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A letter to father by innocent child 2

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Dear बाबुल,
कैसे हो आप?
हां, आप सोचेंगे कि यह भी कोई पूछने की बात है पर क्या करूं?
पूछना तो है ही ना, मुझे तो यह जानना है ना कि कैसे रह लेते हैं वहां आप हमारे बिन!
हां, बाबुल!!
आज से दो साल पहले मैंने दीपावली के दिन ही ख़त लिखा था पर आज तक जवाब नहीं आया आपका, मैं बैचेन होकर फिर से यह खत लिखने बैठ गया हूं।
आखिर आपने क्यों कोई जवाब नहीं दिया मेरे ख़त का?
इतने बदल से गए हो आप वहां जाकर?
या बहुत व्यस्तता रहती है?
जो भी हो,
पर इस खत को पढ़कर जवाब जरूर देना।
.......
सुनो बाबुल,
आपको बताया था ना पिछले ख़त में कि मैं थकने सा लगा हूं पर हिम्मत नहीं हारता,
चलते रहने की कोशिश करता रहूंगा।
देखिए उसी स्थिति (उससे और बदतर) के होते हुए भी दो साल तक चुपचाप पीड़ा सहता आया हूं.....
मगर अब यह असहनीय सा लगता है।
पता नहीं क्या मगर अंदर कुछ टूटता हुआ सा महसूस होता है,
मन उदास सा रहता है......
........
सुनो बाबुल,
इधर दीपावली पर चारों तरफ आतीशबाजी हो रही थी, दियों की रोशनी से गांव जगमगा रहा था, कहीं घरों पर लाइटिंग की गई थी, लोग तरह तरह की मिठाईयां लायें थे, पटाखों की गूंज दूर दूर तक सुनाई दे रही थी, लोगों …

A letter to swar by music 41

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DEaR SwAr,
..............
नीम तले यह गहरी छाँव,
याद आ रहा तेरा गांव.......
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सीढ़ियों से उतरते चाँद को,
नज़रों से देखूं कि दिल से।
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यूं बार बार अपनी जुल्फों को छेड़ा न कर,
हम घायल तेरी नज़रों और कोई जुल्म न कर।
.............
सुनो स्वर,
सबसे पहले तो दीपावली के त्यौहार की अग्रिम शुभकामनाएं......
हां, तुम कहो न कहो पर मुझे पता है कि तुम आजकल बहुत बिजी रहती होगी, दीपावली की साफ सफाई, कॉलेज, स्कूल भी जाना.....
हां, तुम हमेशा की तरह ही मेरा यह खत भी नहीं पढ़ने वाली हो... जैसे ही तुम्हें खत मिला और तुम इसे तोड़ मरोड़ कर कचरे में डाल देने वाली हो... मगर, मैं तो तुम्हें लिखूंगा... मेरा तो यह जरूरी काम बन गया है ना जैसे कि श्वास लेना जरूरी है..
.......
हां तो सुनो,
मैं अभी बैठा था एक नीम के पेड़ की छांव में.....
अचानक से एक पता उपर से टूटकर कर चेहरे पर आकर गिरा, अब तुम सोचोगी कि यह तो कोई नई बात नहीं हुई क्योंकि पत्ते है तो उनको टूट कर गिरना ही है।
मगर,
मैं उस पत्ते को हाथ में लेकर कहीं दूर तुम्हारे ख्यालों के गांव में खो गया...
मुलाकातोंं के उस दौर में जहां चांद सीढ़िय…

A letter to swar by music 40

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Dear swar,
........
चांद को तुम ढूंढती रहो आसमां में,
मैं तो तुम्हें देखता हूं मन की नजरों से।
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कुछ बात तो है कि चांद झांक रहा है,
तुम्हें सताने का इरादा उसका भी नहीं।
.........
बेशक दुरियां जमाने भर की है मगर,
मेरे दिल में बसा चांद आज भी है।।।
..........
सुनो,
आज मैं तुम्हारे नाम से उन तमाम भारतीय नारियों को अपने पति या प्रेमी की ओर से इस खत के माध्यम से एक संदेश देना चाहता हूं.... संदेश क्या जो मैं अपने आसपास देखता हूं महसूस करता हूं वही सब खत में बयान करने जा रहा हूं....
इस खत में "स्वर" का संबोधन सभी महिलाओं के लिए है और भेजने वाले"संगीत" वो प्रेमी या पति जो वाकई दिल से अपने प्रेम को निभाते हैं......
..........
सुनो स्वर,
सबसे पहले तो तुम्हें आज करवा चौथ की दिल की अतल गहराई से हार्दिक शुभकामनाएं...
मुझे मालूम है कि तुम मुझसे कितना प्रेम करती हो, इस प्रेम का ऋण शायद मैं नहीं चुका सकता... हां, अपने लफ़्ज़ों में तुम्हें बयां करने की कोशिश कर सकता हूं......
.......
मुकम्मल मेरा हर एक पल तुमसे हुआ है,
मकान बनाया मैंने पर घर तुमसे हुआ है।
मैं कहीं भटकता फिरता…

Alone boy 25

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कितने
क़रीने से
सजाता हूं मैं,
नरम मिट्टी से
सपने.....
एक कौने में
खुशबू,
दुसरे में
समर्पण,
तीसरा कौना
चाहत का,
चौथे में
जिंदगी......
बस इंतजार
किया था
प्रेम की
बूंदों का,
सपनों को
जमाने खातिर
मोहब्बत की
थपथपाहट का....
पर
वक्त जानें क्यों
अंधड़
लें आया
नफ़रत की
और
बिखेर गया
सपनों को,
ध्वस्त किया
अरमानों के
घरोदें को.....
मैं अवाक्
बस देखता रहा,
भावशून्य बन.....
मगर आंखों में
फिर से
वहीं
सपने
सजने लगे थे....
मालूम है मुझे
यही जिंदगी है!
......
©® Karan DC KK
07_10_2017__14:00PM

A letter to swar by music 39

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DeAr SwAr,
.........
हर सफर का मकसद हो यह जरूरी तो नहीं, कभी कभी तेरे शहर बस युही आ ही जाता हूं, हां...
कुछ यादें पुकारती है,
कोई जगह निहारती है,
कोई खोया हुआ ढूंढता है मुझको......
और फिर.....
मेरी आदत तुम्हें मालूम है ना....
एक सफर में जिंदगी का कोई सार न हो अक्सर तुमने भी देखा होगा कि उस सफर में लोग नहीं जाते हैं पर मैं ऐसा नहीं हूं, जो दिल की आवाज आई वहीं कर लेता हूं मैं...
नफे नुकसान की बात दिल कभी नहीं देखता!
आसान नहीं दिल को समझाना...
इसलिए फिर मैं निकल पड़ता हूं तेरे शहर की ओर....
जानें क्यों?
पर!!
बस निकल पड़ता हूं.......
......
अजनबी नहीं है ये रास्ते अब, हर जगह, हर स्टेशन, हर नदी नाला, हरेक ब्रेकर और तो और सड़क के गड्ढे तक याद है मुझे..... कोई आश्चर्य की बात नहीं यह!
.......
खैर सुनो,
मैं निकल पड़ा हूं घर से..
लग्जरी बस की सीट पर बैठकर.... मैं स्लीपर काहें नहीं लेता?
मालूम है ना तुम्हें (बाहर के नजारे न देख पाता मैं क्योंकि स्लीपर में तो नींद आ जाती है ना).......
अंधेरा होता है उस वक्त मगर क्योंकि मुझे सब याद है तो मैं अपने आप रास्ते भर नजारें देख लेता हूं।
......
तुम्हें बत…

A letter to swar by music 38

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Dear swar,
.......
बरसात का दौर थम सा गया है, और उधर खेतों में फसल भी पकने को आई है तो खेत खाली किए जा रहे हैं, नदी के पानी में भी ठहराव सा आ गया है, मौसम भी थोड़ा समझ से परे है बिल्कुल तुम्हारी तरह ही, क्योंकि ठंड और गर्मी का मिश्रण सा है अभी तो बीमार होने की आशंकाएं भी ज़्यादा है, और फिर उजड़ा हुआ चेहरा, सुखे होंठ, सूझा हुआ नाक सबकुछ बड़ा अटपटा सा लगता है....
और उधर सूने होते खेत जैसे मेरे सपने उड़ा कर ले गया कोई, जैसे कि दिल बस खाली खाली सा कर गया कोई, नदी का जो पानी ठहरा तो लगा जिंदगी ठहर सी गई है और ठहरा पानी हो या जिंदगी..... जानती हो ना अच्छा नहीं लगता।
पर करें भी तो क्या?
नदी को बहते रहने के लिए बरसात की जरूरत है और मुझे चलते रहने के लिए.....
हां, तुम्हारी!!
अब बोलो आगे अकेला चलकर कहां जाऊं?
क्यों जाऊं?
किसके लिए जाऊं?
मगर.....
देखो मैं......... मुझे अहम नहीं है कि मैं बार बार खुद को दिखाता हूं कि मैं हुं,
पर मैं.. मुझे कुछ बातों का यकीन अब भी है,
रास्तों की हकीकत कुछ भी हो ख्वाबों में फूल खिलाना मेरी फितरत में है तो है....
और तुम तो हर उस ख्वाब में साथ रही जब कभी भी मैंने देख…