रविवार, 13 अगस्त 2017

A letter to swar by music 34

Dear Swar,
..................
बहारें तस्वीर से आयें या हकीकत से,
जिंदगी तो हर हाल में खिलखिलानी है।।
........
और देखो,
इधर बरसात के बाद रौनक ही रौनक छाई है, हर एक के चेहरे पर खुशी, हर तरफ हरियाली, नदी में बहता वो निर्मल पानी... कुछ कुछ तुम्हारे ख्यालों से मिलता जुलता है। देखो ना..... मिट्टी से कोई खुशबु निकल रही है जैसे।
नदी के पानी में अठखेलियां करते पंछी न जानें किस बात की याद दिलाना चाहते हैं, इनके परों से उछलते पानी की कलाकृतियां अपने आप में अद्भुत होती है, शाम को सूरज की लाल पीली किरणें जब नदी के बहते पानी पर पड़ती है तो जिंदगी के सभी रंगों को अद्भुत तरीके से प्रस्तुत करती है।
सुनो,
नदी के पानी की कल-कल जिंदगी के सुमधुर संगीत की याद दिलाती रहती है, क्या तुमने कभी अकेले में सुना है नदी के इस संगीत को, क्या कभी झरने से बात करने की कोशिश की है, क्या तुम्हें याद है नदी के पानी में हम दोनों अपने पैरों को डुबाये कुछ गुनगुनाते थे, चलो मैं ही बता देता हूं.......
...........
तु जब जब मुझको पुकारे, मैं दौड़ी आऊं नदी किनारे......
...........
हां, अब तो याद आया ही होगा.....
आवाज़ में तुम्हारी कैसी मासुमियत थी ना, अरे! वो तो अब भी है, बस मजबूरियों की बंदिश लगा दी तुमने अपनी जुबान पर.....
सुनो,
मैं अब भी वहां बैठ कर नदी की कल कल के साथ वही गीत गुनगुनाता है, किसी जवाब की प्रतीक्षा में मगर नदी की कल कल और हवा की सरसराहट के अलावा कुछ भी नहीं सुनाई देता.........
खैर मैं बैठ कर तुम्हें याद तो कर ही लेता हूं......
.....
अब सुनो,
तुमने अभी अभी कुछ कहां था मुझे, ऐसा मुझे लगा। हां, मेरे कानों में वही प्यारी सी आवाज आई... "चिशमिश"?????
अबे!!! तुम भी तो idiot हो ना....
और सुनो,
चश्मे की अपनी कहानी, पता है मैं हर रोज जब चाय पीता हूं तो चाय के कप से उठती भाप चश्मे के काँच पर छा जाती है, पता है तब चाय या कटोरी नहीं दिखती मुझे। हां, इस धुंध लगे काँच से जब धुंध हटती है धीरे धीरे तब ना!!! तब तुम्हारी तस्वीर बनाती जाती है और काँच बिल्कुल साफ होने पर चाय में भी तुम ही नजर आती हो, और मगर....
मगर यह क्या मैं ज्यूं ही कप को होठों से लगाने के लिए उठाता हूं तो तुम गायब... हां, ठीक है... पता है तब चाय का स्वाद और भी बढ़ जाता है!!!!
अरे हां याद आया!!! और idiot, चाय बनाना सीख गई या वहीं चासनी जितनी मिठी? और फिर कहना कि थोड़ा दूध और डाल दो ठीक हो जाएगी!
.......
और सुनो,
इस बारिश के मौसम में चश्मा पहने मैं जब बाइक पर कहीं जा रहा होता हूं तो पता है बारिश आ ही जाती है और चश्मे के काँच पर पानी आ ही जाता है कुछ पल मैं परेशान हो जाता हूं कि सामने देखूं कैसे?
और परेशान होकर मैं चश्मे को सर पे ऊपर चढ़ा लेता हूं पर यह क्या यह तो वापस नीचे खिसककर आंखों के सामने ठहरता है और साथ ही फ्रेम के कॉर्नर पर तुम दिखाई देती हो चश्मे के काँच से पानी साफ करते हुए।
बारिश रुक जाती है, चश्मा साफ है मैं तुम्हें देखने के लिए चश्मा उतार कर देखता हूं मगर तुम वहां नहीं हो,
तुम सच में वहां थी क्या?
या
यह मेरा भ्रम था!!
.......
और सुनो,
तुम्हें मालूम है ना जब भी तुम सामने आती हो मैं चश्मा उतार कर देखता हूं तुम्हें...
...
खैर तुम नहीं समझोगी, मैं तो युही कहता रहता हूं, मगर करूं भी तो क्या?
यही कर सकता हूं ना!!
......
दिल में बसी कोई तस्वीर जो है,
बिन नैन खोलें भी देख लेता हूं मैं
......
हां,
सुन idiot अपना ख्याल रखना...
...
With love
Yours
Music

©® जांगिड़ करन kk
13_08_2017__19:00PM

बुधवार, 9 अगस्त 2017

A letter to swar by music 33

Dear swar,

Whether I deserve something but didn't get it.
........
आसान राहें चुनी ही नहीं मैंने,
दोष किसको दूं जो थक गया हूं।
.........
तुम्हें शायद यह मालुम नहीं है कि मैं बचपन से ही जिंदगी से दो दो हाथ करता आया हूं, जिंदगी हर वक्त मेरी राहों में कुछ न कुछ अड़चन डालने को उद्धत रहती है। पता नहीं क्यों इसे मेरे से इतनी जलन होती है, मैंने तो कोई ऐसा महान काम किया नहीं जो यह मुझसे जलें.... मगर इसकी फितरत तो देखो, एक मासूम से बच्चे को सताना शुरू किया था इसने आज तक भी यह क्रम जारी है..... बचपन में ज्यादा फर्क नहीं पड़ता था क्योंकि दोस्तों के संग समय निकल जाता था और इतनी समझ भी नहीं थी कि दुखों से जीवन पर असर कोई असर पड़ता, लेकिन धीरे-धीरे समझदारी बढ़ती गई वैसे वैसे ये घटनाएं दुखों का पहाड़ बनती गई। और देखो ना, मैं किसी भी तरह हर बुरे वक्त में मुस्कुरा देता हूं पर अगली बार फिर उससे ज्यादा गहरा घाव देती है जिंदगी........
..........
फक़त इश्क से ही निपटना होता तो कोई बात नहीं,
जिंदगी ने हर कदम इक नई जंग से रूबरू कराया है।
..........
सुनो,
कभी कभी थक सा जाता हूं, इतना ज्यादा कि पता ही नहीं चलता कि मैं कहां हूं और क्यों हूं? किस दिशा में हूं?
एक बात सुनो, कभी कभी अकेले में मेरे चीखने की आवाज भी मेरे कान बेंध देती है फिर कई कई दिनों तक वहीं आवाज बजती है कानों में..... मैं खुद से डरने लगा हूं अकेले बैठने पर जैसे वक्त मुझे काटने को दौड़ता है पर बात यह भी है कि यह दर्द सुनाऊं भी किसको? और कौन सुनेगा?
और हां, कोई इलाज नहीं है मेरे साथ होने वाली इस बदनसीबी का, कोई कुछ नहीं कर सकता तो सुना कर भी क्या करूं?
और उल्टा सबको परेशान करना है?!!
सुनो जान,
मैं बस वक्त की इस बेरहमी पर अकेले में बैठकर चुपचाप अश्रु बहा लेता हूं और आंखें सूख जाने पर ही सबके सामने आ पाता हूं,
जानती हो क्यों?
क्योंकि उन सबके सवालों के जवाब नहीं दे पाता हूं मैं, मुझे मालूम है कि देर सबेर सबको मालूम होना है पर अभी तो...............
......
देखो,
मैं जानता हूं कि तुम्हारे अपने सपने हैं, तुम्हारी अपनी मजबूरियां हैं मगर.......
तुम यह जान लो कि मैं वक्त की इस बेरहम चाल से छलने वाला हूं, उस वक्त मेरी स्थिति क्या होनी है मैं नहीं जानता,
मगर इतना जानता हूं,
मुझे उस समय सबसे ज्यादा जरूरत तुम्हारी होगी,
हां मेरी जान,
मैं उस वक्त सिर्फ तुम्हारे कंधे पर सर रखकर थोड़ा रो सकूंगा, तुम साथ रहोगी तो मेरे थके कदमों में कुछ जान आयेगी, तुम्हारे होने से मुझे यूं लगेगा कि आगे जिंदगी में कुछ बाकी है....
सुनो ना!!!
तुम्हें उस वक्त आना है,
हर हाल में आना है,
क्योंकि,
मैं वक्त की चाल नहीं बदल सकता मगर तेरा साथ पाकर चलने की कोशिश तो कर ही सकता हूं, मुस्कुराने भर की कोशिश तो कर सकता हूं....
सुनो......
.....
वक्त जब छलने आये,
किस्मत को बदलने आये,
तुम मुस्कान लिए अपनी.....
इसको ठेंगा दिखा देना,
मेरी जीत की राह सजा देना.........
.....
मंजूर मुझे नहीं हां यह भी,
किस्मत पर मगर जोर कहां?
बात यहीं कि सहना है,
यहीं दर्द फिर ओर कहां?
तुम आकर वक्त को बता देना...........
..................
I know the stumping time. But I can't do anything to stop it or to win the game before stumping. It's not my fault but really I am in a bond of time, the bond of nature.
Only can see the game with wet eyes, with trembling lips....
You know.........
I will wait for you on the time to discover my world....
.........
With love....
Yours
Music

©® जांगिड़ करन kk
08_08_2017__12:00PM

सोमवार, 31 जुलाई 2017

A letter to swar by music 32

Dear swar,
.......
मौसम ने पुकार सुनी है मेरी शायद,
यह सुनी सी नदी भी कल कल करने लगी।
........
सुनो,
मैंने अपने पिछले एक पत्र में जिक्र किया था ना कि मौसम भी तुम्हारी तरह बेरूखा हुआ जाता है शायद... मगर देखो ना!!
सावन आया है, हां!! सावन तो जिंदगी के लिए खुशियों की सौगात लेकर आया... तेरी जूल्फों सी घनी काली घटाएं, तेरी मुस्कान सी झमाझम बारिश, तेरी लहराती चाल सी यह बल खाती हुई नदी......
............
गीत कोई गुनगुनाना सीखें तो नदी हाजिर है,
इसके सुर में सुर मिला कर गाओ तो जरा।।।।
.............
हां प्रिये,
पिछले कई दिनों से सबके चेहरे पर चिंता की लकीरें थी कि बारिश होने के आसार कम है तो जानें क्या होगा अब!! मैंने कहा था कि हर चेहरे पर उदासी है, हां!! मैं भी तो उदास था मौसम की इस बेरूखी से!!
मगर अब!! अब जब मौसम ने अपना रंग दिखाना शुरू कर दिया है तो सबके चेहरे खिल से गये है, हर तरफ खुशी के गीत गाए जा रहें हैं, सबकी जिंदगी में खुशनुमा पल आया है.....
हां!! मैं भी तो खुश हूं, सबके चेहरे पर जो खुशी देखता हूं तो खुश होना लाज़मी भी है.....
पर!!
पर सुनो जान!! यह सावन भी वैसा ही है जैसा कि पिछला सावन था, बिन तुम्हारे यह वैसा ही सूना सूना है..
तुम जानती हो ना......
और सुनो,
सावन के इस रूप को और ज्यादा गहरा रंग देने के लिए पेड़ पौधों ने भी अपना रूप दिखाना शुरू कर दिया है। चारों तरफ हरियाली ही हरियाली.....
और फूल वाले पौधों पर फूलों ने भी खिलना शुरू कर दिया है....
और देखो...
उधर पेड़ों के झुरमुट से किसी के चहकने की आवाज आई है, तुम तो नहीं हो उधर,
मगर ये आंखें उस ओर टकटकी लगाए देखती रही,
जानें कब तक..
.........
देखो ना!!!
नदी के बीचों-बीच जो वो पत्थर है ना, हां! वहीं पत्थर जिस पर बैठकर कभी हम तुम जिंदगी के सवालों को हल करने की सोचते थे.. हां!! वहीं पत्थर!! उसके चारों तरफ पानी भर गया है, ज्यादा गहरा नहीं है। उतना ही पानी है जितने में हम तुम पार कर उस पत्थर पे जा सकें, बिल्कुल उतना ही जितना कि उस वक्त भरा हुआ था जब हम पहली बार उस जगह गये थे। तुम्हें तब भी डर लगा था ना, मगर मैं बोला था कि डरना नहीं.... मैं हूं ना!!!!
सुनो,
तुम फिर आओ ना.....
फिर वहीं पर जाकर बैठते हैं, कुछ सवाल बाकी है ऐसे जिनके जवाब तब ही मिल सकते हैं जब तुम साथ हो....
सुनो!! आओ ना!!!! पानी में एक साथ पैर रख कर कुछ देर बेवजह ही बैठे रहेंगे, बड़ी राहत मिलती है इससे, तुम्हें भी मालूम है ना?
आओ ना!! फिर उस पानी में हथेलियों से छपाक छम करें, और तुम्हें मालूम है इसी के साथ तुम्हारे पाजेब की धुन कितनी मधुर लगती थी, जैसे प्रकृति का सबसे सुरीला संगीत हो....
आओ ना!! मैं फिर नदी के उस कल कल के संगीत के साथ तुम्हारी मधुर आवाज को सुनते हुए तुम्हारी बांहों में सोया रहना चाहता हूं......
सुनो!!!!
तुम आ जाओ ना!!
........
मुझे मालूम तुमको नहीं आना है, पर मेरी जिंदगी के हर पल में यह आदत बन चुकी है....
मैं तो कहता ही रहूंगा....
और अंत में आज ही के दिन लिखे letter no. 8 से ये पंक्तियां फिर गुनगुना लेता हूं.....
.....
जब तुमको न आना था तो क्यों यह सावन आया है,
रहना है युहीं तन्हा तो क्यों चिड़ियों का कलरव लाया है।
कैसी जिंदगी है क्यों है यह बेबसी का आलम यहाँ पे,
कभी समझ आयेगा बस ये ही मैनें दिल को समझाया है।।
...........
With love
Yours
Music

©® जांगीड़ करन KK

#नोट-चित्र के अलावा सब काल्पनिक है।
#चित्र- आज ही उसी नदी की धारा में खींचे हुए।

रविवार, 30 जुलाई 2017

नश्तर

हर तरफ बस बीमार निकलें,
मोहब्बत में ज़ार ज़ार निकलें।

तोहमत मुझ पर जो लगा रहे,
वहीं आज फिर दागदार निकलें।

टूटी नैया तो है घायल खिवैया,
समंदर से कैसे आर पार निकलें।

जिनकी नज़रों से दिल घायल है,
उनके दिल से अब अंगार निकलें।

औकात अपनी कहां हुस्न के आगे,
नज़रें ठहर जायें जो वो बाज़ार निकलें।

जिंदगी का नश्तर चलता रहा करन,
निभायेगा कौन रिश्ते तो हजार निकलें।

©® Jangir Karan kk
29_07_2017

शनिवार, 22 जुलाई 2017

A letter to swar by music 31

Dear swar,
...........................
"जिंदगी कुछ हद तक हैरान हैं,
किस्मत का जाने कैसा पैगाम है।
राहें कौनसी थी क्षआज करन की,
तुमसे मुलाकात ही मगर अंजाम है।।
................
शुक्रिया इस मुलाकात का। मुलाकात बहुत छोटी सी थी मगर दिल को काफी दिनों बाद थोड़ा सुकून मिला। मगर पता नहीं क्यों पर मैं जानता हूं कि इन सबका कोई मतलब नहीं है फिर भी दिल कहता है कि तुमसे युही मुलाकात होती रहे।
कभी कभी तुम सामने ऐसे ही आ जाओ तो मैं बेफिक्र जी सकता हूं। हां, मैं तुम्हें तंग नहीं करूंगा।
कल जिद थोड़ी ज्यादा हो गई ना!!! हां, उसके लिए सॉरी।
सॉरी तो क्या?
तुम वैसे भी बहुत अकड़ु हो?
इतना कहने के बाद तैयार हुई.... भला इतना भी कोई गरज करवाता है।
खैर! टेबल नंबर १ याद रहेगी अब। हालांकि दिन में कितने ही लोग उसी जगह बैठकर आइस्क्रीम खाते होंगे.. पर मैं,
मैं अब जब भी वहां जाऊंगा तो वहीं टेबल ढूंढूंगा, हां,
नाखून से वहां तुम्हारे सामने ही तो मैंने तुम्हारा नाम लिखा था ना...उस टेबल का अब मुझसे विशेष रिश्ता सा बन गया है, मेरे एहसास जुड़ गए हैं अब.....
बाकी मैं जानता हूं तुम्हारे पास वक्त नहीं है, जरा सा भी नहीं, कल भी कितनी जल्दी में थी। हां, मालूम है हमें..... काम बहुत है ना.......
मगर अब सुनो.......
लापरवाही की महारानी!! हां, मौसम सुहाना है, तुम कह रही हो, मुझे भी मालूम है, रिमझिम बारिश का मजा, सड़क पर भरे पानी में उछल कूद करने का मजा.... हां, बहुत अच्छा लगता है......
मगर तुम्हारी लापरवाही की हद है.... बारिश में भीगने को कौन बोला? अबे!! काम करना है तो जब आसमान साफ हो तब कर दिया करो ना... और बारिश के पानी में ज्यादा उछल कूद क्यों?
.......
और अब जब सिर, गला, नाक सब तुम्हें परेशान कर रहे तो....... उसका क्या।
और भाड़ में जाए स्कूल भी!!!!
बस तुम अपना ख्याल रखो, अपने प्रति लापरवाही मत करो बस......
और अब तुम्हें रोना आ रहा है.... 2 सुई लगाई ना? और ऊपर से कड़वी कड़वी टेबलेट.... पर अब मैं भी क्या करूं?
हां..... तुम यहां आओ तो मैं थोड़ा सर दबा दूं, आओ तो तुम्हारे ललाट पर थोड़ी बाम भी मल दूं..... मगर तुम कहां मानने वाली हो...
वैसे आज सुई के दर्द से तुम्हें भी थोड़ी अक्ल आ जायेगी, आगे से तुम ऐसी लापरवाही नहीं करोगी, नहीं करोगी ना!!!!
और सुनो idiot,
अब जैसा डॉक्टर ने कहा वैसा ही कर और कुछ खाया पीया कर!! क्या हाल बना रखा है अपना। चेहरा भी उतरा हुआ, पैरों में जैसे जान नहीं, शरीर जैसे कि ढाँचा मात्र.... और यह उदासी? क्यों?
खैर सुनो,
तुम अब भी उतनी ही सुन्दर हो, जितना कि चौदहवीं का चांद होता है, नजरों में आज भी उतनी ही शरारत जितनी मैंने देखनी चाही थी और इस बारिश में भीगी हुई जूल्फें!!! कमाल!! कमाल क्या कोई जवाब नहीं तुम्हारा। दिल तो किया कि उसी वक्त इन जूल्फों को खोलकर छितरा दूं और आसमां में छायें बादलों को कहूं कि देखो मेरे पास तेरे जैसे घनी काली घटाएं है, मगर कुछ सोचकर रुक गया कि यहां बाजार में लोग क्या कहेंगे।
अरे हां!!! याद आया... तुमने हेयर पिन भी वही लगाया... वहीं आसमानी रंग का.. तुम्हें मालूम था ना कि मुझे यह रंग बहुत पसंद हैं इसलिए आज तुम जानबूझकर वहीं लगाकर आई हो...............
और तुमने गौर किया या नहीं.... मेरे टी-शर्ट पर कल भी वही दो पेन लगे थे। हां मेरी जान....... ये गुलाबी और आसमानी पेन हमेशा ही साथ रहते हैं... मैं इन्हें कभी दूर नहीं करता, कभी भी नहीं..... तुम कभी भी देख सकती हो यह शर्ट की जेब में मिलेंगे.....
हां तुम्हारी अमानत है ना.....
और सुनो जान,
तुमने सामने हो तो आइस्क्रीम का स्वाद भी... खुद ही सोच लो न अब तुम ही.....
मेरा अनुभव तो कहता हूं कि जुकाम का सही इलाज आइस्क्रीम ही है...... हां!!! अब तुम मुझे idiot कहोगी, कोई ना.....
मगर गौर करो.....
मुझसे बड़ी idiot तो तुम हो.......
और महारानी सुनो, लापरवाही मत किया करो.......
............
"परेशान मोहब्बत तुम्हें परेशान क्यों देखें,
वक्त की चक्की में पिसता इंसान क्यों देखें।
तुम खैरियत से रहा करो ना साहिबा मेरी,
करन हर पल ही तुम्हें हैरान क्यों देखें।।
............
मालूम है मुझे..... तुमसे मुलाकात का अब कोई भरोसा नहीं.... क्योंकि तुम यह चाहती भी नहीं...... मगर एक ही निवेदन है... मौका मिलें तो कोशिश जरूर करना...
हां.... अपना ख्याल रखना....... CCTV को हमारा स्नेह रहेगा!!!

और अंत में यही कहना चाहूंगा.....
"जग तो भरा हुआ भावों से दास्तां यह पुरानी है,
आदत कैसे पीछा छोड़े मोहब्बत की कहानी है।
खोया खोया करन खुद में सब तेरी मेहरबानी है,
मैं तो तेरा दीवाना जैसे मीरा कृष्ण की दीवानी है।।
...........

With love
Yours
Music

©® Karan DC KK
21_07_2017__6:00AM

शुक्रवार, 7 जुलाई 2017

A letter to swar by music 30

Dear SWAR,
............
आसमां को ताकता हूं कि कहीं बादल तो नजर आयें,
आंखों के बादल मगर है कुछ देखने भी ना दें मुझको।
............
देखो तो यहां,
मेरे गांव के लोग बादलों का इंतजार कर रहे हैं और बादल है कि बस एक मामूली सी झलक दिखला कर जानें कहां गुम हो गए हैं, किसानों के चेहरे की उदासी मैं खूब समझता हूं पर ये बादल भी तो अपने बस में नहीं है ना,
सबके अपने अपने नसीब है कोई किसका इंतज़ार करता है, कोई किसका?
और जानता कोई नहीं कि इंतजार कब खत्म होना है या होना भी है या नहीं!!
मगर करें भी क्या जब सबने अपने अपने हिस्से की किस्मत में यहीं लिखा!
और यही करना भी है...
.......
देखो,
आज फिर मैं वहीं पर जा बैठा है जहां पर बैठ कर अक्सर मैं तुमसे जिंदगी की बातें किया करता था,
मालूम है ना,
जैसा मेरी जिंदगी में रूखा रूखा है वैसा ही यहां पर भी रूखा रूखा है......
मैं आज यहां काफी समय बाद आया हूं,
मुझे मालूम है कि बिन बारिश यहां का हाल यही होना है, मगर बहुत उदास हो गया हूं आज यहां आकर....
एक इस जगह की ऐसी नीरसता और दूसरे उन लम्हों की कमी जिनमें हमने सपने बुनकर जिंदगी की नींव रखी थी.....
तुम्हें याद है ना मैं तुम्हें बताता था.....
जब मैं उस पत्थर पर बैठकर तुमसे खूब बतियाता था और उस वक्त पत्थर के चारों ओर पानी भरा हुआ था...
एक तरफ पानी से होकर आती ठंडी बयार और दुसरे तेरी आवाज़ दिलकश जादू पता नहीं चलता था कि कब वक़्त भागता जा रहा है और शाम का खाना अक्सर ठंडा हो जाता था,
मालूम है ना घरवाले दो बात सुनाते इस पर, मगर मैं!! हा हा हा हा हा ,
कान भी नहीं देता क्योंकि उस समय तक भी कानों में तो तुम्हारी ही आवाज गूंजती रहती थी इसलिए घरवालों डाँट का मुझ पर कोई असर नहीं पड़ता था,
मैं तो चुपचाप खाना खाने में मग्न हो जाता और खाना ठंडा होने के बावजूद भी एकदम फ्रेश और स्वादिष्ट लगता, तेरी आवाज़ उसके स्वाद में चार चांद लगा देती थी,
सुनो,
देर तो मुझे आज भी होने वाली है, डाँट भी पड़ने वाली है मगर खाने में वो पहले सा स्वाद नहीं आने वाला......
तुम्हें मालूम है ना!!!
मैं तुम्हें अक्सर वहां बैठकर पास पेड़ से आ रही पंछियों की आवाज सुनाता था, तुम मुझे बस पागल कहती और कहती कि मेरी ही आवाज मुझे सुना रहे हो (इस पत्र को पढ़ने वालों में कोई शख्स ऐसा भी होगा जो इस पंक्ति का सीधा सीधा मतलब समझ जायेगा)......
मगर,
मगर आज देखो मैं यहां बैठा हूं, कानों में आज भी ईयरफोन लगा रखे हैं मगर एक आवाज आ रही अभी इनसे होंठों से छूलो तुम मेरा गीत अमर कर दो.....
और सुनो,
इस चट्टान के आसपास तो क्या इस पुरी नदी में कहीं भी पानी नजर नहीं आ रहा है। मेरी निगाहें चारों ओर बस पानी ढूंढ रही है मगर कहीं नजर नहीं आया और आसपास के पेड़ पौधे भी रूखे सूखे हैं, वहां से भी तेरी आवाज़ अब नहीं आती है........
........
कि वक्त ही मुकर्रर करता है जिंदगी की किताब को,
मैंने तो हर पन्ने पर तेरे ख़्वाबों की बारिश ही चाही थी।
........
आसमां से बरसता ही नहीं पानी,
और  आंखों  से थमता  ही नहीं।
निगाहें जाने क्यों तरसती है करन,
जब उनको इस राह पर आना ही नहीं।
..........
सुनो,
तो फिर,
मैं यहां अब बैठा,
गीली आंखों में तस्वीर अब भी एक ही बनती है यहां तुम कभी आकर अपनी जुल्फों से बारिश कर रहे हो,
और मैं,
मैं तो............

With love
Yours
Music

©® जांगिड़ करन kk
07_07_2017__19:00PM

बुधवार, 5 जुलाई 2017

बस एक मुलाकात

कहीं तो  कोई बात हो,
जिंदगी से मुलाकात हो....
बेचैन दिल की कराहट बोले,
धड़कन का बस साथ हो....
........
आसपास ही भटकता है,
मन कहां समझता है,
उम्मीद बस यह रखता है,
कभी उसे भी अहसास हो......
.........
सुना पथ है,
आगे झंझावत है,
डरता नहीं मैं हार से,
हाथ में बस तेरा हाथ हो........
..........
किस्मत कोई खेल नहीं,
जब रेखाओं का मेल नहीं,
सुना आंगन तब भी बोलें,
स्वर का कोई साज हो....

©® जांगिड़ करन kk
05_07_2017__6:30AM

A letter to swar by music 34

Dear Swar, .................. बहारें तस्वीर से आयें या हकीकत से, जिंदगी तो हर हाल में खिलखिलानी है।। ........ और देखो, इधर बरसात के ब...