Saturday, 16 July 2016

मेरी नींव

#यादें
#नींव_का_का_पत्थर
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जी हाँ!!! सिंपल सी बड़ी बात, सिंपल तरीके से, 1995 से 1998 तक की प्राइमरी कक्षायें(1 से 4 तक) मैनें #राप्रावि__पिथलपुरा पढ़ी थी, वहीं से सीखा था क से कबूतर, ख से खरगोश आदि!! वहीं से सीखा जोड़, बाकी आदि, हाँ वहीं से सीखा कि ग्रुप क्या होता है, दोस्त क्या होते है? मस्ती कैसे करनी है, कब करनी है? हाँ सबकी नींव वहीं है, जो कुछ आज बन पाया हुँ या निकट भविष्य में बनुँगा वो सब इस स्कूल की मेहरबानी से ही हुआ या होगा। मैं अपने उन गुरूजी को प्रणाम करता हुँ।
हाँ तो..... आज काफी समय बाद मुझे वहाँ जाने का मौका मिला.... हुआ युँ कि मैं अभी नोडल स्कूल में पोस्टेड हुँ और #राप्रावि___पिथलपुरा सिंगल टीचर स्कूल है(और टीचर कौन, वहीं मेरे गुरूजी जिन्होनें मुझे यहाँ 1998 तक पढ़ाया था, #सुखसागर_जी), आज उन्हें आवश्यक कार्य होने से छुट्टी पर रहना था, तो नॉडल स्कूल की जिम्मेदारी होती है कि उस स्कूल संचालन की व्यवस्था करें, सो आज मुझे भेजा गया।
हाँ.........
तो अब शुरू करते है बात.........
जैसे ही स्कूल के गेट के भीतर घुसा तो वो बचपन की यादें आ खड़ी हुई, स्कूल की दीवारें कुछ बयाँ करने को दौड़ पड़ी हो जैसे। और याद आने लगा वो बचपन, दोस्तों के साथ की गई वो मस्ती, स्कूल का रंगरूप, सब कुछ आँखों के सामने एक फिल्म की तरह चलने लगा।।।
यहाँ पर स्कूल का अहाता अब बिल्कुल खाली है केवल घासफूस है, मगर मुझे अच्छी तरह याद है, यहाँ पर सामने हजारी फूल की क्यारियाँ थी, मैन गेट के दोनों तरफ कंडेर के छोटे छोटे पेड़ थे। चूने से बनी स्कूल की चारदीवारी आज भी वहीं है, हाँ कुछ जगह से टूट फूट गई है, स्कूल के पीछे ही प्लेग्राउंड जहाँ हम खो खो खेलते थे, खेलना भी क्या था बस एक मजा था गिरना और वापस ऊठकर दौड़ लगाना, शायद बचपन से जिंदगी जीने का हुनर सीख रहे थे।
स्कूल गाँव से कोई 200 मीटर ही दूर है, मगर इस दुरी में ही एक नाला है, बरसात के दिनों में यह नाला तेज बहाव पर होता है, उस समय इस पर पुलिया नहीं था, स्कूल जानें के लिये हम आठ-दस दोस्त एक दुसरे का हाथ पकड़ कर इस नालें को पार करते थे, कभी से शायद दोस्ती का मतलब समझने लग गया था, वो प्यारा सा साथ बहुत अच्छा था,सब अच्छी तरह याद है, मगर वो आगे ज्यादा नहीं पढ़ें और आज सभी अलग अलग जगहों पर अपने कामधंधे में व्यस्त है, जब भी मिलते है, बहुत बातें करते है, बहुत मजा आता है और आँखें भर भी आती है। कहाँ तो वो मौज मस्ती और कहाँ ये भागदौड़ भरी जिंदगी.....
खैर मैं अपने इस स्कूल और गरूजी को साथ ही साथियों को कभी भूल न पाऊँगा.....
#मेरी डायरी 16/07/2016.... 15:00 pm

Friday, 15 July 2016

अँधेरे का तलबगार

जानबुझकर गुनाह किया नहीं पर गुनहगार तो हुँ,
स्वर बिखर गये मेरे मगर उदासी  की झंकार तो हुँ।

तुम्हारी  जिंदगी में नहीं कोई अहमियत अब मेरी,
मगर याद है मुझे मैं ही तुम्हारा पहला प्यार तो हुँ।

बस्ती मैं  तेरी मुझे  भला पहचानेगा  कोई कैसे,
तेरी  जिंदगी  से  भी मैं गुमनाम  चेहरा  तो  हुँ।

ना चिराग ना ही किसी जुगनु की जरूरत है मुझे,
बिन चाँद तन्हा जीने को अँधेरे का तलबगार तो हुँ।

युँ अफवाह  तो  न उड़ाओ  कि  हार गया है 'करन',
मंजिल न मिली न सही मोहब्बत की राह पर तो हुँ।
©®जाँगीड़ करन kk
15-07-2016__18:40pm

Friday, 8 July 2016

A letter to swar by music 7

हैलो स्वर.....
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तुम पढ़ो न पढ़ो पर मैं तुम्हें युहीं खत लिखता रहुँगा, क्योंकि तुमने किसी खत का जवाब पढ़कर तो नहीं दिया शायद या फिर पढ़कर अनदेखा कर दिया है,
खैर कोई बात नहीं।।
हाँ, तो सुनो..........
जिंदगी बस युहीं मुस्कुराने का नाम है, हाँ वक्त की कुछ साजिशें कभी कभी आँखें नम कर देती हैं, हाँ मगर यह साजिशें तो होगी ही, पर जानती हो मैं फिर भी तुम्हें याद करके मुस्कुरा लेता हुँ, नम आँखों से भी, तो कभी कुछ पल तो याद करके खिलखिला पड़ता हुँ, बस कुछ युहीं वक्त गुजार लेता हुँ, इसी की साजिशों को धत्ता बताते हुए।
और हाँ.... अभी सावन आया है.... हर तरफ मौसम की खुमारी, कहीं पर मोर नाचते हुए दिखते है, तो तो, तुम जानती हो तुम्हारा डांस याद आता है मुझे, जैसे वो मोर नहीं तुम मात रही हो, बादलों को तुम बुला रही हो जैसे, और मैं उस डांस मैं खो जाता हुँ युहीं अक्सर......
अब आसपास हरियाली फैल गई है, सबकुछ हरा भरा है, हर तरफ खुशहाली है, मगर मेरा मन आज भी तन्हा है, रूखा सूखा है, जैसे की बरसों से कोई बंजर धरती हो, कोई फूल क्यों खिलता नहीं यहाँ, जानती हो ना तुमने प्यार की बारिश जो नहीं की, तुम्हारे साथ का इसे खाद न मिला.... अब तो लगता है कि कभी यहाँ कोई फसल न होगी, कोई पौधा न ऊग पायेगा, मेरे दिल की यह मिट्टी भी अब ऊसर हो चुकी है,
बस यहाँ तेरी नफरत की आँधियाँ चलती है, जानती हो ना, इस आँधी से यह ऊसर धूल आँखों में पड़ती है, और मैं इस वीरानें में कुछ भी देख नहीं पाता हुँ....
खैर छोड़ो ये बातें.........
बहुत सी बातें है बताने को तो मगर..........
अरे हाँ...... तुम सुनाओ!!! कैसी हो?
तुमसे कुछ और भी पूछना है.....
क्या तुम अब भी युहीं अपनी साड़ी के पल्लु को अँगुली में रख कर दाँतों से काटती हो?
ह ह ह ह ह.....
अरे.....
मैं भी ना!!! कितना पागल हुँ.....
अच्छा अपना ख्याल रखना और हाँ खत का जवाब जरूर देना......
तुम्हारे इंतजार में कुछ पंक्तियाँ लिखी है, देखो कैसी बनी है............
जिंदगी की जगह में,
तुम मिली इक बंजारन
कितने मील चलोगे राही,
संग तुम्हारे चलुँ मैं हरदम।।
प्रीत की राहें पकड़ी हमने,
कभी न सोचा क्या होगा?
तुमने हाथ छुड़ाया अपना,
मुश्किल अब चलना होगा!!
मजबुरी में गिरकर तुमने,
किया था ना मुझसे किनारा।
इक आस लिये तुम्हें पुकारे,
वीरान राहों पर बंजारा।।
.....
तुम्हारा
संगीत
©® जाँगीड़ KK™
08/07/2016... 12:40pm

Friday, 1 July 2016

दिल के अरमान

नफरत के खिलाफ लिये मोहब्बत की कमान बैठा हुँ,
टूट  चुके जो  कब के  लिये वो सारे अरमान बैठा हुँ।

जीत को बनाया है तुमने तो हमसफर जिंदगी का,
हार को गले लगाने का लिये  मैं  फरमान बैठा हुँ।।

चाँद की यह रोशनी रहने दो जमाने भर के हिस्से,
अमावस का लिये मैं सुना सुना बियावान बैठा हुँ।

हर एक को लड़ते देखा है सुधारस की खातिर यहाँ,
मगर हलक में उतार के जहर का इक जाम बैठा हुँ।

चालें  यहाँ हर  वक्त चली  जाती है मुझे गिराने की,
पर मैं ठहरा राही मस्ती का बनके अनजान बैठा हुँ।

कभी  जी भर  के भी  नहीं  देखा है  स्वर  तुमको,
करके  युहीं  मोहब्बत में  खुद को बदनाम बैठा हुँ।

©® जाँगीड़ करन kk™

Thursday, 30 June 2016

पत्थर

पत्थर  का  शहर  है,
है  पत्थर  दिल  लोग।
बन  जा तु  भी पत्थर,
वरना न जीने देंगे लोग।।

पत्थरों  की तो तासीर है,
पत्थर  से  ही  टकराना।
मगर  वो  पागल  है जो,
पत्थर से टकराते है लोग।।

पत्थर  से  बनी  मुर्ति को,
पूजता  है हर  कोई यहाँ,
मगर राह पड़े पत्थर को,
मारते है ठोकर सब लोग।।
©® जाँगीड़ करन KK™

Saturday, 18 June 2016

रेत से ख्वाब

मैं अक्सर
भर लेता हुँ
अपनी मुट्ठी रेत से
हाँ ख्वाबों की रेत....
जानते हुए कि
मुट्ठी में रेत
रूकनी तो नहीं,
कण कण ही सही
फिसल जाना है इसे.....
और मैं
मुट्ठी को मजबूत
भी नहीं कर सकता
कहीं रेत का
दम न घुट जायें....
बस हर बार
फिर से भर लेता हुँ मुट्ठी
उसी रेत से
जानते हुए कि
फिर से फिसल जानी है...
मगर एक......
मगर एक आशा है कि
कभी तो प्रेम की
बारिश होगी
रेत पर
जब वो भीग जायेगी
तब शायद
मेरी मुट्ठी में
रूक जायेगी
और मैं बनाऊँगा
एक सपनों का महल उससे
वो रहेंगे फिर हम साथ साथ
सदा के लिये......
©®करन जाँगीड़ kk
10/06/2015_ 7:00 AM

Tuesday, 31 May 2016

बेटी तो बेटी होती है

बचपन  से ही  तो  वो  सयानी  होती है,
अरमानों  की  उसके  कुरबानी  होती है।

कभी  माँ की ममता सी बन जाती है वो,
बहिन मेरी कुछ ऐसी होती  सयानी है।

बन के जब वो दुल्हन पिया के घर जायें,
माँ भवानी की जैसे कोई कहानी होती है।

कभी बनी वो कल्पना तो कभी बनी सुनिता,
देश के लिये कुरबान इनकी जवानी होती है।

कौन  कहता है  कमजोर  होती है बेटियाँ,
पिता की अर्थी ऊठाकर वो मर्दानी होती है।

नमन करूँ मैं बेटियों को बारंबार ही 'करन',
एक जिंदगी में छिपी कई जिंदगानी होती है।
©® जाँगीड़ करन kk
31/05/2016_01:00 pm

A letter to swar by music 54

  Dear swar, मुझे अब भी खटकता है, तेरा नदी के उस पार होना। सांसें बेशक हैं मगर, जिंदगी का यह कैसा अफसाना।। पता नहीं क्यों, लेकिन इन दिनों...