रेत पर अक्सर
लिख देती है वो
नाम मेरा
फिर कुछ बुदबुदाती है
न जाने क्या?
फिर अचानक
मिटा देती है
हथेली से नाम मेरा
फिर से लिख देती है
वही नाम
फिर बुदबुदाना
हाँ इस बार
मुसकुराहट है चेहरे पे उसके
न जाने क्यों?
मैं दूर से ही
देखता हुँ सबकुछ
और मुस्कुरा देता हुँ
मन ही मन में
न जाने क्यों?
©® karan DC
और मैं, मेरी चिंता न कर मैं तो कर्ण हुँ हारकर भी अमर होना जानता हुँ
Thursday, 13 August 2015
न जाने क्यों
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