Sunday, 20 September 2026

A letter to swar by music 54

 

Dear swar,

मुझे अब भी खटकता है, तेरा नदी के उस पार होना।
सांसें बेशक हैं मगर, जिंदगी का यह कैसा अफसाना।।

पता नहीं क्यों, लेकिन इन दिनों तुम्हारी बहुत याद आती है। ऐसी याद, जिसे किसी काम में उलझकर भी टाला नहीं जा सकता। दिन अपने हिसाब से गुजरता रहता है, लोग मिलते हैं, बातें होती हैं, हँसी-मजाक भी होता है… लेकिन दिन खत्म होने पर मन फिर वहीं आकर रुक जाता है—तुम्हारे पास।

शायद तुम्हें यह सब थोड़ा अजीब लगे, लेकिन सच कहूँ तो तुम्हारे दूर होने के बाद मुझे छोटी-छोटी चीज़ों में भी तुम्हारी कमी महसूस होने लगी है। कोई अच्छी बात होती है तो सबसे पहले तुम्हें बताने का मन करता है। कोई परेशानी होती है तो लगता है तुमसे बात कर लूँ, शायद मन थोड़ा हल्का हो जाए। और कई बार तो बिना किसी वजह के ही फोन उठाता हूँ, तुम्हारा नाम देखता हूँ और फिर रख देता हूँ।

हमारे बीच बस एक नदी है, लेकिन कभी-कभी लगता है जैसे उसके साथ-साथ बहुत कुछ बह गया है—वो बेफिक्र बातें, वो साथ बिताए पल, वो बिना किसी वजह के मुस्कुरा देना।

तुम उस पार हो और मैं इस पार।
दोनों की दुनिया शायद अपनी जगह चल रही है, लेकिन मेरा मन अभी भी तुम्हारे आसपास ही कहीं अटका हुआ है।


मैंने बहुत बार खुद से कहा है कि दूरी की आदत डाल लेनी चाहिए। आखिर हर चीज़ हमेशा हमारे मुताबिक तो नहीं होती। लेकिन दिल को समझाना इतना आसान कहाँ होता है? उसे तो बस तुम्हारी याद आती है और वह पुराने दिनों की तरफ लौट जाता है।

कभी तुम्हारी कोई बात याद आती है, कभी तुम्हारी हँसी। कभी तुम्हारा यूँ ही नाराज़ हो जाना और फिर थोड़ी देर बाद खुद ही सामान्य हो जाना। ये सब बातें शायद तुम्हारे लिए बहुत मामूली हों, लेकिन मेरे लिए नहीं हैं। मेरे पास अब इन्हीं छोटी-छोटी यादों का सहारा है।

तुमसे दूर रहकर एक बात समझ में आई है—किसी की मौजूदगी की असली कीमत तब पता चलती है, जब वह पास नहीं होता।

तुम्हारे साथ रहते हुए शायद मैंने कभी नहीं सोचा था कि तुम्हारी एक छोटी-सी बातचीत भी मेरे दिन को कितना बेहतर बना देती है। अब समझ आता है।

मैं यह पत्र तुम्हें किसी शिकायत के लिए नहीं लिख रहा। न ही तुम्हें किसी बात के लिए मजबूर करना चाहता हूँ। बस मन में जो था, उसे कह देना चाहता था। क्योंकि कुछ बातें जितनी देर दिल में रहती हैं, उतनी ही भारी होती जाती हैं।

कभी-कभी सोचता हूँ, काश यह नदी थोड़ी छोटी होती। काश तुम्हारे और मेरे बीच इतना फासला न होता। काश किसी शाम अचानक तुम इस किनारे आ जातीं और मैं बिना कुछ कहे बस तुम्हें देखता रहता।

शायद उस दिन मुझे किसी शिकायत की जरूरत नहीं पड़ेगी।

मैं तुमसे यह भी नहीं पूछूँगा कि तुम्हें मेरी याद आती है या नहीं। शायद कुछ सवालों के जवाब जान लेना जरूरी नहीं होता। कुछ रिश्ते जवाबों से नहीं, उस एहसास से चलते हैं कि कहीं न कहीं कोई हमें


याद करता है।

बस इतना जान लो कि इस किनारे पर एक इंसान आज भी तुम्हें याद करता है।

जिंदगी चल रही है, बिल्कुल पहले की तरह।
बस पहले जैसी लगती नहीं।

सांसें चल रही हैं, दिन गुजर रहे हैं, रातें भी कट जाती हैं… लेकिन तुम्हारे बिना इनमें एक खाली जगह है, जिसे मैं चाहकर भी भर नहीं पाता।

और शायद इसी वजह से तुम्हारा नदी के उस पार होना आज भी खटकता है।

कभी समय मिले तो इस पार जरूर आना।
शायद बहुत सारी बातें हैं, जो सामने बैठकर कहनी हैं।

तुम्हारा,
Music

Sunday, 9 August 2026

A letter to swar by music 53

डियर स्वर,

दिन ढल चुका है।
शहर की शोरगुल भरी सड़कें अब धीरे-धीरे शांत होने लगी हैं। दिनभर लोगों की आवाजाही, गाड़ियों के हॉर्न और भागती-दौड़ती ज़िंदगी के बीच जो शहर कभी थमता हुआ नहीं लगता, वही शाम के इस पहर में अचानक कितना ख़ामोश हो जाता है।

ऐसे ही किसी अकेले लम्हे में, जब मैं अपने हाथों में चाय का प्याला थामे खिड़की के पास बैठता हूँ, तो न जाने क्यों मेरा ध्यान अनायास ही तुम्हारी ओर चला जाता है।

चाय की भाप के साथ कुछ पुरानी यादें भी उठती हैं और कमरे की ख़ामोशी में धीरे-धीरे फैल जाती हैं। कभी तुम्हारी आवाज़ सुनाई देती है, कभी तुम्हारी हँसी, कभी तुम्हारी किसी छोटी-सी बात पर मेरा बेवजह मुस्कुरा देना... और कभी-कभी बस तुम्हारा चेहरा याद आता है।

अजीब बात है न?

इंसान बाहर से कितना भी आगे बढ़ने का नाटक कर ले, कितनी भी व्यस्त ज़िंदगी जी ले, कितने ही नए रास्तों पर चल पड़े... मगर उसके भीतर का एक हिस्सा हमेशा उसी पुराने मोड़ पर ठिठका रह जाता है, जहाँ किसी अपने ने हाथ छुड़ाकर कहा था—अलविदा।

और हाँ...

तुमने कितनी आसानी से कह दिया था—अलविदा।

शायद तुम्हारे लिए वह सिर्फ़ एक शब्द था।
एक बातचीत का आख़िरी वाक्य।
एक रिश्ते पर खींची गई आख़िरी लकीर।

मगर तुम्हें कहाँ ख़बर कि वह शब्द मेरे लिए आज भी ख़त्म नहीं हुआ।

आज भी कभी-कभी अचानक तुम्हारा वही "अलविदा" मेरे कानों में गूँजने लगता है। इतना साफ़, जैसे तुम अभी मेरे सामने बैठी हो और वही शब्द दोबारा कह रही हो।

कभी अकेले में खुद से बातें करता हूँ, तो हमारी उस आख़िरी बातचीत तक पहुँच जाता हूँ। फिर जाने कैसे, बातचीत के बीच से वही शब्द निकल आता है—अलविदा।

जैसे कोई अधूरी धुन हो...

जो हवा में तैरती तो है, मगर कभी पूरी नहीं होती।

तुमने तो शायद एक ही पल में सब कुछ समेट लिया था। हमारी बातें, हमारी मुलाकातें, हमारी छोटी-छोटी नोकझोंक, साथ बिताई हुई शामें... शायद सब कुछ एक तरफ़ रखकर आगे बढ़ गईं।

लेकिन मेरे लिए वह एक शब्द ठहर चुका ज़माना बन गया।

ऐसा ज़माना जिसे मैं आज भी रोज़ थोड़ा-थोड़ा जीता हूँ।

कभी याद बनकर,
कभी ख़ामोशी बनकर,
कभी मुस्कान बनकर
और कभी आँखों में उतर आई उस नमी की तरह, जिसका किसी को पता भी नहीं चलता।

लेकिन इस उदासी के बीच भी तुम्हारी यादें कमाल करती हैं।

वे मुझे उदास होकर भी मुस्कुराने की कोई न कोई वजह ढूँढ ही लेती हैं।

और मज़े की बात सुनो...

तुम कुछ शब्दों को कभी-कभी ग़लत बोलती थीं ना?

याद है?

"फायदा" को "फायता" कह देती थीं।

उस समय मैं तुम्हें कितना चिढ़ाया करता था। तुम पहले तो अपनी गलती मानने से इनकार करतीं, फिर खुद ही हँसने लगतीं और कहतीं—"अच्छा बाबा, जो बोलना है बोलो!"

तुम्हारी वही छोटी-सी बात अब भी मेरे साथ है।

कल शाम की ही बात है।

दफ़्तर में किसी ने मुझसे किसी काम के नफ़ा-नुकसान के बारे में पूछा। मैं बड़ी गंभीरता से उसे समझा रहा था कि अचानक मेरे मुँह से निकल गया—"फायता..."

सामने वाला कुछ पल तक मुझे हैरानी से देखता रहा।

उसे शायद लगा होगा कि मैं क्या बोल गया।

और मैं?

मैं भी चुप हो गया।

फिर जाने क्यों मेरे चेहरे पर एक हल्की-सी मुस्कान आ गई और मैंने नज़रें झुका लीं।

उस एक शब्द ने मुझे कुछ पल के लिए फिर वहीं पहुँचा दिया, जहाँ तुम थीं।

जहाँ तुम अपनी उसी मासूमियत से कुछ शब्द ग़लत बोलती थीं और मैं तुम्हें सुधारने के बहाने देर तक परेशान किया करता था।

कितनी अजीब और खूबसूरत बात है न?

तुम चली गईं, मगर तुम्हारी कुछ छोटी-छोटी नादानियाँ आज भी मेरे भीतर साँस ले रही हैं।

लोग कहते हैं कि वक्त के साथ यादें धुँधली पड़ जाती हैं।

शायद उनकी यादें पड़ती होंगी।




मेरी तो कुछ यादें वक्त के साथ और साफ़ होती चली गईं।

तुम्हारी आवाज़ का उतार-चढ़ाव, तुम्हारी हँसी, तुम्हारा किसी बात पर अचानक नाराज़ हो जाना, फिर थोड़ी देर बाद खुद ही सामान्य हो जाना... तुम्हारी वो बेवजह की बातें और मेरी बेवजह की मुस्कान—सब कुछ आज भी वैसा ही है।

बस फर्क इतना है कि तब ये सब मेरे साथ था...

और अब सिर्फ़ मेरी यादों में है।

कभी-कभी सोचता हूँ...

क्या तुम भी कभी किसी शाम यूँ ही चुपचाप बैठकर पीछे मुड़कर देखती होगी?

क्या कभी चाय की चुस्की लेते हुए तुम्हें मेरी किसी बेवकूफ़ी पर हँसी आती होगी?

क्या कभी किसी रास्ते से गुजरते हुए तुम्हें हमारी कोई पुरानी शाम याद आती होगी?

क्या कभी कोई गीत सुनकर तुम्हारा मन भी अचानक ठहर जाता होगा?

क्या कभी तुम्हारे मुँह से भी अनायास मेरा नाम निकल जाता होगा?

शायद हाँ...

और शायद नहीं भी।

शायद तुम बहुत आगे निकल चुकी हो।

शायद तुम्हारी ज़िंदगी में अब बहुत कुछ बदल चुका है। नए लोग, नई बातें, नई व्यस्तताएँ और नए सपने...

और सच कहूँ तो मैं तुम्हारी ज़िंदगी को रोकना भी नहीं चाहता।

क्योंकि प्यार का मतलब हमेशा किसी को अपने पास रखना तो नहीं होता।

कभी-कभी प्यार का सबसे सच्चा रूप यही होता है कि हम किसी को उसकी खुशी के साथ दूर से भी चाह सकें।

मेरे लिए प्यार का मतलब तुम्हें पा लेना कभी था ही नहीं।

मेरे लिए प्यार तो उस अहसास का नाम है, जो तुम्हारे जाने के बाद भी मेरे भीतर उतनी ही शिद्दत से ज़िंदा है।

तुम मेरे साथ नहीं हो, लेकिन इसका मतलब यह तो नहीं कि तुम मेरी कहानी का हिस्सा भी नहीं रहीं।

कुछ लोग हमारी ज़िंदगी से चले जाते हैं, लेकिन हमारे भीतर से कभी नहीं जाते।

तुम शायद उन्हीं लोगों में से एक हो।

मौसम बदल रहे हैं।

हवाओं में अब पहले से थोड़ी ज़्यादा ठंडक घुलने लगी है। रास्ते के पुराने पेड़ धीरे-धीरे अपने पत्ते गिरा रहे हैं। सड़कें वही हैं, शहर वही है, आसमान भी शायद वही है...

मगर सब कुछ फिर भी बदला-बदला सा लगता है।

शायद इसलिए क्योंकि देखने वाली आँखें बदल गई हैं।

और उस सबके बीच एक चीज़ आज भी बिल्कुल वैसी ही है—

वह पुराना पेड़।

याद है?

वही पेड़, जिसके नीचे हमने न जाने कितनी बेफ़िक्र शामें बिताई थीं।

कितनी बातें की थीं, जिनका कोई मतलब नहीं था...

और शायद इसीलिए वे इतनी खूबसूरत थीं।

कभी तुम कुछ कहती थीं, मैं सुनता था। कभी मैं कुछ कहता था और तुम बीच में ही मेरी बात काट देती थीं। कभी हम दोनों चुप बैठे रहते थे और फिर भी ऐसा लगता था जैसे बहुत कुछ कह रहे हों।

वह पेड़ आज भी वहीं खड़ा है।

वैसा ही।

अपनी घनी छाँव फैलाए हुए।

जैसे हमारी सारी कहानियों को अपने भीतर समेटे बैठा हो।

कभी-कभी वहाँ से गुजरता हूँ तो कुछ पल के लिए रुक जाता हूँ।

पेड़ को देखता हूँ और मन ही मन सोचता हूँ—

क्या समय सच में इतना आगे निकल गया है?

या हम ही पीछे छूट गए?

और पता है...

कभी-कभी दिल करता है कि उसी पेड़ के नीचे बैठकर तुम्हारा इंतज़ार करूँ।

शायद तुम आओ...

शायद नहीं।

लेकिन इंतज़ार में भी एक अजीब-सी मिठास है।

क्योंकि इंतज़ार में उम्मीद ज़िंदा रहती है।

इसलिए अगर कभी तुम्हारा मन बहुत भारी हो जाए...

अगर कभी तुम्हें लगे कि इस भागदौड़ भरी दुनिया में कोई तुम्हें उस पुरानी सादगी से सुनने वाला नहीं है...

अगर कभी बहुत सारे लोगों के बीच भी तुम्हें अकेलापन महसूस हो...

तो बस एक बार वहाँ चली आना।

उसी पुराने पेड़ के नीचे।

मैं तुम्हें वहीं मिलूँगा।

न कोई शिकायत लेकर...

न कोई सवाल लेकर...

न तुम्हारे बीते हुए कल का हिसाब माँगूँगा...

न यह पूछूँगा कि इतने साल कहाँ थीं।

बस तुम्हें देखूँगा।

शायद कुछ पल चुप रहूँगा।

और फिर शायद वही पुरानी मुस्कान चेहरे पर आ जाएगी।

क्योंकि कुछ रिश्तों को शब्दों की ज़रूरत नहीं होती।

वे बहुत दूर चले जाने के बाद भी मन के किसी कोने में वैसे ही मौजूद रहते हैं, जैसे शाम ढलने के बाद भी आसमान में थोड़ी-सी रोशनी बची रहती है।

और अगर तुम उस दिन भी कुछ शब्द ग़लत बोल गईं...

तो शायद मैं फिर तुम्हें चिढ़ाऊँगा।

और अगर तुमने फिर "फायदा" को "फायता" कहा...

तो शायद मैं इस बार तुम्हें सुधारूँगा नहीं।

बस मुस्कुराकर कहूँगा—

"हाँ स्वर... फायता ही सही।"

क्योंकि तुम्हारी आवाज़ में कहा हुआ वह ग़लत शब्द भी मेरे लिए किसी सही याद से कम नहीं।

बस एक बात है...

अगर कभी लौटना हो तो देर मत करना।

क्योंकि उम्र भले आगे बढ़ती रहे, मौसम भले बदलते रहें, शहर भले बदल जाए...

लेकिन कुछ इंतज़ार ऐसे होते हैं जिन्हें इंसान अपनी आख़िरी साँस तक निभाता रहता है।

और शायद मेरा इंतज़ार भी उन्हीं में से एक है।

तुम्हें पाने की उम्मीद नहीं है...

बस इतना चाहता हूँ कि कभी किसी शाम हवा पुराने दिनों की ख़ुशबू लेकर आए और तुम भी उसी हवा के साथ वहाँ चली आओ।

मैं वहीं मिलूँगा।

उसी पुराने पेड़ के नीचे...

जहाँ हमारी कहानी कभी ख़त्म हुई ही नहीं थी।

शायद बस एक शब्द के पीछे छिप गई थी—

अलविदा।

तुम्हारी यादों के साथ,
म्यूजिक

Thursday, 18 June 2026

A letter to swar by music 52

Dear swar,



कई रोज़ हुए मुझे तुम्हारा कोई ख़त नहीं मिला।
पहले तो मैं हर सुबह दरवाज़े की आहट पर चौंक जाता था, जैसे डाकिए के हाथों में तुम्हारे शब्द चले आ रहे हों। फिर धीरे-धीरे इंतज़ार आदत बन गया और आदत के बाद एक ख़ामोशी। अब तो हालत यह है कि कभी-कभी अपने ही मन को समझाना पड़ता है कि शायद तुम व्यस्त होगे, शायद रास्ते बदल गए होंगे, या शायद तुम्हें मेरा पता ही याद न रहा हो।

ख़ैर, छोड़ो।

शिकायतें हमेशा दूरियों को और लंबा कर देती हैं। इसलिए आज शिकायत नहीं करूंगा। बस इतना बताने आया हूं कि मैं अब तुम्हारे शहर में हूं।

अजीब बात है न? कभी तुम्हारे शहर तक पहुंचना एक सपना लगता था। सोचता था कि जिस दिन यहां आऊंगा, तुम सामने मिलोगे। उन गलियों में साथ चलेंगे जिनका ज़िक्र तुम अपने ख़तों में किया करते थे। उन रास्तों को देखूंगा जिन्हें तुमने अपनी आंखों से देखा था। उन पेड़ों की छांव में बैठूंगा जिनके नीचे बैठकर तुमने कभी मुझे याद किया होगा।

लेकिन देखो, नियति भी कैसी है।

मैं तुम्हारे शहर में हूं, तुम्हारी हवाओं के बीच हूं, उन्हीं रास्तों पर चल रहा हूं जहां शायद कभी तुम्हारे कदम पड़े होंगे, मगर फिर भी तुमसे मिल नहीं पाया। और सबसे विचित्र बात यह है कि यहां आकर भी मैं तुमसे आमने-सामने बात नहीं कर रहा, बल्कि तुम्हें ख़त ही लिख रहा हूं।



शायद कुछ रिश्ते ऐसे ही होते हैं। उनके बीच की दूरी किलोमीटरों से नहीं नापी जाती। कभी-कभी दो लोग एक ही शहर में होते हैं और फिर भी उनके बीच वर्षों का फ़ासला होता है। और कभी कोई बहुत दूर होकर भी हर पल हमारे साथ रहता है।

आज शाम मैं शहर की एक सड़क पर अकेला चल रहा था। लोग अपने-अपने कामों में व्यस्त थे। दुकानों पर रोशनी थी, चाय की भाप हवा में घुल रही थी, बच्चे खेल रहे थे, और मैं भीड़ के बीच खड़ा होकर तुम्हें याद कर रहा था। अचानक लगा कि अगर इस वक्त तुम सामने आ जाओ तो शायद मैं कुछ कह ही न पाऊं। जो बातें बरसों से मन में जमा हैं, वे शब्दों में नहीं उतरेंगी। इसलिए सोचा, एक बार फिर ख़त का सहारा लिया जाए।

तुम जानती हो, समय बहुत कुछ बदल देता है। चेहरे बदल जाते हैं, शहर बदल जाते हैं, रास्ते बदल जाते हैं। लेकिन कुछ प्रतीक्षाएं ऐसी होती हैं जो उम्र के किसी मोड़ पर भी वैसी ही रहती हैं। तुम्हारा इंतज़ार भी शायद उन्हीं में से एक है।

मैं नहीं जानता कि यह पत्र तुम तक पहुंचेगा या नहीं। यह भी नहीं जानता कि तुम्हें मेरा पता याद है या नहीं। मगर इतना जानता हूं कि जब तक स्मृतियां जीवित हैं, तब तक कोई भी रिश्ता पूरी तरह समाप्त नहीं होता। वह कहीं न कहीं, किसी कोने में, किसी पुराने ख़त की तरह सुरक्षित रहता है।

आज तुम्हारे शहर में बैठकर यह पत्र लिखते हुए मुझे महसूस हो रहा है कि शायद हम दोनों के बीच शब्द ही सबसे सच्चा पुल रहे हैं। मुलाक़ातें नहीं हुईं, आवाज़ें कम सुनीं, मगर शब्द हमेशा आते-जाते रहे। इसलिए एक बार फिर इन्हीं शब्दों के सहारे तुम्हारे दरवाज़े तक पहुंचने की कोशिश कर रहा हूं।

अगर कभी यह ख़त पढ़ो तो जवाब ज़रूर देना।

क्योंकि कई रोज़ हुए मुझे तुम्हारा कोई ख़त नहीं मिला...

और देखो, मैं अब भी वहीं खड़ा हूं, जहां आख़िरी बार तुम्हारे शब्दों का इंतज़ार छोड़ आया था।

तुम्हारा
Music

Wednesday, 31 December 2025

प्रकृति और ईश्वर

 प्रकृति की गोद में ईश्वर कहें या ईश्वर की गोद में प्रकृति ...... 

जी हां, आज मैं आपको एक ऐसे प्राकृतिक स्थल के बारे में बताऊंगा जहां जाकर आप अपने आप को ईश्वर के नजदीक महसूस करेंगे, जहां अपार शांति है, जहां आवाज के नाम पर चिड़ियों की चहचहाहट है या फिर पानी की कलकल....... 

जी हां, मैं बात कर रहा हूं ऋषि मुनियों की पावन धरती सूरजकुंड (राजसमंद) की बात ... हा अपनी अरावली में ही है।

हम शुरुआत करतें हैं गोमती चौराहे से (उदयपुर कांकरोली से देवगढ़ भीम हाइवे पर स्थित है), गोमती चौराहे से हमें निकलना गढबोर चारभुजा की तरफ़, गढबोर से कोई 1-2 किलोमीटर आगे एक जगह दो रास्ते घूम रहे हैं, वैसे दोनों ही रास्ते जाते हैं , हमें जो (बाइक पर) बढ़िया लगा वो बायी ओर केलवाड़ा की तरफ़ का रास्ता ... इस रास्ते पर कोई 7-8 किलोमीटर के बाद एक दरवाजा आएगा उस दरवाजे से आपको अंदर जाना है और फिर आगे से आगे निशान (जैसे स्काउट केंप में निशान छोड़ते हैं) बनें हुए है जिनको फ़ॉलो करतें हुए आपकी बाइक वहां तक लें जाएं जहां तक आप लें जा सकतें हैं (अंतिम दो तीन किलोमीटर की बाइक राइडिंग भी वहां दुर्गम हैं और एक बढ़िया अनुभव देती हैं).


. 

फिर आता है असली मजा, फिर वहां से आप और प्रकृति इसके अलावा कुछ नहीं .. क्योंकि मोबाइल के नेटवर्क भी नहीं आते हैं (इसलिए जब भी जाएं पहले ही घर पर संपर्क कर के बता दें कि अगले 5 घंटे फोन नहीं लगेगा)..... और इस सफर में आनंद इसी बात का है कि न तो पैदल रास्ता व्यवस्थित है और न ही जाना पहचाना (हां, बस निशान बनें हुए है उन्हें फ़ॉलो करतें जाइए) , घने जंगल में गुज़रते हुए डर लगना भी लाज़मी है लेकिन मंजिल की चाहत आपको रुकने नहीं देगी .... रास्ते भर में पहले लगभग 1 किलोमीटर की चढाई और फिर 2-²½ किलोमीटर का उतार और उसके बाद शुरू होता है एक गर्त (भुगोल की भाषा में गॉर्ज कहते हैं शायद), दोनों तरफ़ ऊंचे ऊंचे पहाड़ और बीच में बहता पानी और हमें चलना है उस पानी के किनारे किनारे और प्रकृति का आनंद लीजिए और देखिए कि पानी कितना क्रिस्टल क्लियर ऐसा एक्वेरियम में भी नहीं होता होगा, पानी में नन्ही मछलियां साफ़ दिखती है (बारिश के मौसम में निकलना शायद संभव नहीं होता होगा) ...... और ऐसे ही आनंद लेते लेते आपको जब पशु पक्षियों की चहचहाहट लगातार सुनाई दें तो समझ जाइए आप अपनी मंजिल तक आ गये है ... 😍

और वो स्थान देखकर ही आपकी थकान छु मंतर हो जाएगी, आपकी आस्था ऋषि मुनियों के प्रति और बढ़ जाएगी कि सच में ऐसे निर्जन वन में कैसे शुरुआत की होगी, एक बारगी तो मन करेगा कि यहीं रहकर शान्ति से जीवन जिया जाएं.. सब कुछ नहीं बताऊंगा कभी पहुंचकर महसूस कीजिए, ..... 

हां, वहां पर आपको चाय और भोजन प्रसाद की व्यवस्था


निशुल्क मिलेगी.......... 

एक और बात वहां अभी भी कुड़ा कचरा नहीं है, कहना क्या चाहता हूं समझ गये होंगे आप 😍

तो फिर ...... अरावली के इस हिस्से को महसूस कर आइए .... 

विशेष - जिन्हें ट्रेकिंग करने में कोई दिक्कत न हो वो ही जाएं .... आते समय चढ़ाई ज्यादा करनी पड़ती है तो शरीर साथ देना जरूरी है 😀 

#surajkund #SurajkundRajsamand

करन जांगिड़ 31/12/2025

Sunday, 2 May 2021

Alone boy 31

मैं
अंधेरे की नियति
मुझे चांद से नफरत है......
मैं आसमां नहीं देखता अब
रोज रोज,
यहां तक कि मैं तो
चांदनी रात देख
बंद कमरे में दुबक जाता हूं,
बस अमावस को
आसमां में
काला स्याह अंधेरा देखता हूं.....
तारों से तो कभी
अपना कोई वास्ता भी नहीं रहा,
बस कभी कभी
इनके बीच की दूरी
खटकती है,
क्या इनको भी
फकत अंधेरा ही रास आता है?
खैर छोड़ो तारों को
तुम बताओ
कभी तुम्हारे उजाले में
मेरी परछाई तक देखी है?
तुम्हें अफसोस होगा
तुम्हारे चांद होने का,
तुम्हें खुद के उजाले से
नफ़रत करने को
मजबूर न कर दूं तो कहना........
दरअसल मुझे तुमसे
नफरत नहीं....
तुम्हारी नज़रों से खुद को
देखने पर
खुद से है,
इसलिए तो मुझे
अंधेरे में रहने दो..........
मुझे खुद से
प्रेम करने दो.....
@karan DC 2.5.2021
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Friday, 27 March 2020

A letter to swar by music 51

Dear swar,
सबसे पहले तो थैंक्यू बनता ही है, देर से ही सही तुमने मेरे पत्र का जवाब तो दिया, हां मुझे याद है तुम्हें 50वा पत्र मैंने 19 अगस्त 2018 को लिखा था, आज पूरे 575 दिनों बाद उसका जवाब पत्र
प्राप्त हुआ है। खैर तुमने जो पत्र में कारण बताया है वह मुझे अच्छी तरह मालूम है ......तुम्हारी व्यस्तताएं। हां अब तो तुम्हारे काम और भी बढ़ गए होंगे घर, स्कूल, खेत और कभी-कभी कॉलेज भी...... हां पत्र न तुम्हारा तो मन बहुत बेकरार था शायद कैसी होगी?
क्या कर रही होगी?
क्या कुछ खाती भी है या दिन घर पर काम ही काम ।
हाँ, तुम उधर काम में ही व्यस्त रहती हो मगर तुम्हें मालूम तो है मैं बिल्कुल यहां आवारा हूँ, कहीं कोई काम नहीं मुझे मेरा सबसे बड़ा काम है तुम्हारे नंबर बार-बार सेव करके यह चेक करना कि तुमने whatsapp दुबारा चालू कर दिया हो शायद, तुम्हारे नाम को facebook पर बार-बार सर्च करना कि अपनी id फिर से Activate कर ली हो शायद,..... यहीं मेरी दिनचर्या हैं बस।

हां तुमने पत्र में जिक्र किया है कि अभी अभी तुम फुरसत में हो, कारण भी तो तुमने बता दिया स्कूल कॉलेज बंद, घर के बाहर जाना भी लगभग बंद ही है, घर में बैठे-बैठे अकेली करती भी क्या , ........ इसलिए पत्र ही लिख डाला।

 
PIC- captured by me during the writting of letter, A pigeon sitting on my home's street light(THE MESSANGER)


हां तो, अब मैं अपनी बात पर आता हूं मुझे तो तुम्हारे द्वारा लिखा गया एक लफ्ज भी दुनिया की सर्वोत्तम कृति लगता है, तुमने तो पत्र लिखा है पूरा का पूरा....... पत्र में चाहे जो लिखा हो, उससे हमारा कोई वास्ता ही नही, हां वही तुम्हारी पत्रकार वाले अंदाज़ में, कि फलाने की भैंस ने इतनी दौड़ लगाई कि उसके पीछे दोनों लोग लुगाई ने दौड़कर ओलंपिक का नया रिकॉर्ड बना लिया हो, जमुनी की बकरी ने 2 दिन पहले चट्टान से छलांग लगाकर अपनी एक टाँग तुड़वा ली, शंभूकाका के कारखाना में फसल कटाई के नई बनाई जा रही है.... हालांकि मुझे इन बातों से कोई मतलब नहीं है मगर तुमने लिखी है ना ,लगता है साहित्य में Ph.d करने की ठान ली है......


अब सुनो, प्रकृति ने पिछले कई दिनों से अपने पैंतरे बदल दिए हैं ऐसा लगता है किसी राक्षस ने देवताओं को छेड़ दिया है और अब देवतागण कुपित होकर अपने अस्त्र शस्त्र से प्रहार कर रहे हैं, पता नहीं क्या होने वाला हैं?

हां एक बात तो है, प्रकृति का यह रूप अभी वैसा ही सुंदर, सुरम्य, सुहाना, अतीव रमणीय लगता है,जिसे हर बार, हर बार देखते ही मुझे तुम्हारी याद आ जाती है। तुम्हें याद है ना तुम हवा में अपने हाथों को ऐसे लहराती थी जैसे पेड़ से गिरकर पता हवा में लहराता हुआ जमीं पर आता है, नहाने के बाद तुम बालों को झटकती तो ऐसा लगता था जैसे हवा का कोई झोंका आया और पेड़ की टहनिया इधर उधर हिलने लगी।
चलो, छोड़ो इन बातों को तुम भी पक गई होओगी और सोच रही होओगी कि यह फिर से शुरु गया, हर बार की तरह फिर से क्या करने लगा है? पर क्या करूं मजबूर हूँ, जब भी तुम्हारा ख्याल आता है कलम अपने आप तुम्हारे लिए चल पड़ती है, दिल दिमाग में विचारों का झोंका सा आता है, तुम्हें लिखने बैठ जाता हूँ....... और मैं कर भी तो क्या सकता हूँ ।।

खैर, यह छोड़ो......
तुम बताओ, क्या चल रहा है आजकल? सुना है तुमने अपनी सारी बकरियां बेच दी है ? बेचोगी भी क्यों नहीं अकेली क्या-क्या संभालती!! और इस प्राकृतिक आपदा (मैं इसे मानव निर्मित मानता हूं) में तुम्हारी समस्या और भी बढ़ जाती।।
अब जबकि तुम घर पर हो, प्रकृति ने बाहर कदम न रखने की सख्त हिदायत दे रखी है तो मैं इतना ही कहूंगा अपना ख्याल रखना, हो सके तो बाहर जाने से बचना। पिछले दो चार दिन से दिमाग में बुरे ख्याल से आने लगे हैं कि जाने क्या होगा? प्रकृति के इस प्रकोप से कौन-कौन बच पाएगा, किसकी किस्मत में क्या लिखा है पता नहीं?
मन में यह शंका घर करती है कि तुम जवाब दोगी भी या भी पाओगी (नही, नही ऐसा नही हो सकता ) या तुम्हें अगला पत्र लिखने के लिए मैं यहाँ मौजुद रहूंगा भी या नहीं? यह उस परमपिता के हाथ में हैं, हमें इतनी भी चिंता नहीं करनी चाहिए।
अंत में इतना ही कहूँगा, STAY HOME, STAY SECURE....
.....
PIC- Karan DC writting a letter on the roof of his home..

नैसर्गिक बंधन तो हालाकि पलभर हैं,
                                    टूट जाएंगे आज नहीं तो कल को।।
समाज के बंधनों में जो बंधी हो तुम,
                                  तुमसे काफी है मुलाकात एक पल को।।

प्रकृति का यह रौद्र रूप भी एक दिन समाप्त हो ही जाएगा बस तुम अपना ख्याल रखा।।

                                                                                                With love
                                                                                             Yours
                                                                                             Music
                                                                                             27.3.2020... शुक्रवार

नोट- पत्र में लिखी गई सारी बातें काल्पनिक हैं इनका जीवित या मृत किसी व्यक्ति से कोई संबंध नहीं है।

@ जांगिड़ करन

Saturday, 22 February 2020

सफ़र


जब भी होता हूँ सफ़र में,
दिल में कोई सफर चलता है।

सफ़र उस राह तक का
सफ़र उस रात तक का
जिस रोज तुमने पहनी थी चूड़ी
सफ़र खनकती बाँह तक का,
कोई ख्वाब जबकि अब भी पलता है।
जब भी ........................

सफ़र उस छाँव का
मिट्टी से महकते गाँव का
न तुमको खबर थी न मालुम हमको
कदम पीछे हटा किस पाँव का,
क्यूँ ये वक़्त भी बेवक़्त छलता है।
जब भी ..........................

हमने शहर कहाँ देखा है
तेरे मेरे बीच यहीं तो रेखा है
तुम्हारा इरादा तो अच्छा ही होगा
किस्मत का भी यही लेखा है,
दिल है कि अब भी जलता है।
जब भी ............................

तुम रहो जिन्दगी के सफ़र में 
मोड़ पर बैठ गया मगर मैं 
बालों में सफेदी आने तो दो
तुम भी रहोगी तन्हा शहर में,
देखना करन सूरज कहाँ ढलता है।
जब भी................................
@ जांगिड़ करन(बलराम)
22.02.2020....... 20:30 PM

Monday, 6 May 2019

परछाई 2

न कोई पर्दा
न कोई खिड़की ही थी,
चांद आज
बिल्कुल सामने था.....
बस नजरें झुकी थी
चेहरा खामोश था,
आंखों में उलझन थी,
पैरों में रूकावट थी,
हाथ किसी को बुलाते से लगे,
बालों का रंग जरा पक गया लगता है,
हां,
मगर एक बात
अब भी
वैसी ही थी,
बालों में लगी वो
गुलाबी पिन
आज भी गुलाबी ही थी,
हां,
साड़ी का रंग
देखने की फुर्सत मुझे कहा,
मैं तो बस
एकटक
गुलाबी पिन से
अलग होकर उड़ते
कुछ बाल
देख रहा था,
बालों में पड़ते वो
बल,
जो वक्त की
वक्राकार
नियति को दिखाए
मुझे चिड़ा रहे थे आज भी,
और मैं दूर खड़ा
हाथों से हवा में हर बार
जैसे
तुम्हारे उन बालों को उपर करने
की
कोशिश में लगा रहा,
जैसे वक्त को
बदलने की
कोशिश कर रहा था
मैं।
Karan
06_05_2019

Saturday, 13 April 2019

परछाई 1


सुदूर किसी कौने में
झांक रही थी आंखें,
कुछ तलाश कर रही थी शायद,
तब
मन के किसी कोने में
ख्याल आये,
नीम का पेड़ वहीं,
पीपल भी वहीं,
बस बदली है
तो
मिट्टी की सड़क,
मिट्टी को
उस पक्की सड़क ने
ऐसे दबा दिया है जैसे
मेरे
अरमानों पर
वक्त की
चादर आ पड़ी थी,
खैर मैं हूं
जो
अब भी महसूस कर सकता हूं
सड़क के नीचे
दबी मिट्टी की महक को,
तेरे कदमों के
बनें निशां को,
तेरी जुल्फों के छिटकने से
मिट्टी पर बनें चित्रों को भी,
वो दूर
हैंडपंप की ठक ठक
मेरे कानों अभी भी
गूंज रही है.....
तुम न समझोगे
अरमानों की मिट्टी को,
तुम्हें तो
वक्त की पक्की
सड़कों ने
बदल के
रख दिया होगा ना....

©® Karan DC
13_04_2019___19:00PM

Saturday, 15 December 2018

Alone boy 30

अक्सर
शिकायत रहती है
मेरे सारे दोस्तों को,
चाय से तुम्हारा
इतना
गहरा रिश्ता
कैसे?
हर पल तुम्हें
चाय की
याद सी क्यों रहती है.....
मगर मैं जवाब में
मुस्कुरा देता हूं बस,
कोई
फर्क सिर्फ पड़ता कि कोई
क्यों कर सवाल करता है?
मगर,
जब भी अकेले में सोचता हूं तो
चाय के साथ जुड़े
किस्से याद आते हैं,
साथ ही याद आती है,
तुम्हारे हाथों से
बनी वो आखिरी चाय भी
जिसको पी लेना मेरे बस में न था,
मैं आज भी
हर चाय के साथ वो
पल याद करता हूं,
याद करता हूं
उस अंतिम चाय से
उठते धुएं के उस पार
दिखती
मजबूर तस्वीर को,
याद करता हूं
उन लफ्जों को जो
तुमने खुद न बनाये पर
कहना तो
तुम्हें ही था........
अक्सर एक कप चाय से
तुम्हें
महसूस कर लेता हूं,
कभी खिड़की से,
कभी नीम पर,
कभी जंगल के उन पत्थरों पर.......
अंकित है जहां
तुम्हारे और मेरे
जिंदा होने के सबूत,
वक्त की गर्द ढक देगी हालांकि
इनको
मगर
चाय के कप उठते धूएं में
हर पल
कोई तस्वीर
मजबूरी की
मैं बनाता हूं
मिटाता हूं,
बनाता हूं
मिटाता हूं.......

©® जांगिड़ करन
15_12_2018

Note - 51 से बाद के लैटर के लिए एक पुस्तक छापने के की तैयारी में हुं पर अभी थोड़ा व्यस्त हुं, 2019 के अंत तक या 2020 में पुस्तक जरूर आ जायेगी 😜

Monday, 15 October 2018

Alone boy 29

रुक्सत जो कर गई,
हवाएं
इधर शहर में
घुटन सी होती है।
चुपचाप खड़ी ये
अट्टालिकाएं,
सूरज की
रोशनी को
तरसती है।
शौरगुल से
परेशान पिल्ला
दुबका है,
मोहल्ले की
सबसे
गंदी नाली में।
दीवारों को ताकता
कोई,
डायरी में लिखे
दो लफ्जों से
तस्वीर
बनाने की जुगत में है,
मगर
हर बार
तस्वीर धूंधली ही
नज़र आती उसको,
कई दफा फिर
कोशिश करता है,
और
अंत में
समझ आता है उसको,
कल्पनाओं की
तस्वीरें
सुंदर तो होती है,
मगर साफ
नहीं हो सकती।
जिंदगी की जो
भूल करी
वो भूल
माफ नहीं हो सकती....
किंचित
वो समझ गया सारा ही रहस्य,
तस्वीर को
साफ करने,
वो निकल पड़ा है,
लफ़्ज़ों के
समंदर को
छिपी तस्वीर लाने,
वो निकल पड़ा है
जिंदगी की भूल
का
परिणाम बनाने,
शायद ये
लफ्ज़
अब
उसकी दुनिया है......
...........
A letter to swar by music 51 to 75..
Coming soon...

#करन

Friday, 5 October 2018

Alone boy 28

जैसे आसामां की
गोद में सोया
कोई ख्वाब,
पलकों के उस पार
कहीं कोई फुदकती है अब
आशाओं की डोर नहीं है
जो
बाँध लें उसको,
बस बंद आंखों में
कहीं दूर
आसमां के साये में
पंख फड़फड़ाते हुए से
नजर आते हैं।
इधर बादलों ने
घेरा है,
आंखों में समाकर कुछ
धुंधला सा
कर रहें तस्वीरों को,
मगर जब कभी
आंखें बरसकर साफ हो,
सब कुछ दिख
जाता है,
वहीं जो कई रोज पहले
किसी सपने में देखा करता था...
आसमां में बसते वो
दो तारे,
अक्सर एक दूसरे के
करीब आने
की
कोशिश में रहते, और
रात का घना अंधेरा
इस बात का गवाह होता....
मगर वक्त के
साथ
जानें क्यों
तारों की दूरियां बढ़ने लगी,
लगता कि कोई
एक तारे को
खींच रहा पीछे से....
मगर एक तारा अब भी
वहीं मौजूद, न किसी तारे से राग, न द्वेष,
बस निर्विघ्न
जिंदगी,
न किसी से कुछ कहता है, न सुनता है,
शायद अंधेरे से कुछ बात करता हो
अब भी।

©® करन जांगिड़
04.10.2018 .... 23:00PM

Sunday, 19 August 2018

A letter to swar by music 50

Dear swar, "किसी को पाने के लिए खुद का खो जाना, मानो न मानो मोहब्बत यहीं चीज है.........!!!! .. I respect you and your feelings. Actually the time was enable to blossoms the flowers of love between us. Perhaps we both were wrong............... First you got your way of life and now I am finding my own way without any destination............ So I think I should tell you something.... ........ काल के किसी खंड में (मैं समय और तारीख भी मालूम है पर लिखना ज़रूरी नहीं, तुम्हें खुद याद आ जानी है) तुमने सिर्फ अपनी इच्छाएं जाहिर की थी, वो इच्छाएं जो हर लड़की के ज़हन में अपनी जिंदगी को लेकर पनपती है, वे इच्छाएं जो हर समय कुछ ढूंढते रहने या कुछ पाने को मजबूर करती है..... मैं नादान था उस समय, समझ नहीं पाया था कि इशारे कभी सच जाहिर नहीं किया करते..... तुम्हें याद तो होगा तुम्हारे इरादों और प्रश्नों से बचने के लिए मैंने असफल सा प्रयास भी किया था..... मगर मैं भी इंसान हुं मेरी भी अपनी कमजोरियां होनी थी, कुछ सीमाएं होनी थी.......... बस वहीं से वक्त ने मेरी जिंदगी के पन्नों पर रंगीन स्याही दिखाकर काली सफेद रेखाएं खींचना शुरू कर दी और जैसा कि हर इंसान मन से कमजोर होता है, जो समझ नहीं पाता कि वास्तव में जो हो रहा है वो आगे क्या रंग दिखायेगा!! उधर वक्त अपनी ही रेखाएं बना रहा था और मैं इधर कल्पनाओं में जिंदगी को हसीन रंगों में सजाने की जुगत में था... कभी तुम्हारे चेहरे में चाँद ढूंढता तो कभी जंगल में खिलें किसी फूल का अहसास करता.... कभी चेहरा दूर क्षितिज सा लगता जिसका कोई अंत ही न हो..... तुम्हारी आँखें मुझे झील सी नजर आती कि हर वक्त इनमें डूबा ही रहुं..... कभी तुम्हारी आँखों में खुद को देखकर सँवरने की सोचता..... मेरे मन की इच्छाएं तुम्हारे काले घने बालों में बादल ढूंढ लेती थी, कभी चेहरे पर गिरी जुल्फों के पीछे छिपे चाँद का दीदार आँखें चाहती थी..... पर एक बात याद दिला दूं.... तुम्हें याद है न हम आज तक कभी अकेले में मिलें भी नहीं......(यहीं सच है जिसे कोई भी मित्र या पाठक स्वीकार नहीं करेगा)... हां... मैंने कई बार तुमसे जाहिर किया था कि तुम्हारे कान पकड़कर उमेठने का मन करता है...... तुम्हारे नाक संग चिकीविकी खेलने का मन करता है.... तुम्हारी जुल्फें खींचकर चिड़ाने का मन करता है......, पर कभी नहीं कर पाया... मतलब कि वक्त मौका ही नहीं दिया!! चलो छोड़ो...... ये वक्त की बातें हैं, दोष तुम्हारा या मेरा नहीं था! हां, तो मैं कहां था..... कल्पनायें... इन कल्पनाओं की अपनी वजह थी..... जब तुम्हें देखता आंगन में नृत्य करते हुए तो मन के कौनें में हिरणी बन फुदकती कुदती सी नजर आती थी... जब जब तुमने मेरे किसी गीत को गुनगुनाया मुझे यूं लगा कि , "जिंदगी-स्वर से बढ़कर कुछ भी नहीं है!".... तुम्हारी आवाज़ में खोया मैं फोन कट जाने पर भी फोन कानों से दूर हटाना भूल जाता था... मैं यकीन के साथ कह सकता हूं कि तुम आज भी उतना ही मधुर गाती हो जैसे पेड़ पर बैठी कोई कोयल राग सुना रही हो.... और तुम्हारी यह आवाज ऐसी ही बनी रहेगी... इन बातों से इतर....... तुमने और मैंने जिंदगी के सपने बुने थे, वे सपने जो हकीकत की जिंदगी से ताल्लुक रखते थे.... वे सपने मुझे तुम्हारा होने और तुम्हें मेरा होने पर गर्व का अहसास दिलाते थे..... हर सपने की नींव हम दोनों ने साथ रखी थी.... तुम्हारे हर सपने को मैंने अपना समझा था.... तुम्हारे सपनों की खातिर मैंने अपने सपनों को ही तोड़ा था..... मैंने वो सपना भी तोड़ दिया जिसके लिए तो मैं मरा जा रहा था... (DC).... बचपन में जब रेडियो पर RJ को सुनता या टीवी पर एंकर को देखता तो मन में ख्याल आया कि बनना तो कुछ ऐसा ही है.......... पर जब थोड़ा बड़ा हुआ और आगे पढ़ाई को जीवन से जोड़ कर देखा गया तो सबने यहीं सलाह दी थी कि Mass communication का कोर्स महंगा है और जॉब की सिक्योरिटी भी नहीं है... मैं भी अपनी पारिवारिक स्थिति से वाकिफ था.... पढ़ना मेरे बस में था, पर बाहर किसी शहर में रहकर खर्च वहन करना और परिवार को संकट में डालने की हिम्मत नहीं हुई थी..... फिर 2004 में जब कला वर्ग में पढ़ाई शुरू की तो सपना ही बदल गया.... पर दिमाग सपने कौनसे छोटे देखता है.... अब भी सपना तो बड़ा ही था... हां, अब यह था कि मेहनत खुद को करनी थी..... सपना था DC.. .. फिर वक्त ने मोड़ बदला.... सीनियर के बाद सबसे ज्यादा चाहने वालों ने भी जब BSTC की सलाह दी तो मुझे माननी पड़ी... मन में DC तो था ही........ BSTC की... 2012 में मास्टर जी बन गये.... नौकरी की खुशी में समय निकल पड़ा... पर सपना भूला नहीं था... तैयारी शुरू हो गई थी... इस बीच तुमसे मुलाकात...... तुम्हें भी सबसे ज्यादा इस DC पर बहुत आश्चर्य हुआ था न कि यह क्या है? जो केवल दो लोग जानते थे तुम्हें भी बताना ही पड़ा..... तुमने यह तक कहां था आपका सपना जरूर पूरा होगा............... और फिर तुम, मैं और सपना साथ...... पहली बार 2015 में पहली बार इसके लिए परीक्षा दी थी (केवल समझने के लिए की मुझे किस तरह तैयारी करनी पड़ेगी, मेहनत थी पर इतनी ज्यादा नहीं कि कोई उम्मीद इस परीक्षा से नहीं की थी, हां... पर परीक्षा देकर इतना तो समझ आ गया, यस!! आई केन डू इट)....... मैं लग गया था तैयारी में.... मगर वक्त शायद कुछ और चाहता था.... तुम्हें मजबूर किया वक्त ने और तुमने फिर.... वो शुरू किया जो मुझे एक शायर की तरह बनना पड़ा... उससे पहले मैंने कभी तुम्हारे लिए भी खुद ने नहीं लिखा था.... पर जब शुरू हुआ तो जैसा तुम जब बिहेव करती कलम वैसा ही पोजिटिव या निगेटिव.... कागज़ को रंग देती।। इससे पहले के 49 letters किसी न किसी घटना से जुड़े हैं जो तुमसे जुड़ी हो...... मैं बस सपने छोड़..... इधर खोया रहने लगा.... तुम नाराज़ तो मैं उदास, तुम खुश तो मैं खुश.... मगर कई दिनों पहले... वक्त ने एक झटके में तंद्रा तोड़ दी
ख्वाबों में खोया मैं हकीकत से रूबरू होकर काँप गया..... पीछे देखता हूं तो वो हसीन पल याद आते हैं और अब सब उजड़ा उजड़ा सा लगता है.... यहां से पांवों में अब और चलने की हिम्मत नहीं रहीं, ऐसा महसूस होता है जैसे जमीं ने मुझे रोक दिया है अपनी शक्ति से...……. आंखें आकाश को अब भी देखती है पर किसी उम्मीद में नहीं, बस शून्य में ताकती है कि इसमें ही कहीं समा जाऊं.............. पर इन सबसे इतर मेरे पास जीने की कुछ और वजह है, वो सबकुछ जिसने मुझे यहां तक पहूंचाया है, जो हर समय मेरे साथ रहें हैं....... मैं कैसे भी रहुं पर अब हारूंगा तो नहीं!! हां, अब से कोई मकसद नहीं, कोई सपना नहीं, सिर्फ रास्ता..... आखिर सांस तक चलने का इरादा है बस!!!
...................
जरा सी आहट हो तो
ज़िन्दगी कुछ ख्वाब बन लेती है,
पैरों में जहाँ रखने की
जहमत उठाया करते है सब,
ज़िन्दगी हर बार कोई
परिंदा बीमार रख लेती है.
समय कितना गहरा है,
आदमी का क्या है ,
रेत पर बने निशान भी 
आँखे संभाल लेती है.
अब तलक ढूंढ़ता रहा किनारे,
समंदर की लहरे अब 
मुझको संभाल लेती है.......
..... और अब मुख्य बात, तुम परेशान नहीं होना.... दोष तुम्हारा बिल्कुल नहीं है, हालांकि मेरे साथ बहुत गलत हुआ है इतना ज्यादा कि इस गलती को सुधारने के लिए अब वक्त नहीं है.... खैर रहने दो यह सब.... भगवान से दुआ करता हूं कि खुश रहो तुम और खुश रहने के लिए मुझसे दूर रहना जरूरी है इसलिए.... एक चेतावनी है दुनिया गोल है कभी न कभी आमना-सामना हो सकता है मगर मुझसे बोलने की हिम्मत भी मत करना अब वरना left hand सीधे तुम्हारे गाल पर पड़ेगा.... Good bye
Its only of mine Music ©® JANGIR KARAN DC 05_08_2018__08:00AM

Tuesday, 17 July 2018

Alone boy 27

अक्सर आंखें
ढूंढ ही लेती
उदास होने की वजह...
मौसम जरूर
Jangir Karan
बरसात का है,
खिलने का है, मिलने का है
मगर,
उस टूटे हुए पत्ते को पूछो,
क्या मौसम उसको भाता है,...
उसकी नियति सड़ना है,
गलना है, कटना है......
खिलना तो वो भूल गया,
सावन से वो रूठ गया।
मगर हर मौसम भी
उसको ऐसे ही चुभता है,
पानी से गलना,
सूरज से जलना,
हवा से भटकना..
कुछ और नहीं वो कर सकता है,
बस मन ही मन सिसकता है।
करुणाई तो देखी उसने,
हवा उसे सहलाती है,
मिट्टी प्यार जताती है,
नदी उसे झुलाती है।
मगर क्या यह करुणाई,
फिर उसे जोड़ पायेगी,
पीले पड़ते चेहरे पे,
रंग हरा ला पायेगी.......
खूब समझता पत्ता भी,
ढांढस का सब खेल यह,
अपने अश्रु छिपा रहा,
जग से हाथ मिला रहा.....
मुस्कुराते जब उसको देखा,
मेरा मन भी मुस्काया!!!
अक्सर आंखें कह देती है,
क्या तुमने खोया, क्या पाया!!!!!!
©® JANGIR KARAN
17_07_2018____10:00AM

Thursday, 10 May 2018

A letter to swar by music 49

Dear swar,
गणित तुम्हारी आदत है, मगर मुझे तो यूं लगता है कि तुम्हें गिनती भी नहीं आती होगी, हैरान होने की बात नहीं है!! तुम्हें कैलेंडर में तारीख देखना भी नहीं आता शायद?
पूरा एक साल निकल गया है, एक साल मतलब कि पुरे 365 दिन यानि कि 5,25,600 मिनिट्स... नहीं है है ना याद?
हां,
तुम गणित को सिर्फ आंकड़ों का खेल मानती हो, मगर मैं तुम्हारी इस गणित को जिंदगी से जोड़कर देखता हूं! उस वक्त से जब तुमने पहली बार आवाज दी थी, हां वो पल, दिन, वार, समय... उस पल की हर एक बात, कितने अक्षर थे वो भी याद है!
लेकिन तुम्हें तो इतना भी याद नहीं कि एक साल में तुमने मेरी किसी बात का जवाब नहीं दिया....
अब तुम्ही बताओ गणित कैसा है तुम्हारा?
.......
और इधर आजकल...
......
हर तरफ से वक्त ने छीना है सुकून जिंदगी का,
मैं वक्त तुम्हें ढूंढ चैन पाने निकला हूं।
....
आवाज़ नहीं दी होगी तुमने,
शायद मेरा सुनना भी वहम था।
.....
कल फिर तुम्हें सोचना है,
कल फिर तुम्हें चाहना है।
आज की खातिर भला
क्यों तुम्हें भुलाने की कोशिश करूं?
……….....................................
अब सुनो प्रिये,
यह जिंदगी मेरी रेल की पटरी सी हो चली है! हां, तुमने गणित में देखे है रेल और पटरी के सवाल...
रेलगाड़ी की लंबाई, पटरी की लंबाई, चाल, समय, सापेक्ष चाल आदि आदि!! हां मेरी जिंदगी के गणित में भी रेल की पटरी से सवाल उलझे हैं.... पटरी से कितनी रेलगाड़ियां गुजरती है, कौनसी कितनी लंबी थी, क्या गति थी, आमने-सामने से कब कौनसी रेल गुजरी? जिंदगी की पटरी इन सवालों से ज्यादा अलग तरह के अहसासों के उलझन में है!
हां....
हर गुजरती रेलगाड़ी के निकल जानें की दुआ करती है वो, क्योंकि रेलगाड़ी की गड़गड़ाहट भी उसे तन्हा सफर देती है जिसमें उसे कुछ और नहीं सुनाई देता...
क्योंकि पटरी को एक बात तो पता है रेलगाड़ी का तो गुजरना तय है वहां हमेशा के लिए रुकने से तो रही....
और पटरी को अपनी नियति भी पता है, मगर वो समझती कहां?
हर गुजरती रेलगाड़ी के साथ एक और ख्याल आता होगा पटरी के मन में कोई रेलगाड़ी ऐसी भी हो जो हर क्षण के लिए यहीं रुक जाये...
हां, वो रेलगाड़ी आती जरूर है मगर रुकती कहां!
पल भर में फिर रवाना हो जाती है, जब उसमें जान है चलना है..... जिस दिन थक जायेगी तब जाके कहीं रुकेगी, जब उसको जंग लग जायेगी तब वो रुकेगी शायद...
पर अब उसमें भी एक डर है, तब तक वो पटरी खुद पुरानी और कबाड़ न हो जाये कि निकालकर कबाड़ख़ाने में डाल दी जाये कहीं.... और बस फिर तो!!!
रेलगाड़ी से मिलन का ख्वाब भी ख्वाब नहीं, एक बीता हुआ कल रह जायेगा...
यहीं जिंदगी है..
जिसके सवाल ऐसे हैं जिनके जवाब तुम्हारी गणित के पास नहीं है, जवाब तुम्हारे ज़हन में है...
पर तुम अपने ज़हन की सुनती कहां हो,
तुम्हें तो गणित के सुत्रों पर चलना है ना!!!

..........
खैर इस एक साल में दो बातें तो महसूस करी है....
पहली, बदलना बहुत आसान है मगर, बदलने वालों को बदलना मुश्किल है जरा।
दुसरी, प्रेम इंसान को जीने के अलग अलग तरीके सीखा देता है।
!!!!!!
और हां,
एक खुशखबरी सुनाये!!!
हम जिंदा है
शरीर से नहीं मन से भी!
कभी कागज पर
कभी दिलों में
हां,
जिंदा है हम
पंछियों की उड़ान में
स्कूल जाते बच्चों की मुस्कान में
जिंदा है हम....
!!!!!!!
With love
Always yours
Music
©® Karan KK
10_05_2018___15:00PM
  • Photo from Google with due thanks

घरौंदा

मन के बनायें घरौंदे,
न तेरे प्रेम की मिट्टी चाहिए,
ना ही तेरी रहमतों का पानी.....
कोई फर्क नहीं पड़ता
इसपर
तेरी नफ़रत की आंधियां का भी.....
मैं खुद ही
दीवार बना और
बिगाड़ लेता हूं,
कहां क्या रखना है सब
तुम्हारी इच्छा पर
बनाता हूं........
और जब तेरी याद
याद आती है,
कल्पनाओं का
झरोखा खोल
किचन में देख लेता हूं तुमको,
एक बारगी पुकार लूं तुम्हें
एक कप चाय,
पर नहीं,
मैं तो बस तुम्हें
बिन बताए तुम्हें देखना चाहता हूं.....
अक्सर तेरी याद में
खोया
किवाड़ की सिटकनी भूल जाता हूं मैं...
पर यह अच्छा है,
तुम्हें आने में कोई तकलीफ़ न होगी...
मन के घरौंदे है
और भागदौड़ जिंदगी की
हकीकत है,
अचानक तंद्रा टूटती है,
साथ ही टूट जाता है घरौंदा
और एक कमरे की चार दीवारों में कैद
मैं
फिर एक घरौंदा बनाता हूं!

©® KARAN KK

10_05_2018___5:20AM

Sunday, 6 May 2018

A letter to swar by music 48

Dear swar,
.............
मुकम्मल जिंदगी मुकम्मल ख्वाब ये तो हुई लोगों की बात...
उखड़ा हुआ चाँद और एक आवारा करन...
यह हूं मैं
....
महकना है दिन को मेरे आजकल,
अरसे बाद चाँद को देखा है मैंने।।
😘😘
......
आंखों से कोई नूर बरसता है,
चाँद ने पूनम की रात दिखाई है...
😘😍😘😍😘
.......
बहका था मैं आज कुछ पल को,
जमाने की मगर बंदिश थी यारा।
😘😍😘
........
यह वो सबकुछ है जो पलभर की मुलाकात के बाद दिलो-दिमाग में आया था...
!!!!!!!!
बाकी......
गुस्सा लाजवाब था...... गुस्से में भी तुम इतनी खूबसूरत लगती हो कि पूछो ही मत.. मेरी!! मेरी तो भी वहीं हालत है तुम हो जो सामने तो दिल दिमाग शरीर सबकुछ हेंग हेंग सा हो जाता है.... तुमसे मिलने से पहले बहुत सोचा कि यह कहूंगा वो कहूंगा पर मिलने पर कुछ भी न कह सका, बस देखता ही रहा!!
क्या देखता हूं मैं....
और ख्याल आयें भी तो...
तुम्हारी गणित के, जैसे तुमने जोड़ लिया है खुद में एक खूबसूरत चाँद खुद में, घटा दिया है पहले जैसा मुस्कुराना, गुणा किया है अपनी गंभीरता को, भाग दे दिया है जिंदगी में जानें किसका.........
मैं सिर्फ सोचता रहा कि किस बिंदु पर खड़ी हो तुम, आसपास कितने बिंदु और थे जिनकी तरफ किरण बनकर या रेखा बनकर तुम बढ़ सकती हो.....
उन दुसरे बिंदुओं में तुम्हारे लिए मैं शायद नहीं हुं और मानकि हुं भी दूर अनंत में कुछ धूंधला सा....
तुम्हारा रेखाखंड हो जाना तो निश्चित है अब किस बिंदु तक पहुंच के रुक जाना है यह सिर्फ वक्त जानता है पर जानती हो रेखाखंड हो जाना इतना आसान नहीं है, और तुम्हारे लिए तो शायद बहुत मुश्किल है क्योंकि तुम्हें शुरू से किरण हो जानें का शौक रहा है कोई और समझें न समझें मैं समझता हूं और जिस दिन ये पंक्तियां तुम पढ़ोगी मेरा दावा है समझ गई तो रोओगी भी और तुम्हें इस बात का गर्व होगा कि तुम ऐसे इंसान के करीब भी रही थी जो तुम्हारे मन की बात को चंद गणित में कह सका और वो भी सटीक सटीक.... पर तुम्हारा रोना, बहुत देर हो चुकी होगी शायद, तब न तुम कोई बिंदु बदल पाओगी और मानाकि बदलना चाहोगी तो भी मैं तब धूंधला बिंदु इतना धूंधला हो जाऊंगा कि नजर भी आऊं या नहीं भी...
अभी तो तुम समझकर नासमझ ही बनोगी क्योंकि तुम्हारे आसपास कई बिंदुओं का संगम है.....
किरण हो जाने का वक्त नहीं है अब और रेखाखंड होकर रुक जाना है,
दुआ है खुश रहो.....
!!!!!!
जब तुमको देखा था ना पूरे 5 महीने बाद तो दिल दिमाग कुछ कहने पर मजबूर हो गया, बाकी मैं तो अब तक भी तुम्हारे ख्याल मात्र से खुश रह लेता हूं और आगे भी रहूंगा!!
!!!!!!
आगे से कोशिश करूंगा कि कोई और मुलाकात न हो, क्योंकि अब यह बहुत परेशानियां पैदा करती है दिल में,
मैं बस युहीं खुश रहना चाहता हूं....
तुम्हें सोचकर,
गणित के किसी प्रमेय की तरह सिद्ध कर लेता हूं कि तुम यहीं कहीं हो...
!!!
बातें बहुत है!
बस तुम सुन सुन कर परेशान हो जाओगी?
।।।
इसलिए इतना ही!!!
बाय।

With love
Yours
Music

Written by KARAN KK
05__05_2018___23:00PM

फोटो- अंधेरे में चाँद

A letter to swar by music 54

  Dear swar, मुझे अब भी खटकता है, तेरा नदी के उस पार होना। सांसें बेशक हैं मगर, जिंदगी का यह कैसा अफसाना।। पता नहीं क्यों, लेकिन इन दिनों...