Friday, 31 July 2015

सफर

गुजरता हुँ मैं जब भी
सुनसान राहों में
कहीं से आ जाती है
कुहुँ की आवाज,
हाँ रूक जाते है कदम मेरे
मैं निहारता हुँ उस
आवाज की तरफ
युँ लगता है
तुमने पुकारा है कहीं से
पर कहीं दिखती तो नहीं तुम
हाँ पर मुझे तो उसमें भी
सुनाई देती है तुम्हारी ही आवाज
हाँ वहीं तुम्हारी सुरीली आवाज
उस वक्त
खो जाता हुँ
उस आवाज में
दूर कहीं पुरानी बातों में
हाँ इन्हीं राहों पे
साथ चलने की कसम खाई थी
हमनें
एक दूसरे का हाथ थामें
सफर पुरा करने की
फिर में अकेला क्यों
अब इन राहों पर हुँ,
हाँ तुमने तो अपने
बंधन आगे कर दिये है,
गिना दी अपनी मजबुरियाँ
हाँ तुम्हारे बंधन
जानता हुँ मैं
पता है इस आवाज से ही
दिल को बहला लेता हुँ मैं
तुम ना सही
तुम्हारी यादें तो है
सफर में मैं तन्हा तो नहीं
हाँ यह सफर अनंत का
तुम्हारी यादों के साथ
©® karan dc

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