Wednesday, 31 December 2025

प्रकृति और ईश्वर

 प्रकृति की गोद में ईश्वर कहें या ईश्वर की गोद में प्रकृति ...... 

जी हां, आज मैं आपको एक ऐसे प्राकृतिक स्थल के बारे में बताऊंगा जहां जाकर आप अपने आप को ईश्वर के नजदीक महसूस करेंगे, जहां अपार शांति है, जहां आवाज के नाम पर चिड़ियों की चहचहाहट है या फिर पानी की कलकल....... 

जी हां, मैं बात कर रहा हूं ऋषि मुनियों की पावन धरती सूरजकुंड (राजसमंद) की बात ... हा अपनी अरावली में ही है।

हम शुरुआत करतें हैं गोमती चौराहे से (उदयपुर कांकरोली से देवगढ़ भीम हाइवे पर स्थित है), गोमती चौराहे से हमें निकलना गढबोर चारभुजा की तरफ़, गढबोर से कोई 1-2 किलोमीटर आगे एक जगह दो रास्ते घूम रहे हैं, वैसे दोनों ही रास्ते जाते हैं , हमें जो (बाइक पर) बढ़िया लगा वो बायी ओर केलवाड़ा की तरफ़ का रास्ता ... इस रास्ते पर कोई 7-8 किलोमीटर के बाद एक दरवाजा आएगा उस दरवाजे से आपको अंदर जाना है और फिर आगे से आगे निशान (जैसे स्काउट केंप में निशान छोड़ते हैं) बनें हुए है जिनको फ़ॉलो करतें हुए आपकी बाइक वहां तक लें जाएं जहां तक आप लें जा सकतें हैं (अंतिम दो तीन किलोमीटर की बाइक राइडिंग भी वहां दुर्गम हैं और एक बढ़िया अनुभव देती हैं).


फिर आता है असली मजा, फिर वहां से आप और प्रकृति इसके अलावा कुछ नहीं .. क्योंकि मोबाइल के नेटवर्क भी नहीं आते हैं (इसलिए जब भी जाएं पहले ही घर पर संपर्क कर के बता दें कि अगले 5 घंटे फोन नहीं लगेगा)..... और इस सफर में आनंद इसी बात का है कि न तो पैदल रास्ता व्यवस्थित है और न ही जाना पहचाना (हां, बस निशान बनें हुए है उन्हें फ़ॉलो करतें जाइए) , घने जंगल में गुज़रते हुए डर लगना भी लाज़मी है लेकिन मंजिल की चाहत आपको रुकने नहीं देगी .... रास्ते भर में पहले लगभग 1 किलोमीटर की चढाई और फिर 2-²½ किलोमीटर का उतार और उसके बाद शुरू होता है एक गर्त (भुगोल की भाषा में गॉर्ज कहते हैं शायद), दोनों तरफ़ ऊंचे ऊंचे पहाड़ और बीच में बहता पानी और हमें चलना है उस पानी के किनारे किनारे और प्रकृति का आनंद लीजिए और देखिए कि पानी कितना क्रिस्टल क्लियर ऐसा एक्वेरियम में भी नहीं होता होगा, पानी में नन्ही मछलियां साफ़ दिखती है (बारिश के मौसम में निकलना शायद संभव नहीं होता होगा) ...... और ऐसे ही आनंद लेते लेते आपको जब पशु पक्षियों की चहचहाहट लगातार सुनाई दें तो समझ जाइए आप अपनी मंजिल तक आ गये है ... 😍

और वो स्थान देखकर ही आपकी थकान छु मंतर हो जाएगी, आपकी आस्था ऋषि मुनियों के प्रति और बढ़ जाएगी कि सच में ऐसे निर्जन वन में कैसे शुरुआत की होगी, एक बारगी तो मन करेगा कि यहीं रहकर शान्ति से जीवन जिया जाएं.. सब कुछ नहीं बताऊंगा कभी पहुंचकर महसूस कीजिए, ..... 

हां, वहां पर आपको चाय और भोजन प्रसाद की व्यवस्था


निशुल्क मिलेगी.......... 

एक और बात वहां अभी भी कुड़ा कचरा नहीं है, कहना क्या चाहता हूं समझ गये होंगे आप 😍

तो फिर ...... अरावली के इस हिस्से को महसूस कर आइए .... 

विशेष - जिन्हें ट्रेकिंग करने में कोई दिक्कत न हो वो ही जाएं .... आते समय चढ़ाई ज्यादा करनी पड़ती है तो शरीर साथ देना जरूरी है 😀 

#surajkund #SurajkundRajsamand

करन जांगिड़ 31/12/2025

Sunday, 2 May 2021

Alone boy 31

मैं
अंधेरे की नियति
मुझे चांद से नफरत है......
मैं आसमां नहीं देखता अब
रोज रोज,
यहां तक कि मैं तो
चांदनी रात देख
बंद कमरे में दुबक जाता हूं,
बस अमावस को
आसमां में
काला स्याह अंधेरा देखता हूं.....
तारों से तो कभी
अपना कोई वास्ता भी नहीं रहा,
बस कभी कभी
इनके बीच की दूरी
खटकती है,
क्या इनको भी
फकत अंधेरा ही रास आता है?
खैर छोड़ो तारों को
तुम बताओ
कभी तुम्हारे उजाले में
मेरी परछाई तक देखी है?
तुम्हें अफसोस होगा
तुम्हारे चांद होने का,
तुम्हें खुद के उजाले से
नफ़रत करने को
मजबूर न कर दूं तो कहना........
दरअसल मुझे तुमसे
नफरत नहीं....
तुम्हारी नज़रों से खुद को
देखने पर
खुद से है,
इसलिए तो मुझे
अंधेरे में रहने दो..........
मुझे खुद से
प्रेम करने दो.....
@karan DC 2.5.2021
Published from Blogger Prime Android App

Friday, 27 March 2020

A letter to swar by music 51

Dear swar,
सबसे पहले तो थैंक्यू बनता ही है, देर से ही सही तुमने मेरे पत्र का जवाब तो दिया, हां मुझे याद है तुम्हें 50वा पत्र मैंने 19 अगस्त 2018 को लिखा था, आज पूरे 575 दिनों बाद उसका जवाब पत्र
प्राप्त हुआ है। खैर तुमने जो पत्र में कारण बताया है वह मुझे अच्छी तरह मालूम है ......तुम्हारी व्यस्तताएं। हां अब तो तुम्हारे काम और भी बढ़ गए होंगे घर, स्कूल, खेत और कभी-कभी कॉलेज भी...... हां पत्र न तुम्हारा तो मन बहुत बेकरार था शायद कैसी होगी?
क्या कर रही होगी?
क्या कुछ खाती भी है या दिन घर पर काम ही काम ।
हाँ, तुम उधर काम में ही व्यस्त रहती हो मगर तुम्हें मालूम तो है मैं बिल्कुल यहां आवारा हूँ, कहीं कोई काम नहीं मुझे मेरा सबसे बड़ा काम है तुम्हारे नंबर बार-बार सेव करके यह चेक करना कि तुमने whatsapp दुबारा चालू कर दिया हो शायद, तुम्हारे नाम को facebook पर बार-बार सर्च करना कि अपनी id फिर से Activate कर ली हो शायद,..... यहीं मेरी दिनचर्या हैं बस।

हां तुमने पत्र में जिक्र किया है कि अभी अभी तुम फुरसत में हो, कारण भी तो तुमने बता दिया स्कूल कॉलेज बंद, घर के बाहर जाना भी लगभग बंद ही है, घर में बैठे-बैठे अकेली करती भी क्या , ........ इसलिए पत्र ही लिख डाला।

 
PIC- captured by me during the writting of letter, A pigeon sitting on my home's street light(THE MESSANGER)


हां तो, अब मैं अपनी बात पर आता हूं मुझे तो तुम्हारे द्वारा लिखा गया एक लफ्ज भी दुनिया की सर्वोत्तम कृति लगता है, तुमने तो पत्र लिखा है पूरा का पूरा....... पत्र में चाहे जो लिखा हो, उससे हमारा कोई वास्ता ही नही, हां वही तुम्हारी पत्रकार वाले अंदाज़ में, कि फलाने की भैंस ने इतनी दौड़ लगाई कि उसके पीछे दोनों लोग लुगाई ने दौड़कर ओलंपिक का नया रिकॉर्ड बना लिया हो, जमुनी की बकरी ने 2 दिन पहले चट्टान से छलांग लगाकर अपनी एक टाँग तुड़वा ली, शंभूकाका के कारखाना में फसल कटाई के नई बनाई जा रही है.... हालांकि मुझे इन बातों से कोई मतलब नहीं है मगर तुमने लिखी है ना ,लगता है साहित्य में Ph.d करने की ठान ली है......


अब सुनो, प्रकृति ने पिछले कई दिनों से अपने पैंतरे बदल दिए हैं ऐसा लगता है किसी राक्षस ने देवताओं को छेड़ दिया है और अब देवतागण कुपित होकर अपने अस्त्र शस्त्र से प्रहार कर रहे हैं, पता नहीं क्या होने वाला हैं?

हां एक बात तो है, प्रकृति का यह रूप अभी वैसा ही सुंदर, सुरम्य, सुहाना, अतीव रमणीय लगता है,जिसे हर बार, हर बार देखते ही मुझे तुम्हारी याद आ जाती है। तुम्हें याद है ना तुम हवा में अपने हाथों को ऐसे लहराती थी जैसे पेड़ से गिरकर पता हवा में लहराता हुआ जमीं पर आता है, नहाने के बाद तुम बालों को झटकती तो ऐसा लगता था जैसे हवा का कोई झोंका आया और पेड़ की टहनिया इधर उधर हिलने लगी।
चलो, छोड़ो इन बातों को तुम भी पक गई होओगी और सोच रही होओगी कि यह फिर से शुरु गया, हर बार की तरह फिर से क्या करने लगा है? पर क्या करूं मजबूर हूँ, जब भी तुम्हारा ख्याल आता है कलम अपने आप तुम्हारे लिए चल पड़ती है, दिल दिमाग में विचारों का झोंका सा आता है, तुम्हें लिखने बैठ जाता हूँ....... और मैं कर भी तो क्या सकता हूँ ।।

खैर, यह छोड़ो......
तुम बताओ, क्या चल रहा है आजकल? सुना है तुमने अपनी सारी बकरियां बेच दी है ? बेचोगी भी क्यों नहीं अकेली क्या-क्या संभालती!! और इस प्राकृतिक आपदा (मैं इसे मानव निर्मित मानता हूं) में तुम्हारी समस्या और भी बढ़ जाती।।
अब जबकि तुम घर पर हो, प्रकृति ने बाहर कदम न रखने की सख्त हिदायत दे रखी है तो मैं इतना ही कहूंगा अपना ख्याल रखना, हो सके तो बाहर जाने से बचना। पिछले दो चार दिन से दिमाग में बुरे ख्याल से आने लगे हैं कि जाने क्या होगा? प्रकृति के इस प्रकोप से कौन-कौन बच पाएगा, किसकी किस्मत में क्या लिखा है पता नहीं?
मन में यह शंका घर करती है कि तुम जवाब दोगी भी या भी पाओगी (नही, नही ऐसा नही हो सकता ) या तुम्हें अगला पत्र लिखने के लिए मैं यहाँ मौजुद रहूंगा भी या नहीं? यह उस परमपिता के हाथ में हैं, हमें इतनी भी चिंता नहीं करनी चाहिए।
अंत में इतना ही कहूँगा, STAY HOME, STAY SECURE....
.....
PIC- Karan DC writting a letter on the roof of his home..

नैसर्गिक बंधन तो हालाकि पलभर हैं,
                                    टूट जाएंगे आज नहीं तो कल को।।
समाज के बंधनों में जो बंधी हो तुम,
                                  तुमसे काफी है मुलाकात एक पल को।।

प्रकृति का यह रौद्र रूप भी एक दिन समाप्त हो ही जाएगा बस तुम अपना ख्याल रखा।।

                                                                                                With love
                                                                                             Yours
                                                                                             Music
                                                                                             27.3.2020... शुक्रवार

नोट- पत्र में लिखी गई सारी बातें काल्पनिक हैं इनका जीवित या मृत किसी व्यक्ति से कोई संबंध नहीं है।

@ जांगिड़ करन

Saturday, 22 February 2020

सफ़र


जब भी होता हूँ सफ़र में,
दिल में कोई सफर चलता है।

सफ़र उस राह तक का
सफ़र उस रात तक का
जिस रोज तुमने पहनी थी चूड़ी
सफ़र खनकती बाँह तक का,
कोई ख्वाब जबकि अब भी पलता है।
जब भी ........................

सफ़र उस छाँव का
मिट्टी से महकते गाँव का
न तुमको खबर थी न मालुम हमको
कदम पीछे हटा किस पाँव का,
क्यूँ ये वक़्त भी बेवक़्त छलता है।
जब भी ..........................

हमने शहर कहाँ देखा है
तेरे मेरे बीच यहीं तो रेखा है
तुम्हारा इरादा तो अच्छा ही होगा
किस्मत का भी यही लेखा है,
दिल है कि अब भी जलता है।
जब भी ............................

तुम रहो जिन्दगी के सफ़र में 
मोड़ पर बैठ गया मगर मैं 
बालों में सफेदी आने तो दो
तुम भी रहोगी तन्हा शहर में,
देखना करन सूरज कहाँ ढलता है।
जब भी................................
@ जांगिड़ करन(बलराम)
22.02.2020....... 20:30 PM

Monday, 6 May 2019

परछाई 2

न कोई पर्दा
न कोई खिड़की ही थी,
चांद आज
बिल्कुल सामने था.....
बस नजरें झुकी थी
चेहरा खामोश था,
आंखों में उलझन थी,
पैरों में रूकावट थी,
हाथ किसी को बुलाते से लगे,
बालों का रंग जरा पक गया लगता है,
हां,
मगर एक बात
अब भी
वैसी ही थी,
बालों में लगी वो
गुलाबी पिन
आज भी गुलाबी ही थी,
हां,
साड़ी का रंग
देखने की फुर्सत मुझे कहा,
मैं तो बस
एकटक
गुलाबी पिन से
अलग होकर उड़ते
कुछ बाल
देख रहा था,
बालों में पड़ते वो
बल,
जो वक्त की
वक्राकार
नियति को दिखाए
मुझे चिड़ा रहे थे आज भी,
और मैं दूर खड़ा
हाथों से हवा में हर बार
जैसे
तुम्हारे उन बालों को उपर करने
की
कोशिश में लगा रहा,
जैसे वक्त को
बदलने की
कोशिश कर रहा था
मैं।
Karan
06_05_2019

Saturday, 13 April 2019

परछाई 1


सुदूर किसी कौने में
झांक रही थी आंखें,
कुछ तलाश कर रही थी शायद,
तब
मन के किसी कोने में
ख्याल आये,
नीम का पेड़ वहीं,
पीपल भी वहीं,
बस बदली है
तो
मिट्टी की सड़क,
मिट्टी को
उस पक्की सड़क ने
ऐसे दबा दिया है जैसे
मेरे
अरमानों पर
वक्त की
चादर आ पड़ी थी,
खैर मैं हूं
जो
अब भी महसूस कर सकता हूं
सड़क के नीचे
दबी मिट्टी की महक को,
तेरे कदमों के
बनें निशां को,
तेरी जुल्फों के छिटकने से
मिट्टी पर बनें चित्रों को भी,
वो दूर
हैंडपंप की ठक ठक
मेरे कानों अभी भी
गूंज रही है.....
तुम न समझोगे
अरमानों की मिट्टी को,
तुम्हें तो
वक्त की पक्की
सड़कों ने
बदल के
रख दिया होगा ना....

©® Karan DC
13_04_2019___19:00PM

Saturday, 15 December 2018

Alone boy 30

अक्सर
शिकायत रहती है
मेरे सारे दोस्तों को,
चाय से तुम्हारा
इतना
गहरा रिश्ता
कैसे?
हर पल तुम्हें
चाय की
याद सी क्यों रहती है.....
मगर मैं जवाब में
मुस्कुरा देता हूं बस,
कोई
फर्क सिर्फ पड़ता कि कोई
क्यों कर सवाल करता है?
मगर,
जब भी अकेले में सोचता हूं तो
चाय के साथ जुड़े
किस्से याद आते हैं,
साथ ही याद आती है,
तुम्हारे हाथों से
बनी वो आखिरी चाय भी
जिसको पी लेना मेरे बस में न था,
मैं आज भी
हर चाय के साथ वो
पल याद करता हूं,
याद करता हूं
उस अंतिम चाय से
उठते धुएं के उस पार
दिखती
मजबूर तस्वीर को,
याद करता हूं
उन लफ्जों को जो
तुमने खुद न बनाये पर
कहना तो
तुम्हें ही था........
अक्सर एक कप चाय से
तुम्हें
महसूस कर लेता हूं,
कभी खिड़की से,
कभी नीम पर,
कभी जंगल के उन पत्थरों पर.......
अंकित है जहां
तुम्हारे और मेरे
जिंदा होने के सबूत,
वक्त की गर्द ढक देगी हालांकि
इनको
मगर
चाय के कप उठते धूएं में
हर पल
कोई तस्वीर
मजबूरी की
मैं बनाता हूं
मिटाता हूं,
बनाता हूं
मिटाता हूं.......

©® जांगिड़ करन
15_12_2018

Note - 51 से बाद के लैटर के लिए एक पुस्तक छापने के की तैयारी में हुं पर अभी थोड़ा व्यस्त हुं, 2019 के अंत तक या 2020 में पुस्तक जरूर आ जायेगी 😜

Monday, 15 October 2018

Alone boy 29

रुक्सत जो कर गई,
हवाएं
इधर शहर में
घुटन सी होती है।
चुपचाप खड़ी ये
अट्टालिकाएं,
सूरज की
रोशनी को
तरसती है।
शौरगुल से
परेशान पिल्ला
दुबका है,
मोहल्ले की
सबसे
गंदी नाली में।
दीवारों को ताकता
कोई,
डायरी में लिखे
दो लफ्जों से
तस्वीर
बनाने की जुगत में है,
मगर
हर बार
तस्वीर धूंधली ही
नज़र आती उसको,
कई दफा फिर
कोशिश करता है,
और
अंत में
समझ आता है उसको,
कल्पनाओं की
तस्वीरें
सुंदर तो होती है,
मगर साफ
नहीं हो सकती।
जिंदगी की जो
भूल करी
वो भूल
माफ नहीं हो सकती....
किंचित
वो समझ गया सारा ही रहस्य,
तस्वीर को
साफ करने,
वो निकल पड़ा है,
लफ़्ज़ों के
समंदर को
छिपी तस्वीर लाने,
वो निकल पड़ा है
जिंदगी की भूल
का
परिणाम बनाने,
शायद ये
लफ्ज़
अब
उसकी दुनिया है......
...........
A letter to swar by music 51 to 75..
Coming soon...

#करन

Friday, 5 October 2018

Alone boy 28

जैसे आसामां की
गोद में सोया
कोई ख्वाब,
पलकों के उस पार
कहीं कोई फुदकती है अब
आशाओं की डोर नहीं है
जो
बाँध लें उसको,
बस बंद आंखों में
कहीं दूर
आसमां के साये में
पंख फड़फड़ाते हुए से
नजर आते हैं।
इधर बादलों ने
घेरा है,
आंखों में समाकर कुछ
धुंधला सा
कर रहें तस्वीरों को,
मगर जब कभी
आंखें बरसकर साफ हो,
सब कुछ दिख
जाता है,
वहीं जो कई रोज पहले
किसी सपने में देखा करता था...
आसमां में बसते वो
दो तारे,
अक्सर एक दूसरे के
करीब आने
की
कोशिश में रहते, और
रात का घना अंधेरा
इस बात का गवाह होता....
मगर वक्त के
साथ
जानें क्यों
तारों की दूरियां बढ़ने लगी,
लगता कि कोई
एक तारे को
खींच रहा पीछे से....
मगर एक तारा अब भी
वहीं मौजूद, न किसी तारे से राग, न द्वेष,
बस निर्विघ्न
जिंदगी,
न किसी से कुछ कहता है, न सुनता है,
शायद अंधेरे से कुछ बात करता हो
अब भी।

©® करन जांगिड़
04.10.2018 .... 23:00PM

Sunday, 19 August 2018

A letter to swar by music 50

Dear swar, "किसी को पाने के लिए खुद का खो जाना, मानो न मानो मोहब्बत यहीं चीज है.........!!!! .. I respect you and your feelings. Actually the time was enable to blossoms the flowers of love between us. Perhaps we both were wrong............... First you got your way of life and now I am finding my own way without any destination............ So I think I should tell you something.... ........ काल के किसी खंड में (मैं समय और तारीख भी मालूम है पर लिखना ज़रूरी नहीं, तुम्हें खुद याद आ जानी है) तुमने सिर्फ अपनी इच्छाएं जाहिर की थी, वो इच्छाएं जो हर लड़की के ज़हन में अपनी जिंदगी को लेकर पनपती है, वे इच्छाएं जो हर समय कुछ ढूंढते रहने या कुछ पाने को मजबूर करती है..... मैं नादान था उस समय, समझ नहीं पाया था कि इशारे कभी सच जाहिर नहीं किया करते..... तुम्हें याद तो होगा तुम्हारे इरादों और प्रश्नों से बचने के लिए मैंने असफल सा प्रयास भी किया था..... मगर मैं भी इंसान हुं मेरी भी अपनी कमजोरियां होनी थी, कुछ सीमाएं होनी थी.......... बस वहीं से वक्त ने मेरी जिंदगी के पन्नों पर रंगीन स्याही दिखाकर काली सफेद रेखाएं खींचना शुरू कर दी और जैसा कि हर इंसान मन से कमजोर होता है, जो समझ नहीं पाता कि वास्तव में जो हो रहा है वो आगे क्या रंग दिखायेगा!! उधर वक्त अपनी ही रेखाएं बना रहा था और मैं इधर कल्पनाओं में जिंदगी को हसीन रंगों में सजाने की जुगत में था... कभी तुम्हारे चेहरे में चाँद ढूंढता तो कभी जंगल में खिलें किसी फूल का अहसास करता.... कभी चेहरा दूर क्षितिज सा लगता जिसका कोई अंत ही न हो..... तुम्हारी आँखें मुझे झील सी नजर आती कि हर वक्त इनमें डूबा ही रहुं..... कभी तुम्हारी आँखों में खुद को देखकर सँवरने की सोचता..... मेरे मन की इच्छाएं तुम्हारे काले घने बालों में बादल ढूंढ लेती थी, कभी चेहरे पर गिरी जुल्फों के पीछे छिपे चाँद का दीदार आँखें चाहती थी..... पर एक बात याद दिला दूं.... तुम्हें याद है न हम आज तक कभी अकेले में मिलें भी नहीं......(यहीं सच है जिसे कोई भी मित्र या पाठक स्वीकार नहीं करेगा)... हां... मैंने कई बार तुमसे जाहिर किया था कि तुम्हारे कान पकड़कर उमेठने का मन करता है...... तुम्हारे नाक संग चिकीविकी खेलने का मन करता है.... तुम्हारी जुल्फें खींचकर चिड़ाने का मन करता है......, पर कभी नहीं कर पाया... मतलब कि वक्त मौका ही नहीं दिया!! चलो छोड़ो...... ये वक्त की बातें हैं, दोष तुम्हारा या मेरा नहीं था! हां, तो मैं कहां था..... कल्पनायें... इन कल्पनाओं की अपनी वजह थी..... जब तुम्हें देखता आंगन में नृत्य करते हुए तो मन के कौनें में हिरणी बन फुदकती कुदती सी नजर आती थी... जब जब तुमने मेरे किसी गीत को गुनगुनाया मुझे यूं लगा कि , "जिंदगी-स्वर से बढ़कर कुछ भी नहीं है!".... तुम्हारी आवाज़ में खोया मैं फोन कट जाने पर भी फोन कानों से दूर हटाना भूल जाता था... मैं यकीन के साथ कह सकता हूं कि तुम आज भी उतना ही मधुर गाती हो जैसे पेड़ पर बैठी कोई कोयल राग सुना रही हो.... और तुम्हारी यह आवाज ऐसी ही बनी रहेगी... इन बातों से इतर....... तुमने और मैंने जिंदगी के सपने बुने थे, वे सपने जो हकीकत की जिंदगी से ताल्लुक रखते थे.... वे सपने मुझे तुम्हारा होने और तुम्हें मेरा होने पर गर्व का अहसास दिलाते थे..... हर सपने की नींव हम दोनों ने साथ रखी थी.... तुम्हारे हर सपने को मैंने अपना समझा था.... तुम्हारे सपनों की खातिर मैंने अपने सपनों को ही तोड़ा था..... मैंने वो सपना भी तोड़ दिया जिसके लिए तो मैं मरा जा रहा था... (DC).... बचपन में जब रेडियो पर RJ को सुनता या टीवी पर एंकर को देखता तो मन में ख्याल आया कि बनना तो कुछ ऐसा ही है.......... पर जब थोड़ा बड़ा हुआ और आगे पढ़ाई को जीवन से जोड़ कर देखा गया तो सबने यहीं सलाह दी थी कि Mass communication का कोर्स महंगा है और जॉब की सिक्योरिटी भी नहीं है... मैं भी अपनी पारिवारिक स्थिति से वाकिफ था.... पढ़ना मेरे बस में था, पर बाहर किसी शहर में रहकर खर्च वहन करना और परिवार को संकट में डालने की हिम्मत नहीं हुई थी..... फिर 2004 में जब कला वर्ग में पढ़ाई शुरू की तो सपना ही बदल गया.... पर दिमाग सपने कौनसे छोटे देखता है.... अब भी सपना तो बड़ा ही था... हां, अब यह था कि मेहनत खुद को करनी थी..... सपना था DC.. .. फिर वक्त ने मोड़ बदला.... सीनियर के बाद सबसे ज्यादा चाहने वालों ने भी जब BSTC की सलाह दी तो मुझे माननी पड़ी... मन में DC तो था ही........ BSTC की... 2012 में मास्टर जी बन गये.... नौकरी की खुशी में समय निकल पड़ा... पर सपना भूला नहीं था... तैयारी शुरू हो गई थी... इस बीच तुमसे मुलाकात...... तुम्हें भी सबसे ज्यादा इस DC पर बहुत आश्चर्य हुआ था न कि यह क्या है? जो केवल दो लोग जानते थे तुम्हें भी बताना ही पड़ा..... तुमने यह तक कहां था आपका सपना जरूर पूरा होगा............... और फिर तुम, मैं और सपना साथ...... पहली बार 2015 में पहली बार इसके लिए परीक्षा दी थी (केवल समझने के लिए की मुझे किस तरह तैयारी करनी पड़ेगी, मेहनत थी पर इतनी ज्यादा नहीं कि कोई उम्मीद इस परीक्षा से नहीं की थी, हां... पर परीक्षा देकर इतना तो समझ आ गया, यस!! आई केन डू इट)....... मैं लग गया था तैयारी में.... मगर वक्त शायद कुछ और चाहता था.... तुम्हें मजबूर किया वक्त ने और तुमने फिर.... वो शुरू किया जो मुझे एक शायर की तरह बनना पड़ा... उससे पहले मैंने कभी तुम्हारे लिए भी खुद ने नहीं लिखा था.... पर जब शुरू हुआ तो जैसा तुम जब बिहेव करती कलम वैसा ही पोजिटिव या निगेटिव.... कागज़ को रंग देती।। इससे पहले के 49 letters किसी न किसी घटना से जुड़े हैं जो तुमसे जुड़ी हो...... मैं बस सपने छोड़..... इधर खोया रहने लगा.... तुम नाराज़ तो मैं उदास, तुम खुश तो मैं खुश.... मगर कई दिनों पहले... वक्त ने एक झटके में तंद्रा तोड़ दी
ख्वाबों में खोया मैं हकीकत से रूबरू होकर काँप गया..... पीछे देखता हूं तो वो हसीन पल याद आते हैं और अब सब उजड़ा उजड़ा सा लगता है.... यहां से पांवों में अब और चलने की हिम्मत नहीं रहीं, ऐसा महसूस होता है जैसे जमीं ने मुझे रोक दिया है अपनी शक्ति से...……. आंखें आकाश को अब भी देखती है पर किसी उम्मीद में नहीं, बस शून्य में ताकती है कि इसमें ही कहीं समा जाऊं.............. पर इन सबसे इतर मेरे पास जीने की कुछ और वजह है, वो सबकुछ जिसने मुझे यहां तक पहूंचाया है, जो हर समय मेरे साथ रहें हैं....... मैं कैसे भी रहुं पर अब हारूंगा तो नहीं!! हां, अब से कोई मकसद नहीं, कोई सपना नहीं, सिर्फ रास्ता..... आखिर सांस तक चलने का इरादा है बस!!!
...................
जरा सी आहट हो तो
ज़िन्दगी कुछ ख्वाब बन लेती है,
पैरों में जहाँ रखने की
जहमत उठाया करते है सब,
ज़िन्दगी हर बार कोई
परिंदा बीमार रख लेती है.
समय कितना गहरा है,
आदमी का क्या है ,
रेत पर बने निशान भी 
आँखे संभाल लेती है.
अब तलक ढूंढ़ता रहा किनारे,
समंदर की लहरे अब 
मुझको संभाल लेती है.......
..... और अब मुख्य बात, तुम परेशान नहीं होना.... दोष तुम्हारा बिल्कुल नहीं है, हालांकि मेरे साथ बहुत गलत हुआ है इतना ज्यादा कि इस गलती को सुधारने के लिए अब वक्त नहीं है.... खैर रहने दो यह सब.... भगवान से दुआ करता हूं कि खुश रहो तुम और खुश रहने के लिए मुझसे दूर रहना जरूरी है इसलिए.... एक चेतावनी है दुनिया गोल है कभी न कभी आमना-सामना हो सकता है मगर मुझसे बोलने की हिम्मत भी मत करना अब वरना left hand सीधे तुम्हारे गाल पर पड़ेगा.... Good bye
Its only of mine Music ©® JANGIR KARAN DC 05_08_2018__08:00AM

Tuesday, 17 July 2018

Alone boy 27

अक्सर आंखें
ढूंढ ही लेती
उदास होने की वजह...
मौसम जरूर
Jangir Karan
बरसात का है,
खिलने का है, मिलने का है
मगर,
उस टूटे हुए पत्ते को पूछो,
क्या मौसम उसको भाता है,...
उसकी नियति सड़ना है,
गलना है, कटना है......
खिलना तो वो भूल गया,
सावन से वो रूठ गया।
मगर हर मौसम भी
उसको ऐसे ही चुभता है,
पानी से गलना,
सूरज से जलना,
हवा से भटकना..
कुछ और नहीं वो कर सकता है,
बस मन ही मन सिसकता है।
करुणाई तो देखी उसने,
हवा उसे सहलाती है,
मिट्टी प्यार जताती है,
नदी उसे झुलाती है।
मगर क्या यह करुणाई,
फिर उसे जोड़ पायेगी,
पीले पड़ते चेहरे पे,
रंग हरा ला पायेगी.......
खूब समझता पत्ता भी,
ढांढस का सब खेल यह,
अपने अश्रु छिपा रहा,
जग से हाथ मिला रहा.....
मुस्कुराते जब उसको देखा,
मेरा मन भी मुस्काया!!!
अक्सर आंखें कह देती है,
क्या तुमने खोया, क्या पाया!!!!!!
©® JANGIR KARAN
17_07_2018____10:00AM

Thursday, 10 May 2018

A letter to swar by music 49

Dear swar,
गणित तुम्हारी आदत है, मगर मुझे तो यूं लगता है कि तुम्हें गिनती भी नहीं आती होगी, हैरान होने की बात नहीं है!! तुम्हें कैलेंडर में तारीख देखना भी नहीं आता शायद?
पूरा एक साल निकल गया है, एक साल मतलब कि पुरे 365 दिन यानि कि 5,25,600 मिनिट्स... नहीं है है ना याद?
हां,
तुम गणित को सिर्फ आंकड़ों का खेल मानती हो, मगर मैं तुम्हारी इस गणित को जिंदगी से जोड़कर देखता हूं! उस वक्त से जब तुमने पहली बार आवाज दी थी, हां वो पल, दिन, वार, समय... उस पल की हर एक बात, कितने अक्षर थे वो भी याद है!
लेकिन तुम्हें तो इतना भी याद नहीं कि एक साल में तुमने मेरी किसी बात का जवाब नहीं दिया....
अब तुम्ही बताओ गणित कैसा है तुम्हारा?
.......
और इधर आजकल...
......
हर तरफ से वक्त ने छीना है सुकून जिंदगी का,
मैं वक्त तुम्हें ढूंढ चैन पाने निकला हूं।
....
आवाज़ नहीं दी होगी तुमने,
शायद मेरा सुनना भी वहम था।
.....
कल फिर तुम्हें सोचना है,
कल फिर तुम्हें चाहना है।
आज की खातिर भला
क्यों तुम्हें भुलाने की कोशिश करूं?
……….....................................
अब सुनो प्रिये,
यह जिंदगी मेरी रेल की पटरी सी हो चली है! हां, तुमने गणित में देखे है रेल और पटरी के सवाल...
रेलगाड़ी की लंबाई, पटरी की लंबाई, चाल, समय, सापेक्ष चाल आदि आदि!! हां मेरी जिंदगी के गणित में भी रेल की पटरी से सवाल उलझे हैं.... पटरी से कितनी रेलगाड़ियां गुजरती है, कौनसी कितनी लंबी थी, क्या गति थी, आमने-सामने से कब कौनसी रेल गुजरी? जिंदगी की पटरी इन सवालों से ज्यादा अलग तरह के अहसासों के उलझन में है!
हां....
हर गुजरती रेलगाड़ी के निकल जानें की दुआ करती है वो, क्योंकि रेलगाड़ी की गड़गड़ाहट भी उसे तन्हा सफर देती है जिसमें उसे कुछ और नहीं सुनाई देता...
क्योंकि पटरी को एक बात तो पता है रेलगाड़ी का तो गुजरना तय है वहां हमेशा के लिए रुकने से तो रही....
और पटरी को अपनी नियति भी पता है, मगर वो समझती कहां?
हर गुजरती रेलगाड़ी के साथ एक और ख्याल आता होगा पटरी के मन में कोई रेलगाड़ी ऐसी भी हो जो हर क्षण के लिए यहीं रुक जाये...
हां, वो रेलगाड़ी आती जरूर है मगर रुकती कहां!
पल भर में फिर रवाना हो जाती है, जब उसमें जान है चलना है..... जिस दिन थक जायेगी तब जाके कहीं रुकेगी, जब उसको जंग लग जायेगी तब वो रुकेगी शायद...
पर अब उसमें भी एक डर है, तब तक वो पटरी खुद पुरानी और कबाड़ न हो जाये कि निकालकर कबाड़ख़ाने में डाल दी जाये कहीं.... और बस फिर तो!!!
रेलगाड़ी से मिलन का ख्वाब भी ख्वाब नहीं, एक बीता हुआ कल रह जायेगा...
यहीं जिंदगी है..
जिसके सवाल ऐसे हैं जिनके जवाब तुम्हारी गणित के पास नहीं है, जवाब तुम्हारे ज़हन में है...
पर तुम अपने ज़हन की सुनती कहां हो,
तुम्हें तो गणित के सुत्रों पर चलना है ना!!!

..........
खैर इस एक साल में दो बातें तो महसूस करी है....
पहली, बदलना बहुत आसान है मगर, बदलने वालों को बदलना मुश्किल है जरा।
दुसरी, प्रेम इंसान को जीने के अलग अलग तरीके सीखा देता है।
!!!!!!
और हां,
एक खुशखबरी सुनाये!!!
हम जिंदा है
शरीर से नहीं मन से भी!
कभी कागज पर
कभी दिलों में
हां,
जिंदा है हम
पंछियों की उड़ान में
स्कूल जाते बच्चों की मुस्कान में
जिंदा है हम....
!!!!!!!
With love
Always yours
Music
©® Karan KK
10_05_2018___15:00PM
  • Photo from Google with due thanks

घरौंदा

मन के बनायें घरौंदे,
न तेरे प्रेम की मिट्टी चाहिए,
ना ही तेरी रहमतों का पानी.....
कोई फर्क नहीं पड़ता
इसपर
तेरी नफ़रत की आंधियां का भी.....
मैं खुद ही
दीवार बना और
बिगाड़ लेता हूं,
कहां क्या रखना है सब
तुम्हारी इच्छा पर
बनाता हूं........
और जब तेरी याद
याद आती है,
कल्पनाओं का
झरोखा खोल
किचन में देख लेता हूं तुमको,
एक बारगी पुकार लूं तुम्हें
एक कप चाय,
पर नहीं,
मैं तो बस तुम्हें
बिन बताए तुम्हें देखना चाहता हूं.....
अक्सर तेरी याद में
खोया
किवाड़ की सिटकनी भूल जाता हूं मैं...
पर यह अच्छा है,
तुम्हें आने में कोई तकलीफ़ न होगी...
मन के घरौंदे है
और भागदौड़ जिंदगी की
हकीकत है,
अचानक तंद्रा टूटती है,
साथ ही टूट जाता है घरौंदा
और एक कमरे की चार दीवारों में कैद
मैं
फिर एक घरौंदा बनाता हूं!

©® KARAN KK

10_05_2018___5:20AM

Sunday, 6 May 2018

A letter to swar by music 48

Dear swar,
.............
मुकम्मल जिंदगी मुकम्मल ख्वाब ये तो हुई लोगों की बात...
उखड़ा हुआ चाँद और एक आवारा करन...
यह हूं मैं
....
महकना है दिन को मेरे आजकल,
अरसे बाद चाँद को देखा है मैंने।।
😘😘
......
आंखों से कोई नूर बरसता है,
चाँद ने पूनम की रात दिखाई है...
😘😍😘😍😘
.......
बहका था मैं आज कुछ पल को,
जमाने की मगर बंदिश थी यारा।
😘😍😘
........
यह वो सबकुछ है जो पलभर की मुलाकात के बाद दिलो-दिमाग में आया था...
!!!!!!!!
बाकी......
गुस्सा लाजवाब था...... गुस्से में भी तुम इतनी खूबसूरत लगती हो कि पूछो ही मत.. मेरी!! मेरी तो भी वहीं हालत है तुम हो जो सामने तो दिल दिमाग शरीर सबकुछ हेंग हेंग सा हो जाता है.... तुमसे मिलने से पहले बहुत सोचा कि यह कहूंगा वो कहूंगा पर मिलने पर कुछ भी न कह सका, बस देखता ही रहा!!
क्या देखता हूं मैं....
और ख्याल आयें भी तो...
तुम्हारी गणित के, जैसे तुमने जोड़ लिया है खुद में एक खूबसूरत चाँद खुद में, घटा दिया है पहले जैसा मुस्कुराना, गुणा किया है अपनी गंभीरता को, भाग दे दिया है जिंदगी में जानें किसका.........
मैं सिर्फ सोचता रहा कि किस बिंदु पर खड़ी हो तुम, आसपास कितने बिंदु और थे जिनकी तरफ किरण बनकर या रेखा बनकर तुम बढ़ सकती हो.....
उन दुसरे बिंदुओं में तुम्हारे लिए मैं शायद नहीं हुं और मानकि हुं भी दूर अनंत में कुछ धूंधला सा....
तुम्हारा रेखाखंड हो जाना तो निश्चित है अब किस बिंदु तक पहुंच के रुक जाना है यह सिर्फ वक्त जानता है पर जानती हो रेखाखंड हो जाना इतना आसान नहीं है, और तुम्हारे लिए तो शायद बहुत मुश्किल है क्योंकि तुम्हें शुरू से किरण हो जानें का शौक रहा है कोई और समझें न समझें मैं समझता हूं और जिस दिन ये पंक्तियां तुम पढ़ोगी मेरा दावा है समझ गई तो रोओगी भी और तुम्हें इस बात का गर्व होगा कि तुम ऐसे इंसान के करीब भी रही थी जो तुम्हारे मन की बात को चंद गणित में कह सका और वो भी सटीक सटीक.... पर तुम्हारा रोना, बहुत देर हो चुकी होगी शायद, तब न तुम कोई बिंदु बदल पाओगी और मानाकि बदलना चाहोगी तो भी मैं तब धूंधला बिंदु इतना धूंधला हो जाऊंगा कि नजर भी आऊं या नहीं भी...
अभी तो तुम समझकर नासमझ ही बनोगी क्योंकि तुम्हारे आसपास कई बिंदुओं का संगम है.....
किरण हो जाने का वक्त नहीं है अब और रेखाखंड होकर रुक जाना है,
दुआ है खुश रहो.....
!!!!!!
जब तुमको देखा था ना पूरे 5 महीने बाद तो दिल दिमाग कुछ कहने पर मजबूर हो गया, बाकी मैं तो अब तक भी तुम्हारे ख्याल मात्र से खुश रह लेता हूं और आगे भी रहूंगा!!
!!!!!!
आगे से कोशिश करूंगा कि कोई और मुलाकात न हो, क्योंकि अब यह बहुत परेशानियां पैदा करती है दिल में,
मैं बस युहीं खुश रहना चाहता हूं....
तुम्हें सोचकर,
गणित के किसी प्रमेय की तरह सिद्ध कर लेता हूं कि तुम यहीं कहीं हो...
!!!
बातें बहुत है!
बस तुम सुन सुन कर परेशान हो जाओगी?
।।।
इसलिए इतना ही!!!
बाय।

With love
Yours
Music

Written by KARAN KK
05__05_2018___23:00PM

फोटो- अंधेरे में चाँद

Sunday, 29 April 2018

A Letter to swar by music 47

Dear Swar,

अक्सर कानो में और मोबाइल की स्क्रीन पर एक सवाल आता है ... कौन है वो ?
जवाब में खामोश हो जाता हु में...
या उस जगह से हट जाता हु कि जवाब नहीं देना पड़ेगा.....
!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!
मगर जब खुद मेरे जहन में एक सवाल पैदा होता है तब कि तुम हो कोन?
कहा हो तुम ?
तुम क्यू हो ?
और जब ये सवाल मुझे ज्यादा ही परेशां करते है तो जवाब में तुम याद आती हो....
मुझे पता है तुम्हारे पास ही है इन सारे सवालों के जवाब....
अब में तुम्हे तो सीधे नहीं कह सकता ना कि तुम बता दो कि कोन हो ?
क्यूंकि तुम्हे बताना होता तो मेरे लिए इतने सवाल ही खड़े नहीं होते.....
खैर ये छोडो......
लोगों के सवाल है और मुझे तो जवाब देना है मेरे जवाब कुछ यु बनते है देखो तो .....
सुनो,
नदी की धार के संग बहती पानी की चमक हो.. में अक्सर तुम्हे ढूंढता हु नदी के किनारे खड़े होकर..... दूर जहाँ तक मेरी नजर जा सके वह तक.... तुम हर उठती लहर के साथ आती हो और जैसे ही पानी की धार कुछ धीमी हुई जाने कहा खो जाती हो .... तुम्हारे दिखना या नहीं दिखना मायने नहीं रखता है मेरे लिए ... बस मुझे मालूम है तुम्हारा वजूद छुपा है पानी में.... समय पर चमकाना और फिर गायब होना यह तो तुम्हारी अदायें है....
!!!!!!!!!!
या में यु कह दू तुम दूर आकाश में चमकता कोई सितारा हो..... और में धरती पर हर रात तुम्हे निहारता हुआ एक आवारा हु..... जो चाहता है कि वो तारा उसके पास आये पर यह भी नहीं चाहता कि टूटकर आये.... हा जब रातें बादलों भरी होती है और सब तारे छुप जाते है तब मन में एक अजीब सी बैचेनी रहती है कि कही तुम...........
!!!!!!!!!
और में तुम्हे अगर कोई खिलता फूल कहू तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी... हा... तुम्हे उसी बगीचे में खिलता हुआ गुलाब हो जहाँ मेरा आना शायद कभी कभार होता है या शयद सालभर तक भी न आ पाऊ वहा... मगर जब भी आता हु तुम्हे खिला हुआ ही देखना चाहता हु.... तुम्हे हर पल ही पास तो चाहता हु मगर तुम्हे तोडना भी गलत है न मुरझा न जाओगे तुम?
और में हर पल भी तो बगीचे में रुक नहीं सकता न......
बस जहन में तुम्हारी सुगंध लिए अगली मुलाकात का इंतज़ार करता हु....
!!!!!!!!!!!!!!
और अक्सर में तुमको खिड़की के पार से आती ठंडी हवा में बसी खुसबू जान लेता हु..... इस गर्मी के मौसम में भरी दोपहर में जब खिड़की के पास बैठता हु ठंडी हवा ऐसे छूती है जैसे कि तुम्ही ने सर के बाल सहलाए हो अभी अभी ........... अक्सर मेरी दोपहर की चाय ठंडी हो जाती हो जाती है... इन्ही ख्यालों में पर जानती हो तुम चाय में भी तुम्हारे अहसास की खुश्बू भर जाती है और फिर में खुद को कितना तरोताजा महसूस करता हु जिसका तुम्हे अंदाज़ा भी नहीं होगा........
!!!!!!!!!!!!!
अब अगर तुम्हारी इज़ाज़त हो तो तुम्हे चिड़िया कह दू?
हा...
सबसे प्यारा नाम...
सबसे दिलकश भी....
और इतना सरल भी की हर सुबह से लेकर शाम तक बस जुबान पर ही रहता है.....
हर सुबह जब तक मेरी आँख खुलती है पास के पीपल के पेड़ से तुम्हारी आवाज़ सुने देती है मुझको... में आँखे खोलते ही उधर ही देखता हु मगर तब तक तुम उड़कर दूर आकाश में परवाज़ भर रही होती हो.... में तो खुश होता हु तुम्हे ऐसे उड़ते हुए देखकर ही.... मुझे मालूम होता है की जब तुम थक जाओगी फिर से उसी पेड़ पर आकर बैठोगी और फिर से गीत सुनाओगी.... में भी पागल ही हु बस तुम्हारे गीत की धुन में खोया सो जाता हु और फिर से उड़कर कही चली जाती हो....
मगर मुझे यह भी मंजूर है....
बस ये गीत युही सुनाते रहो.....
!!!!!!!!!!!!!!
अब अंत में......
जबकि हकीकत के धरातल पर शायद में अकेला हु जो ख्वाबों की पौध के भरोसे ही चलता रहा हु और कब तक चलूँगा पता नही......
में तुम्हे अपनी जिंदगी कहूँगा....
हर सुबह से लेकर शाम तक की मेरी सारी हकिकत के पीछे छिपी तुम्हारी मासूमियत.....
हर लम्हे में याद आती तुम्हारी सूरत.....
महफ़िल में तनहा दिखाती तुम्हारी नाराज़गी.....
और तन्हाई को महफ़िल बनाती तुम्हारी यादें.....
बस हर रोज में जीता हु.....
हर हकीकत से रूबरू होकर भी उसे अजरंदाज करते हुए....
हा....
मेरी जान.....
तुम जिंदगी हो जिसके हर पहलु में बसने का सपना लिए ही तो हर लम्हा गुजरता है मेरा......
>>>>>>>>>
लिखने को काफी है अभी...
मगर मे जानता हु तुम्हारे पास वक़्त की कमी है....
इसलिए फिलहाल इतना ही....
....
हमेशा की तरह खुश रहना...
मेरा क्या है वही...
....
में और मेरी कलम अक्सर तेरे लिए ही सोचते है...
....
with love
yours
music

.........
wriiten by
jangir Karan KK
29/04/2018......21:30PM

Wednesday, 18 April 2018

A letter to swar by music 46

Dear swar,
इधर कई दिनों से एक घटनाक्रम की नींव तैयार हो रही थी, मुझे मालूम था कि यह होना है और होना जरूरी भी था क्योंकि वक्त के साथ कुछ बदल जाता है.....
वो कहते हैं ना....
जिंदगी किसी एक के भरोसे नहीं रूकती,
मुसाफिर कोई और साथी भी हो सकता है।
.........
अक्सर मैं रात को छत पर बैठकर तारों को देखा करता हूं, ठीक उसी तरह जैसे कि तुमने कहां था....
तुमने बताया था ना कि उस चमकते तारे के ठीक सामने वाले तारे से कुछ दूरी पर एक और तारा है जिस पर उस चमकते तारे का ध्यान नहीं जा रहा....
मैं अपनी बात करूं तो इस ध्यान का कोई औचित्य नहीं है क्योंकि ऐसे तो असंख्य तारे है उस चमकते तारे के चारों ओर.......
मगर उस तारे की नजर हमेशा से सिर्फ ठीक सामने वाले तारे पर ही रही है और जब तक ब्रह्मंड है तब तक उस तारे की सोच तो यहीं रहनी है!!
मैं दुसरे तारों की बात ही क्यों करूं?
उन्हें लंबवत के साथ साथ क्षितीज पर चलना आता है वो चल दिए.... यह उनकी विशेषता है और हैं तो अच्छी बात है।
मैं क्या कहना चाहता हूं भली भांति जानते है आप....
क्योंकि वो तारा उसकी परिस्थिति और मन के विचारों से अवगत है, चमकना उसकी नियति नहीं है वो तो बस सूर्य के प्रकाश से चमकता है....
दिन के उजाले में ये सब तारे कहीं खो जाते हैं, यह हमारे लिए गायब हुए हो पर इनका वजूद तो होता ही है ना...
जैसे कि मैं...
बहुत बार लोगों की नजर में कुछ ज्यादा ही आता हूं, लोग तरह तरह के सवाल करते हैं...
पर कभी कभी मैं नज़र नहीं आता उनको, वक्त का कौनसा चश्मा लगा कर देखते हैं वो,
पता नहीं!!
!!!!
हां,
मैं कुछ कह रहा था कि कुछ घटने वाला है यहां, कुछ ऐसा जो...... मेरी जिंदगी में कोई तुफान ला सकता है शायद...
या वो खामोशी आ सकती है जो मरने तक को मजबूर कर दें........
पर मैं,
मैं जानता हूं कि सब कुछ होना है मैं परवाह नहीं करता, बस मुझे तो उस चमकते तारे सा रहना है जिसकी नज़र सामने वाले तारे पर है!!
देखना एक दिन वो सामने वाला तारा कुछ तो जरूर करेगा..........
।।।।।
खैर यह सब मेरी जिंदगी का हिस्सा है, मुझे परवाह नहीं अब किसी भी परिस्थिति की मैं सिर्फ आनंद की पराकाष्ठा हुं, मैं भावनाओं का सैलाब भी हुं....
।।।।
हां, अक्सर लोग एक सवाल करते हैं कि कौन है वो?
तो तुम कहो तो अगले पत्र में तुम्हारा जिक्र करूं?
अनुमति दो तो करेंगे...
।।।।।
बाकी,
हम मस्त है,
आशा है कि आप भी मज़े में होंगे!!

वैसे CCTV की नज़र तेज हो गई है, जरा बचके।
😜

With love

Yours
Music
..
©® जांगिड़ करन KK
18/04/2018__7:30AM

Friday, 6 April 2018

खेल प्रिये

तुम खिड़की स्लाइडर वाली हो,
मैं टूटा फूटा किवाड़ प्रिये..
तुम मार्बल सी प्लेन प्लेन,
मैं आंगन का उबड़-खाबड़ ढाल प्रिये..
🤦‍♀😁🤦‍♀
ओके सॉरी
तुम आर सी सी की स्टाइलिश छत,
मैं टूटा फूटा खपरैल प्रिये।
तुम डाइनिंग टेबल का हुनर हो,
मैं देशी थाली में जमा मैल प्रिये।
#सॉरी
🤦‍♀😍🤦‍♀

तुम रेलिंग कांच की चमक-दमक,
मैं पुरानी ईंट की दीवार प्रिये।
तुम स्टेंडर्ड किचन जैसी हो,
मैं देशी चुल्हा धुआँदार प्रिये।।
🤦‍♀🤔🤦‍♀
अच्छा सॉरी

चलो खत्म करें ये खेल प्रिये,
तुम्हारी छूट जायेगी रेल प्रिये।
मुश्किल है अपना मेल प्रिये,
यह प्यार नहीं कोई खेल प्रिये।
😜🤦‍♀😜
बस खत्म

#जांगिड़ करन KK

प्रकृति और ईश्वर

 प्रकृति की गोद में ईश्वर कहें या ईश्वर की गोद में प्रकृति ......  जी हां, आज मैं आपको एक ऐसे प्राकृतिक स्थल के बारे में बताऊंगा जहां जाकर आ...