गुजरता हुँ मैं जब भी
सुनसान राहों में
कहीं से आ जाती है
कुहुँ की आवाज,
हाँ रूक जाते है कदम मेरे
मैं निहारता हुँ उस
आवाज की तरफ
युँ लगता है
तुमने पुकारा है कहीं से
पर कहीं दिखती तो नहीं तुम
हाँ पर मुझे तो उसमें भी
सुनाई देती है तुम्हारी ही आवाज
हाँ वहीं तुम्हारी सुरीली आवाज
उस वक्त
खो जाता हुँ
उस आवाज में
दूर कहीं पुरानी बातों में
हाँ इन्हीं राहों पे
साथ चलने की कसम खाई थी
हमनें
एक दूसरे का हाथ थामें
सफर पुरा करने की
फिर में अकेला क्यों
अब इन राहों पर हुँ,
हाँ तुमने तो अपने
बंधन आगे कर दिये है,
गिना दी अपनी मजबुरियाँ
हाँ तुम्हारे बंधन
जानता हुँ मैं
पता है इस आवाज से ही
दिल को बहला लेता हुँ मैं
तुम ना सही
तुम्हारी यादें तो है
सफर में मैं तन्हा तो नहीं
हाँ यह सफर अनंत का
तुम्हारी यादों के साथ
©® karan dc
और मैं, मेरी चिंता न कर मैं तो कर्ण हुँ हारकर भी अमर होना जानता हुँ
Friday, 31 July 2015
सफर
Subscribe to:
Post Comments (Atom)
A letter to swar by music 53
डियर स्वर, दिन ढल चुका है। शहर की शोरगुल भरी सड़कें अब धीरे-धीरे शांत होने लगी हैं। दिनभर लोगों की आवाजाही, गाड़ियों के हॉर्न और भागती-दौड़त...
-
रोहित 35 वर्षीय प्रोढ़ घर में बिल्कुल अकेला रहता था। मुंबई मेट्रो सिटी में एक ऑफिस का वाईस मैनेजर था रोहित। काम का बोझ और ऊपर से अकेलापन वह ...
-
Dear swar, कई रोज़ हुए मुझे तुम्हारा कोई ख़त नहीं मिला। पहले तो मैं हर सुबह दरवाज़े की आहट पर चौंक जाता था, जैसे डाकिए के हाथों में तुम्हारे...
-
हर दोपहर जिंदगी जाने कितने ख्वाब बदलती है। ज्यूं सुबह से घटती है परछाई, ख्वाबों की भी किस्मत घटती सी लगती है, दिल में कुछ बैचे...
No comments:
Post a Comment