बुधवार, 11 नवंबर 2015

A Letter to father by innocent child

A Letter to father by an innocent boy

बाबुल,
आज आपको गये हुए पुरे १२ वर्ष गुजर गये हैं| याद होगा ना आपको कि उस समय मैं एक अबोध बच्चा सा था, मैं समझ भी नहीं पाया था कि हो गया था उस समय|
इन १२ वर्षों में आपको मेरी याद नहीं आई|
नहीं आई ना?
यहाँ मैं तब से आपको ही याद कर के जी रहा हुँ, हाँ दिल की बात आज तक किसी से कहीं नहीं है,
कौन सुनेगा भला?

खैर छोड़ो ये बातें, बताइये कैसे है आप? हाँ आप तो अच्छे ही होंगे! आपके जहाँ में दुख, आवेश, भावना, द्वेग जैसा कुछ भी तो नहीं होता है!
लेकिन कभी मुझ से पुछा कि मैं कैसे जी रहा हुँ? या कैसा हुँ?
और याद है ना आप मुझे प्यार से बेटी कह कर बुलाते थे! जब बेटी विवाह के बाद ससुराल जाती है तो पिता और बेटी दोनों की आँखों से दर्द साफ झलकता है, पर यहाँ तो बाबुल आप खुद इस बेटी(मुझे) ही छोड़ के चलें गये, हाँ, आपको तकलीफ नहीं हुई?
मेरी याद नहीं आई?
नयन सुखे ही रहे?
पर जानते हो ना, मैं तब से रोता रहा हुँ, आज तक, ना यह आँख में पानी खत्म होता है, न आपकी याद!
और #माँ, माँ की तो शक्ल भी मुझे याद नहीं है, मैनें आपके अंदर ही माँ को महसूस किया है, वो हाथों नरमी, माँ के जैसे ही खिलाना, सोने पर वहीं हिदायत कि ठंड न लग जायें, कैसे भूल जाऊँ?
मैं २००३ की दीपावली से अनाथ सा हो गया हुँ, लोग यहाँ दीपावली की खुशियों में व्यस्त है, और मैं हमेशा की तरह सिर्फ आँसु बहा लेता हुँ!

खैर मैं रोते और लड़खड़ाते ही सही पर चलता तो रहा हुँ, समय के साथ, कभी पीछे, तो कभी आगे,
कभी बैसाखियों का सहारा मिला तो, तो कभी दीवार से सिर टकराया,
पर मैं हमेशा से चलता ही रहा हुँ, निरंतर, काल की गति के साथ,
कभी बहुत सारा स्नेह मिला,
कहीं बहुत अच्छे दोस्त मिले, जिनके साथ ने मुझे हमेशा ही आगे बढ़ने की प्रेरणा ही दी है, पर फिर भी सब कुछ अधुरा सा लगता है आपके बिना,
कभी महफिल में आपकी याद आ जाती है तो एक कतरा आँख से बेबस ही निकल आता है, लेकिन सबकुछ मुझे दबा के रखना पड़ता है, चुपचाप, चलना तो है!
मैं कमजोर नहीं हुँ, बहुत मजबूत हुँ लेकिन यह मन न जानें कभी कभी क्यों इतना बैचेन सा हो जाता है,.....

खैर सुनो, जिंदगी की राह में कोई हमसफर के लायक भी मिला,
ह ह ह ह
जानते हो क्या हुआ?
आप रहने दो,
आपको क्या बताऊँ?
अभी नालायक कह कर एक आध तमाचा न लगा दो, कहीं,
अरे हाँ, तमाचे से याद आया, मुझे तो याद नहीं कि आपने कभी मुझे मारा हो...

मैं कुछ लोगों की नजरों में सफल दिखता हुँ, पर मैं ही जानता हुँ मैं अभी तक कुछ भी नहीं कर पाया, हाँ, वो सपने, जो देखें थे आज भी अधुरे है,
मैं आज भी वहीं पे खड़ा हुँ, इस रेगिस्तान रूपी संसार में किसी नख्लिस्तान की तलाश में हुँ, नजर नहीं आया अभी तक,
ना हीं आने की कोई उम्मीद बाकी है,
फिर भी न जानें क्यों?
किस आस में?
बस चले जा रहा हुँ,
आपकी यादों के साथ,
आँखों में आँसुओं के साथ!

आपने मेरा नाम जो बालुराम रखा था वो जीत का प्रतीक है,
पर मैं कभी जीत नहीं पाया हुँ,
न हीं जीतने की आशा है!
बस सिर्फ हार, हार और हार ही नजर आती है!
मैं थक गया हुँ अब!
मैं हारने के लिये तो करन(कर्ण) बना हुँ,
हाँ मैं हार जाऊँगा.....
अब यह दर्द सहा नहीं जाता, बाबुल.....

#श्रद्धांजली

तुम्हारा
बालु राम सुथार उर्फ Karan DC
11/11/2015(दीपावली के दिन)

3 टिप्‍पणियां:

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