Tuesday, 17 January 2017

दस्तक

कल रात
दरवाजे पर
एक दस्तक हुई,
गहरी नींद में
सोया था मैं
मगर आँख खुल गई.........
।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।
दरवाजे को
खोला मैंने मगर
कोई चीज नजर नहीं आई,
मैंने सोचा शायद
नींद में युहीं
यह आवाज है आई.......
।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।
मगर जैसे ही
मैंने
दरवाजे की कुंडी लगाई,
हवा के इक
झौंके सी कोई
कान में फुसफुसाई..........
।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।
मैं तुम्हारी
हार हुँ
लो मैं आ गई,
मेरी हालत क्या बताऊं
आँखों में
काली छाया छा गई............
।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।
नींद न जानें कहां गायब
बस चिंता की
लकीरें छाई,
किस गलती की
सजा आज
मैंने यह पाई..................
।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।
हड़बड़ी में
इतना ही पूछा मैंने
बुलाया नहीं तो क्यों आईं,
बोली वो तमतमाकर
जीत ने
तुम्हें कितनी आवाज लगाई..............
।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।
लेकिन तुम ठहरे हठी
तुमने उसकी
हर दस्तक ठुकराई,
अब बारी मेरी है
मैं बिन पूछे
इसलिए ही चली आई...............
।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।
मैं आज से रहुंगी
तुम्हारे मन में
बनके परछाई,
सोच लो बची जिंदगी में
मेरी गुलामी
रास आई.............................
।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।
आँख से इक बूंद गिरी
उठकर मैंने
हार गले लगाई,
किस्मत का क्या पता
मगर
जीत से ज्यादा हार रास आई.............
।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।
©® जाँगीड़ करन kk
17/01/2017__8:00 AM

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