Thursday, 8 September 2016

ये रही जिंदगी

केश की लटों में,
कानों की बालियों में,
रही ऊलझती जिंदगी।

सुर्ख लाल होठों पर,
तीखे नैन से,
रही फिसलती जिंदगी।

चूनर के पल्लु सी,
कमर के चहुँ ओर,
रही लिपटती जिंदगी।

चुड़ियों से सजी,
कोमल सी हथेली,
रही चूमती जिंदगी।

ख्वाब में जो सुना,
स्वर उस पेंजन का,
रही खनकती जिदगी।
©® Karan dc
08/09/2016_10:00AM

No comments:

Post a Comment

A letter to swar by music 54

  Dear swar, मुझे अब भी खटकता है, तेरा नदी के उस पार होना। सांसें बेशक हैं मगर, जिंदगी का यह कैसा अफसाना।। पता नहीं क्यों, लेकिन इन दिनों...