वो
हर सवेरे
उस झील किनारे
बैठकर
सूरज को
निहारता है,
हाँ,
तन्हा
अकेले
और करता भी क्या?
निहारते निहारते
उसकी आँख से
एक बुँद
पलक पर
आ ठहरती है,
और सूरज की
किरणों से
वहां
इंद्रधनुष सा
दिखता है उसको.....
तब वो
अपनी
जिंदगी के
फीके पड़े
रंगों
को सोचकर
और भी उदास हो जाता है.....
और शायद
यह इंद्रधनुष
उसे अब
अच्छा लगने लगा है,
इसलिए
हर रोज
वो युहीं
झील किनारे........
हाँ...
आखिर तन्हाई में
कहीं तो
रंग
दिखते हैं उसको......
©® जाँगीड़ करन kk
25/02/2017__7:30AM
और मैं, मेरी चिंता न कर मैं तो कर्ण हुँ हारकर भी अमर होना जानता हुँ
Saturday, 25 February 2017
Alone boy 6
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A letter to swar by music 53
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