Monday, 31 August 2015

हार-जीत

साथ मैनें दिया कभी...अधर्म का तो नहीं,
कोई दुर्योधन भी तो...मेरा मित्र नहीं|
ना मैनें किया है कभी..अपमान गुरू का,
कभी पांचाली को भी तो..किया लज्जित नहीं||

फिर भी छीनने को आतुर है..अस्त्र शस्त्र मेरे,
श्राप से अपने धँसाने को आतुर है कोई..पहिये रथ के मेरे|
किया गया हुँ बाहर प्रतियोगिता से..क्योंकि राजकुमार नहीं हुँ ना,
बार बार कहकर सूत पुत्र मुझे..घावों पर नमक छिड़का गया है मेरे||

हो परिस्थिति चाहे कुछ भी..मुझे तो करना कर्म है,
मैं निहत्था फिर भी...ना उनकी आँख में लाज शर्म है|
शायद विधाता को भी..उनकी जीत पे शर्म आयेगी नहीं,
हाँ मैं कर्ण तो नहीं पर करन तो हुँ...और हारना ही शायद अब मेरा धर्म है||
©® Karan Dc

1 comment:

A letter to swar by music 54

  Dear swar, मुझे अब भी खटकता है, तेरा नदी के उस पार होना। सांसें बेशक हैं मगर, जिंदगी का यह कैसा अफसाना।। पता नहीं क्यों, लेकिन इन दिनों...