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मैं वहीं आम का पेड़ हुँ

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हाँ मैं वहीं आम का पेड़ हुँ,
जिस डाल पर बैठकर
कोई चिड़िया गीत सुनाती थी।
मेरी हरियाली भी
चिड़िया के मन को भाती थी।
हाँ,
जब चिड़िया अपने पंखों को फड़फड़ाती
तब मैं रोमांचित सा ऊठता, मेरे पत्ते हिल हिल कर अपनी खुशी जाहिर करते,
मेरी ही डाल पर
बैठकर उसने प्रेम का
गीत लिखा,
उसे गुनगुनाया,
पता है,
उस गीत में मैं इतना खो गया
कि मैें खाने पीने की
भी सुध खो बैठा,
हाँ।।।
पर नियती का क्या??
चिड़िया तो उड़ चली,
पर मैं
मैं कहाँ जाऊँ?
बस अब उदास सा
ठुँठ बन कर
रह गया हुँ,
न कोई हरियाली,
न कोई गीत।
कान तरस रहे है
अब भी
कि फिर से चिड़िया आयेगी,
फिर से डाली पर बैठकर
कोई गीत नया गायेगी।
मैं फिर हरा भरा हो
जाऊँगा।।©® करन जाँगीड़

स्वर- हार जीत के बीच

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कहीं दूर अंतर्मन में
बज रहा है
स्वर नाद का
लगता है पल भर में
लड़ पड़ेंगे दोनों।
दोनों ही
तैयार है
अपने अपने
हथियारों के साथ।
एक के पास है
तीक्ष्ण और तार्किक
व्याख्यायें,
तो दुसरी तरफ है
कोमल और धवल
विचार।
जीत किसकी होनी है,
मैं भी नहीं जानता,
पर किसी भी स्थिति में
हारना तो मुझे है।
इसी जीत और हार के
बीच का अंतर
ही 'स्वर' है।©® करन kk

A letter to swar by music

Dear swar,कल रात को तुम्हारा खत मिला! हाँ, वास्तव में मिला। मैनें रात को एक ख्वाब देखा कि तुमने मुझे कोई खत लिखा हो। खत में तुमने यहीं पूछा ना कि मैं कैसा हुँ??
लो मैं तुम्हें खत लिखने बैठ गया हुँ नींद जागते ही।
वैसे तुम्हें मालुम होना चाहिये था कि मैं कैसा हुँ जिस हाल के लिये तुमने ठीक वैसा ही हुँ, और कुछ लिखने की जरूरत नहीं है शायद!!
खैर! मेरी चिंता छोड़ो, तुम सुनाओ! सुना है आजकल उदास रहती हो! पर क्यों?
दूर रहने का फैसला तुम्हारा था तो तुम उदास क्यों हो!
मैनें तो पहले ही कहा था कि अपनी उदासियाँ मुझे दे दो। पर तुमने मेरी कहाँ मानी, अब तुम उदास हो, यह अच्छी बात नहीं है! आओ यहाँ पर आओ, तुम्हारी उदासियाँ दूर कर दुँ, अगर दूर नहीं हो सकीं तो तेरे साथ मैं भी थोड़ा सुबक लुँगा, बाकी अकेले में ही रोता हुँ!!
और देखो वक्त भी न जाने कैसे निकलता ही जा रहा है।कभी कभी युँ लगता है कि यह जीवन ही बेकार है, पर जब तुम्हारी प्यारी मुस्कान याद आती है तो हर दुख दर्द भूल जाता हुँ। फिर से चलने लगता हुँ समय की गति के साथ। न जानें किन खुशियों की तलाश में चलता हुँ,
बस इतना पता है कि चलता हुँ।
लेकिन जानती हो कभी…

यह कैसा इश्क है!!!

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मेरे दिन का ख्वाब तुम हो,
मेरी रातों की नींदेंतुम हो!
महफिल में तन्हाई तुम हो,
तन्हाई में महफिल तुम हो!!चाँदनी सी श्वेत धवल तुम हो,
सुरज सी उज्जवल तुम हो!
किसी अंधियारी रात में,
जुगनुँ की रोशनी सी तुम हो!!मेरी राह में ठण्डी छाँव सी तुम हो,
सर्दी में गुनगुनी धूप सी तुम हो!
जिन यादों की बूँद से मैं भीग जाऊँ,
यादों की वो भीनी सी बारिश तुम हो!!मेरी जिंदगी का हर राग तुम हो,
मेरी ताल तुम, मेरी लय भी तुम हो!
मैं तो दर्द का इक नगमा हुँ 'करन',
इसकी धड़कन का 'स्वर' तुम हो!!©® करन जाँगीड़ KK

A Letter to father by innocent child

A Letter to father by an innocent boyबाबुल,
आज आपको गये हुए पुरे १२ वर्ष गुजर गये हैं| याद होगा ना आपको कि उस समय मैं एक अबोध बच्चा सा था, मैं समझ भी नहीं पाया था कि हो गया था उस समय|
इन १२ वर्षों में आपको मेरी याद नहीं आई|
नहीं आई ना?
यहाँ मैं तब से आपको ही याद कर के जी रहा हुँ, हाँ दिल की बात आज तक किसी से कहीं नहीं है,
कौन सुनेगा भला?खैर छोड़ो ये बातें, बताइये कैसे है आप? हाँ आप तो अच्छे ही होंगे! आपके जहाँ में दुख, आवेश, भावना, द्वेग जैसा कुछ भी तो नहीं होता है!
लेकिन कभी मुझ से पुछा कि मैं कैसे जी रहा हुँ? या कैसा हुँ?
और याद है ना आप मुझे प्यार से बेटी कह कर बुलाते थे! जब बेटी विवाह के बाद ससुराल जाती है तो पिता और बेटी दोनों की आँखों से दर्द साफ झलकता है, पर यहाँ तो बाबुल आप खुद इस बेटी(मुझे) ही छोड़ के चलें गये, हाँ, आपको तकलीफ नहीं हुई?
मेरी याद नहीं आई?
नयन सुखे ही रहे?
पर जानते हो ना, मैं तब से रोता रहा हुँ, आज तक, ना यह आँख में पानी खत्म होता है, न आपकी याद!
और #माँ, माँ की तो शक्ल भी मुझे याद नहीं है, मैनें आपके अंदर ही माँ को महसूस किया है, वो हाथों नरमी, माँ के जैसे ही …

प्यार के स्वर

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जूबाँ पर अपनी अब भी मेरा नाम लाते तो है|
कहती है सखियाँ उसकी वो शरमाते तो है||कल रात ख्वाबों में वो अनायास ही मुस्कुराये थे,
लगता है मोहब्बत के दिन उन्हें भी याद आते तो है|मेरे गीतों को गुनगुनाते हुए ही सोते है अब भी,
मेरे लफ़्ज आज भी उनकी जुबाँ पर इतराते तो है|मालुम है उन्हें मैं देखुँगा चाँद में अक्स उनका,
इस खातिर वो चाँदनी रात में छत पर आते तो है|कैसी दूरी कैसी मजबूरी उनकी यादे तो है 'करन'
हम भी गुनगुना के 'स्वर' प्यार को निभाते तो है|©® करन जाँगीड़