तु ही माँ वीणापाणी,
तु ही माँ शारदे।।
तेरी शरण में हूं मैया,
जीवन का मुझे सार दें।
तेरा वैभव गा सकुँ मैं,
कंठ में ऐसी झंकार दें।
सारे जग में नाम कमाऊं,
ऐसा मुझे आधार दें।
कोई दुखी रहे नहीं यहां,
खुशियों का संसार दें।
स्वर साधना लें निकला हुँ,
गीत का आकार दें।
#karan
01_02_2017____6:00AM
और मैं, मेरी चिंता न कर मैं तो कर्ण हुँ हारकर भी अमर होना जानता हुँ
Wednesday, 1 February 2017
सरस्वती वंदना
Subscribe to:
Post Comments (Atom)
A letter to swar by music 54
Dear swar, मुझे अब भी खटकता है, तेरा नदी के उस पार होना। सांसें बेशक हैं मगर, जिंदगी का यह कैसा अफसाना।। पता नहीं क्यों, लेकिन इन दिनों...
-
रोहित 35 वर्षीय प्रोढ़ घर में बिल्कुल अकेला रहता था। मुंबई मेट्रो सिटी में एक ऑफिस का वाईस मैनेजर था रोहित। काम का बोझ और ऊपर से अकेलापन वह ...
-
डियर स्वर, दिन ढल चुका है। शहर की शोरगुल भरी सड़कें अब धीरे-धीरे शांत होने लगी हैं। दिनभर लोगों की आवाजाही, गाड़ियों के हॉर्न और भागती-दौड़त...
-
हर दोपहर जिंदगी जाने कितने ख्वाब बदलती है। ज्यूं सुबह से घटती है परछाई, ख्वाबों की भी किस्मत घटती सी लगती है, दिल में कुछ बैचे...
No comments:
Post a Comment