संदेश

June, 2017 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

A letter to swar by music 29

चित्र
Dear SWAR,जीत  पर  तो ठीक है मगर हार  पे  क्या  पहरा  लगाना,
चिड़िया चुरा लें ख्वाब जब फिर क्या कोई ख्वाब सजाना।
........
जिंदगी की भागदौड़ और वक्त के अलग-अलग रूप, और इसी बीच पानी की बुंदों के पार तुम्हारा चेहरा,
एक आदत सी हो गई है अब.........
दिल में अब कोई खीझ या चिड़चिड़ापन नहीं होता है, ना ही ज्यादा अहसास होता है कि तुम यहां नहीं हो,
बस 💓 दिल के एक कोने में छपी तस्वीर बार बार एक संकेत जरूर करती है कि अब भी तुम मेरी हो.... ठीक उसी तरह जिस तरह चांद आसमान का है, जल धरती का है, पेड़ पौधों का हरापन है, पक्षियों की चहचहाहट है...... एक आदत सी बन गई हो तुम।
तुम्हें यकीन नहीं होगा..... मैं जब भी अचानक से फोन की तरफ देखता हूं तो मुँह से अनायास ही एक आवाज निकलती है कि हां मैं बोल रही हूं। हां, तुम यहीं तो बोला करती थी ना!!
और अब यह केवल भ्रम है, मगर यह भ्रम भी बहुत अच्छा है मेरे लिए और जरूरी भी है.......
क्योंकि.......
।।।।।।।।।।।।।।
कुछ हकीकतें भ्रम हो तो भी कोई बात नहीं,
प्रेम के पंछी पिंजरे में भी आसमां ढूंढ लेते हैं।
।।।।।।।।।।।।।।
सुनो जाना,
आसान तो अब भी कुछ नहीं है.... दिन के उजाले म…

Alone boy 23

चित्र
फूल
यूं तो
हरपल ही
मुस्कुराते हैं,
मगर
सावन में थोड़ा
ज्यादा ही
खिलखिलाते है,
मौसम की खुमारी
इन पर
कुछ ऐसी ही
छाई
जो रहती है....
मगर
फूल
अक्सर
टूटने से
मुरझा जाते हैं,
या फिर
मौसम की
बेरूखी से
उदास से
नजर आते हैं।
हम इंसानों का
भी कुछ
यही
तो हाल होता है,
इक खिलखिलाते
चेहरे को
अक्सर कोई
लफ्जों से
उदास कर देता है,
वो बात और है कि
हम तब भी
बाहर
मुस्कुराते हैं,
मगर दिल
मालूम सबको
है
दिल
कितना
उदास रहता है,
जब
कोई
छोड़ जाता है।।
©® Karan kk
29_06_2017

दिल की पीर

चित्र
ओझल होती नजरों से मोहब्बत का आकार दिखा दूं।
कभी आओ जो महफ़िल में लफ्जों से मैं चांद दिखा दूं।कहां खेलता है आसमान बादलों की पारी को,
तुम तो मेरे करीब रहो बारिश का अहसास दिला दूं।धरती पहन के चूनर धानी देखो कितना इठलाती है,
तुम जो रहो संग मेरे मैं इसकी चूनर लहरा दूं।बेशक सारा जहां जलेगा तुम्हें यहां पर देखकर,
मैं तो तुझ में खोया रहकर प्रेम की नई रीत बता दूं।आंखें अब भी तकती रहती राहें तेरे आने की,
दिल की पीर कौन सुनें किसको अपना हाल सुना दूं।
©® करन

Alone boy 22

चित्र
तुमने
अपनी मजबूरी
के बंधन से
मेरे जज़्बात
तो कब के
बांध दिए
और इधर वक्त
की गर्द
तेरी
तस्वीर को
ढकती जा रही,
मैं मजबूर
करूं भी
तो क्या?
तुम तोड़कर
मजबूरी की
बेड़ियां
आ जाना,
इस गर्द
को
अपने प्रेम से
हटा जाना,
अपनी
चांद सी तस्वीर
फिर मुझको
दिखा जाना.....
©® Jangir Karan kk
16_6_2017__21:00PMPhoto from Google with due thanks

A letter to swar by music 28

चित्र
Dear SWAR,इंसान तुम भी हो इंसान हूं मैं भी,
सफर में तुम हो सफर में हूं मैं भी।
कभी तन्हा कभी महफ़िल में रहा,
चाहत तुम्हें है तो चाहता हूं मैं भी।।
....................
तुम एक हमेशा से जानती ही हो ना कि मुझे बस तुम्हारी चहचहाहट ही सबसे ज्यादा रास आती है, कई दफा तुमने इस बात पर गौर किया होगा कि बिना बात भी तुमसे कुछ न कुछ सुनता रहना चाहता रहा हूं, और एक बात है तुम्हारी आवाज़ का तो जादू ही ऐसा है कि मैं हरपल खुद को तुम्हारी ओर खींचा हुआ महसूस करता हूं।
तुम यह सब जानती हो ना, फिर भी न जानें क्यों तुम मुझे तन्हा छोड़ जाती हो.............
।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।
सुनो,
मैं अभी पिछले कुछ दिनों में सफर में था, जिंदगी से कुछ कटा कटा सा महसूस कर रहा था खुद को तो फिर से खुद को जिंदगी के करीब लाने के लिए यह जरूरी था......
।।।।।।
जिंदगी के सफर की थकान मिटाने,
उदास  मन को  थोड़ा सा बहलाने।
निकला घर से कोई परदेश को जाने,
लेकिन मन का वो कैसे बदलें ठिकाने।।
।।।।।।।
और, सफर में एक दिन हमने समंदर से मुलाकात का भी कार्यक्रम रखा, समंदर को देखकर एक बात तो सीधे समझ आ गई कि आप जितना धैर्य रखते हैं उतनी ही आपकी…

अच्छा तो मैं चलूं

.....................
बचपन से वो दोनों साथ खेलें थे, एक ही गली के अलग अलग छोर पर मकान थे उनके, स्कूल भी एक ही था दोनों का। पढ़ाई में भी दोनों अव्वल, अक्सर होमवर्क भी साथ किया करते थे, अच्छे दोस्त की तरह थे। कभी कभी मन करता तो दोनों गांव के बाहर पानी की टंकी पर चढ़कर बैठ जाते और घंटों आसमान को घूरते हुए जानें क्या बातें करते रहते, अपने भविष्य के बारे एक दूसरे की बातें और सपने जानने की कोशिश करते थे शायद, हां, कभी दोनों के मन में एक दुसरे के प्रति कोई अलग ख्याल नहीं आया, क्योंकि वक्त के तो जैसे पंख लग गए और........
मयंक को कॉलेज की पढ़ाई के लिए अब बाहर जाना पड़ा और उधर देविका क्योंकि लड़कियों को ज्यादा पढ़ाया नहीं जाता तो स्कूली शिक्षा के बाद उसकी पढ़ाई रोक ली गई, और कुछ समय बाद ही देविका की सगाई कर दी और शादी की तारीख भी तय कर दी लेकिन अभी तक मयंक तक यह खबर नहीं पहुंची थी, इधर घरवालों के आनन फानन में लिये निर्णय से देविका भी परेशान थी,  मगर करती भी क्या? मयंक तक समाचार पहुंचायें कैसे?
क्योंकि उन दिनों मोबाइल फोन का चलन तो था नहीं, पर मयंक के घरवालों से खबर मिली की मयंक उसकी शादी के एक …