Thursday, 24 December 2015

A challenge to time

अजीब सी किस्मत लिखी है तुने मेरी,
पर मुझे कतई मंजूर नहीं है हार मेरी।

ए खुदा बस तुने अपनी ही चली हमेशा,
नहीं देखी आँखों में बसी बेबसी मेरी।

बाबा मेरे महल बना रहे है अमीरों के,
पुरी जो करनी है सारी ख्वाहिशें मेरी।

माँ अक्सर पहले ही खा लेती है खाना,
सहन नहीं होती है उससे यह भूख मेरी।

कह दो 'करन' वक्त से रफ्तार बढ़ा लें यह,
भारी पड़नी है उस पर चहलकदमी मेरी।

©® करन जाँगीड़
24/12/2015_06:30 morning

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