हर रोज सुबह
जब होता है हाथ में
कप चाय का,
आ जाता है
संदेश तुम्हारा
निमंत्रण होता है उसमें
चाय का,
जानती हो उस वक्त
खो जाता हुँ कहीं
तेरी यादों में
जैसे पी रहे हो चाय
हम दोनों एक साथ
एक ही कप से
बैठकर किसी एकांत में.
फिर अचानक
आ जाता हुँ वापस
वर्तमान में,
अरे चाय तो ठंडी हो गई है,
पर जब भरता हुँ
घूँट एक
अहसास होता है,
तेरी उपस्थिति का,
चाय लगती है
पहले से ज्यादा मीठी
कहीं तुम्हारें होठों ने
छुआ तो नहीं चाय को.
© ® karan dc
और मैं, मेरी चिंता न कर मैं तो कर्ण हुँ हारकर भी अमर होना जानता हुँ
Wednesday, 2 September 2015
आह चाय
Subscribe to:
Post Comments (Atom)
प्रकृति और ईश्वर
प्रकृति की गोद में ईश्वर कहें या ईश्वर की गोद में प्रकृति ...... जी हां, आज मैं आपको एक ऐसे प्राकृतिक स्थल के बारे में बताऊंगा जहां जाकर आ...
-
मुझे युँ आजमाने की कोशिश न कर। अंधेरा बताने की कोशिश न कर।। झर्रे झर्रे से दर्द ही रिसता है यहाँ, मेरे दिल को छलने की कोशिश न क...
-
हर दोपहर जिंदगी जाने कितने ख्वाब बदलती है। ज्यूं सुबह से घटती है परछाई, ख्वाबों की भी किस्मत घटती सी लगती है, दिल में कुछ बैचे...
-
यादों के उस समंदर से भरके नाव लाया हुँ, जवानी के शहर में बचपन का गाँव लाया हुँ। झाड़ियों में छिपे खरगोश की आहट, कच्चे आमों की वो खट्टी...
No comments:
Post a Comment