Thursday, 10 November 2016

हे ईश

रूई की फोहों से चोटिल
सर को
इक पत्थर ने सहलाया तो.....

गुलाबी फूल से घायल
पैर को
काँटों ने सँभाला तो.......

मुस्काते चेहरे में पीड़ित
आँखों को
इक दर्द ने हँसाया तो.....

इक मौन से बैकल
मन को
इक गुँगे ने पुकारा तो.......

कैसे भूलुँ ईश तेरी
कृपा को
हार से तुमने जीताया तो.......
©® जाँगीड़ करन KK

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