तुम्हारे ख्याल मात्र से खुश रह लेता हूं और आगे भी रहूंगा!!
!!!!!!
आगे से कोशिश करूंगा कि कोई और मुलाकात न हो, क्योंकि अब यह बहुत परेशानियां पैदा करती है दिल में,
मैं बस युहीं खुश रहना चाहता हूं....
तुम्हें सोचकर,
गणित के किसी प्रमेय की तरह सिद्ध कर लेता हूं कि तुम यहीं कहीं हो...
!!!
बातें बहुत है!
बस तुम सुन सुन कर परेशान हो जाओगी?
।।।
इसलिए इतना ही!!!
बाय।

With love
Yours
Music

Written by KARAN KK
05__05_2018___23:00PM

फोटो- अंधेरे में चाँद

Alone boy 31

मैं अंधेरे की नियति मुझे चांद से नफरत है...... मैं आसमां नहीं देखता अब रोज रोज, यहां तक कि मैं तो चांदनी रात देख बंद कमरे में दुबक जाता हूं,...