गुरुवार, 29 जून 2017

A letter to swar by music 29

Dear SWAR,

जीत  पर  तो ठीक है मगर हार  पे  क्या  पहरा  लगाना,
चिड़िया चुरा लें ख्वाब जब फिर क्या कोई ख्वाब सजाना।
........
जिंदगी की भागदौड़ और वक्त के अलग-अलग रूप, और इसी बीच पानी की बुंदों के पार तुम्हारा चेहरा,
एक आदत सी हो गई है अब.........
दिल में अब कोई खीझ या चिड़चिड़ापन नहीं होता है, ना ही ज्यादा अहसास होता है कि तुम यहां नहीं हो,
बस 💓 दिल के एक कोने में छपी तस्वीर बार बार एक संकेत जरूर करती है कि अब भी तुम मेरी हो.... ठीक उसी तरह जिस तरह चांद आसमान का है, जल धरती का है, पेड़ पौधों का हरापन है, पक्षियों की चहचहाहट है...... एक आदत सी बन गई हो तुम।
तुम्हें यकीन नहीं होगा..... मैं जब भी अचानक से फोन की तरफ देखता हूं तो मुँह से अनायास ही एक आवाज निकलती है कि हां मैं बोल रही हूं। हां, तुम यहीं तो बोला करती थी ना!!
और अब यह केवल भ्रम है, मगर यह भ्रम भी बहुत अच्छा है मेरे लिए और जरूरी भी है.......
क्योंकि.......
।।।।।।।।।।।।।।
कुछ हकीकतें भ्रम हो तो भी कोई बात नहीं,
प्रेम के पंछी पिंजरे में भी आसमां ढूंढ लेते हैं।
।।।।।।।।।।।।।।
सुनो जाना,
आसान तो अब भी कुछ नहीं है.... दिन के उजाले में जिंदगी कभी खेत के किसी किनारे से चिढ़ाती  है या
पंछियों की चहचहाहट फिर कोई गीत याद दिलाती है,
और रात..... चाँद हो तारे मुझे घेरकर जाने कौनसा राज़ ऊगलवाना चाहते है और कभी कभी अंधेरी रात खुद की तुलना मुझसे कर उदास किये देती है।
तुम जितना सरल समझ रही थी तुम्हें मालूम है कि यह कितना कठिन लग रहा है तुमको भी... बस तुम अपने को मजबूरियों के बांध कर चुपचाप देख रहे हो.....
और हां......
देखो, बाहर यह जो झूठी हंसी है ना तुम्हारी मैं अच्छे से जानता हूं मैं, मन में तुम भी कितना उदास हो।।
और तुमने मुझे देखा है ना.......
कितना हंस लेता हूं मैं दुनिया के सामने.. मगर तन्हाई की अपनी बात है..... इसके अपने मायने होते हैं,
जरा  जिंदगी की सच्चाई पर सोचकर मेरी ओर देखना......
कभी तन्हाई में दर्पण को देखना, और झांकना खुद की आंखों में, आंखों के अंदर बसे पानी की गहराई में झांक कर महसूस करना,
इस पानी से बनते बादलों को आंखों में छुपायें रखती हो ना,
इनके बरसने से तुम्हें डर लगता है ना.....
अरे!!!
उधर देखो, बाहर!!!
सावन आया है, वो देखो!!!! बादल पानी बरसा रहे हैं,
देखो ना,
मैं खुद अपनी आंखों का पानी भूलकर इस बारिश को देख रहा हूं,
कहीं भी देखूं,
पानी के उस पार तस्वीर तो तुम्हारी ही देखता हूं।
और
यह पानी की बुंदे जो जमीं पर गिर रही है तेरे पेंजन की छम छम सी लगती है........
और
मैं युहीं बारिश को देखता रहता हूं.........
।।।।।।।।।
किसके हिस्से क्या लिखा है,
मोहब्बत इससे बेपरवाह है....
हमने खुद को जाना है और
दुनिया समझती लापरवाह है.....

और यह फोटो हमने खुद खींचा है अपनी स्कूल में।

With love
Yours
music

©® जांगिड़ करन kk
29_06_2017___16:00PM

Alone boy 23

फूल
यूं तो
हरपल ही
मुस्कुराते हैं,
मगर
सावन में थोड़ा
ज्यादा ही
खिलखिलाते है,
मौसम की खुमारी
इन पर
कुछ ऐसी ही
छाई
जो रहती है....
मगर
फूल
अक्सर
टूटने से
मुरझा जाते हैं,
या फिर
मौसम की
बेरूखी से
उदास से
नजर आते हैं।
हम इंसानों का
भी कुछ
यही
तो हाल होता है,
इक खिलखिलाते
चेहरे को
अक्सर कोई
लफ्जों से
उदास कर देता है,
वो बात और है कि
हम तब भी
बाहर
मुस्कुराते हैं,
मगर दिल
मालूम सबको
है
दिल
कितना
उदास रहता है,
जब
कोई
छोड़ जाता है।।
©® Karan kk
29_06_2017

दिल की पीर

ओझल होती नजरों से मोहब्बत का आकार दिखा दूं।
कभी आओ जो महफ़िल में लफ्जों से मैं चांद दिखा दूं।

कहां खेलता है आसमान बादलों की पारी को,
तुम तो मेरे करीब रहो बारिश का अहसास दिला दूं।

धरती पहन के चूनर धानी देखो कितना इठलाती है,
तुम जो रहो संग मेरे मैं इसकी चूनर लहरा दूं।

बेशक सारा जहां जलेगा तुम्हें यहां पर देखकर,
मैं तो तुझ में खोया रहकर प्रेम की नई रीत बता दूं।

आंखें अब भी तकती रहती राहें तेरे आने की,
दिल की पीर कौन सुनें किसको अपना हाल सुना दूं।
©® करन

शुक्रवार, 16 जून 2017

Alone boy 22

तुमने
अपनी मजबूरी
के बंधन से
मेरे जज़्बात
तो कब के
बांध दिए
और इधर वक्त
की गर्द
तेरी
तस्वीर को
ढकती जा रही,
मैं मजबूर
करूं भी
तो क्या?
तुम तोड़कर
मजबूरी की
बेड़ियां
आ जाना,
इस गर्द
को
अपने प्रेम से
हटा जाना,
अपनी
चांद सी तस्वीर
फिर मुझको
दिखा जाना.....
©® Jangir Karan kk
16_6_2017__21:00PM

Photo from Google with due thanks

बुधवार, 14 जून 2017

A letter to swar by music 28

Dear SWAR,

इंसान तुम भी हो इंसान हूं मैं भी,
सफर में तुम हो सफर में हूं मैं भी।
कभी तन्हा कभी महफ़िल में रहा,
चाहत तुम्हें है तो चाहता हूं मैं भी।।
....................
तुम एक हमेशा से जानती ही हो ना कि मुझे बस तुम्हारी चहचहाहट ही सबसे ज्यादा रास आती है, कई दफा तुमने इस बात पर गौर किया होगा कि बिना बात भी तुमसे कुछ न कुछ सुनता रहना चाहता रहा हूं, और एक बात है तुम्हारी आवाज़ का तो जादू ही ऐसा है कि मैं हरपल खुद को तुम्हारी ओर खींचा हुआ महसूस करता हूं।
तुम यह सब जानती हो ना, फिर भी न जानें क्यों तुम मुझे तन्हा छोड़ जाती हो.............
।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।
सुनो,
मैं अभी पिछले कुछ दिनों में सफर में था, जिंदगी से कुछ कटा कटा सा महसूस कर रहा था खुद को तो फिर से खुद को जिंदगी के करीब लाने के लिए यह जरूरी था......
।।।।।।
जिंदगी के सफर की थकान मिटाने,
उदास  मन को  थोड़ा सा बहलाने।
निकला घर से कोई परदेश को जाने,
लेकिन मन का वो कैसे बदलें ठिकाने।।
।।।।।।।
और, सफर में एक दिन हमने समंदर से मुलाकात का भी कार्यक्रम रखा, समंदर को देखकर एक बात तो सीधे समझ आ गई कि आप जितना धैर्य रखते हैं उतनी ही आपकी गरिमा बढ़ती है लेकिन इस को कुछ लोग नहीं समझते है वो उस धैर्य को कायरता मान बैठते हैं....
वैसे समंदर तट पर टहलते हुए हमें एक बात और पता चली है कि आप जितना नरमी से कदम बढ़ायेंगे रिश्तों में उतनी​ही सरलता आती है, एक कठोर कदम रिश्तों में बेरूखी पैदा करता है। उस रेत पर बने मेरे पांवों के निशान मुझे कुछ यहीं सीखा रहे थे कि तुम जिस तरह मुझ पर कदम रखते हो मैं तुम्हारे सामने वैसी ही पेश आती है और यही रिश्तों में भी होता है......
और सुनो जाना.....
वहां कुछ साथी अपने किसी पार्टनर का नाम समंदर की रेत पर लिख रहे थे और फोटो खींच रहे थे, एकबारगी तो मैंने सोचा कि मैं भी लिखु तुम्हारा नाम उस समंदर किनारे और लहरों को चुनौती दूं कि आकर मिटा के दिखायें मगर दूसरे ही पल यह ख्याल आया कि जिसका नाम दिल की गहराई में छपा है उसका नाम यहां लिखने की क्या जरूरत है हां, चुनौती तो मैं वक्त को देता हूं कि अपने दम पर मेरे दिल से तुम्हारा नाम मिटाकर तो दिखायें, यह वक्त के बस में नहीं जाना..... तुम जानती हो ना।
और सुनो,
समंदर शांत था उतना ही शांत जितना कि आजकल तुम हो। मगर जानता हूं मैं यह खामोशी संकेत है, आने वाले तुफान का, किसी सुनामी का, समंदर के तुफान का तो क्या पता मगर तेरी चहचहाहट की सुनामी का मालूम है कि क्या कर देने वाली है। समंदर का तो अपना एक नियम सा है कि कब सुनामी आयें या कब ज्वार भाटा आयें, पर तुम्हारे मन की तुम ही जानो, जानें किस वक्त तुम अपने मन में आई याद रूपी सुनामी को लेकर आ जाओ तो मैं सोच नहीं सकता कि कितनी बड़ी हलचल हो जानी है यहां, मगर यह कोई नुक्सान नहीं करती यही हलचल तो मैं चाहता हूं, दिल की धड़कन का तेज होना, आंखों में सूरज की रोशनी सी चमक, चेहरे पर क्या हाव-भाव आने जाने है इसकी कल्पना करना मेरे बस में भी नहीं है,
बस समंदर किनारे बैठकर यहीं सोच रहा था इस खामोश समंदर में उठने वाली लहर सी कभी तुम्हारे मन में भी एक बार फिर आ जायें...... और मैं जानता हूं एक न दिन यह होना ही है....
फिलहाल तो तुम्हारे जवाब के इंतजार में तुम्हें गुनगुनाता हुआ मैं.....
यानि
सिर्फ तुम्हारा
MUSIC

©® जांगिड़ करन kk
14_06_2017___10:00AM

शुक्रवार, 2 जून 2017

अच्छा तो मैं चलूं

.....................
बचपन से वो दोनों साथ खेलें थे, एक ही गली के अलग अलग छोर पर मकान थे उनके, स्कूल भी एक ही था दोनों का। पढ़ाई में भी दोनों अव्वल, अक्सर होमवर्क भी साथ किया करते थे, अच्छे दोस्त की तरह थे। कभी कभी मन करता तो दोनों गांव के बाहर पानी की टंकी पर चढ़कर बैठ जाते और घंटों आसमान को घूरते हुए जानें क्या बातें करते रहते, अपने भविष्य के बारे एक दूसरे की बातें और सपने जानने की कोशिश करते थे शायद, हां, कभी दोनों के मन में एक दुसरे के प्रति कोई अलग ख्याल नहीं आया, क्योंकि वक्त के तो जैसे पंख लग गए और........
मयंक को कॉलेज की पढ़ाई के लिए अब बाहर जाना पड़ा और उधर देविका क्योंकि लड़कियों को ज्यादा पढ़ाया नहीं जाता तो स्कूली शिक्षा के बाद उसकी पढ़ाई रोक ली गई, और कुछ समय बाद ही देविका की सगाई कर दी और शादी की तारीख भी तय कर दी लेकिन अभी तक मयंक तक यह खबर नहीं पहुंची थी, इधर घरवालों के आनन फानन में लिये निर्णय से देविका भी परेशान थी,  मगर करती भी क्या? मयंक तक समाचार पहुंचायें कैसे?
क्योंकि उन दिनों मोबाइल फोन का चलन तो था नहीं, पर मयंक के घरवालों से खबर मिली की मयंक उसकी शादी के एक दिन पहले ही शहर से परीक्षा देकर लौट रहा है, उसकी तो जैसे मन की मूराद पूरी हो गई वो अब शादी की तैयारी से ज्यादा मयंक के आने का इंतजार करने लगी।
और उस दिन सुबह से ही वो शहर से आने वाली हरेक बस को देखने लगी शाम की बस से​ मयंक आया तो वो दौड़ी और झट से हाथ पकड़​कर उसे पानी की टंकी पर ले गई। मयंक तो कुछ समझा ​ही नहीं कि हो क्या रहा है।
वहां ऊपर पहुंच कर फिर मयंक बोला," आखिर कुछ बोलोगी भी क्या हुआ है और मुझे यहां क्यों लाई?"
देविका एक ही झटकें सारी बात बता दी और कहा कि कल सुबह ही शादी है।
मयंक हतप्रभ होकर देविका को देखता रहा मगर फिर संभल कर बोला, "अच्छा है ना, खुश रहना और अपने पति का ख्याल रखना।"
देविका की आवाज में अब एक शांति सी थी, "तो तुम मेरे बिन जी पाओगे?", उसने अपने हाथों को उन हाथों से खींचते हुए कहा।
और वो बिन जवाब के ही चुपचाप आसमान को घूरता रहा, न जानें वो कब चली गई पता ही नहीं चला। बहुत देर बाद पटाखों की आवाज से उसका ध्यान टूटा, उसने नीचे आकर देखा तो..............
और उस दिन से उसके चेहरे पर एक उदासीनता छा गई, लोग कहने लगे कि शहर में पढ़ने से छोरे में अक्ल आनी शुरू हो गई।
©®करन
02_06_2017__21:00PM

मंगलवार, 30 मई 2017

नमक इश्क का

Dear swar,
चार साल बाद आज फिर कान वो आवाज सुनने को बैताब थे, हां प्रिये,
चार साल पहले का वो दिन तुम्हें याद होगा, वहीं जगह, वहीं प्रोग्राम और वही हालात, हां!! कुछ पात्रों की कमी थी आज। आज साथ में सिर्फ गुड़िया ही थी जिसे वो घटना अच्छी तरह याद है...
अब तुम्हें याद दिलाता हूं मैं चार साल पहले की घटना, सराय के पास बैठे​ थे हम सब, और हमारे हिस्से में थी मात्र दाल( हां, प्रिये!! उस वक्त तो लापसी भी खत्म हो गई थी ना, कुछ हलवा वगैरह बनाया जा रहा था फिर), हां हम दाल भी कितने चटकारे से पी रहे थे, और तुम्हें हम पर हंसी आ रही थी। पता था हमें कि दाल में नमक इश्क का कम था हमें तो मालूम नहीं था वो तो तुमने ही कहां था कि करन जी मैं नमक लेकर आऊं?
और बिना मेरा जवाब सुने सरपट भागे और जानें कहां से लें आयें दोना नमक से भरा हुआ और यह क्या अरे! रूको यह काफी है, मगर तुम न रूकने वाली थी। हां, पर दाल का स्वाद जानें क्यों मीठा हो गया और दाल के नाम से घबराने वाला मैं केवल दाल को ही पीने लगा। इधर तुम जानें मुझमें क्या देख रहे थे और उधर दाल में मैं तुमको ही देख रहा था, नमक की जगह अपने प्रेम को मिलाते हुए और जब से फिसला जिंदगी में तो अब तक संभलना नहीं आया और अब तो संभलने का मन भी नहीं करता....
और आज जब चार साल बाद गुड़िया के साथ उसी जगह गया तो जिंदगी खुद ब-खुद यादों की तस्वीर सामने लें आई, आज लापसी(गेहूं के दलिये से बनी हुई) तो थी, हां पुड़ी की थोड़ी सी कमी थी मगर वो हमको महसूस नहीं हुई,
हां, आज भी दाल में नमक कम था मगर मैंने किसी को कहा नहीं लाने के लिए, बस इंतजार करता रहा कि कब आवाज आ जायें, "करन जी! मैं नमक लेकर आऊं"?
30_5_2017__20:30PM

सोमवार, 29 मई 2017

A letter to swar by music 27

Dear swar,

सबसे पहले तो पुनः बहुत बहुत बधाई,
हमने कहा था ना कि सफलता की राह पर तुम बढ़ते जाओ, मेरा प्रेम तुम्हारा रास्ता नहीं रोकेगा। और तुमने वो कर दिखाया, कमाल है ना।
पर मैं थोड़ा असंतुष्ट हुं, परिणाम आशानुरूप नहीं था, हां, फिर भी बढ़िया तो है।
भगवान से प्रार्थना करता हूं कि आगे भी युहीं सफलता हासिल करते रहो,
और तुम यह कर सकते हो....
चलो यह छोड़ो,
इधर जिंदगी में बहुत उथल पुथल हुई थी अभी, मैं तो हमेशा ही मस्त रहने वाला और सबको अपने जैसा ही अच्छा समझता रहा, मगर कुछ लोग जरूरत से ज्यादा चालाक निकले। मुझे मालूम तो था कि उनकी फितरत शायद सही नहीं होगी पर मैं फैसला नहीं कर पाया कि क्या किया जाएं, हां, अक्सर कभी कभी हम वक्त के उस हिस्से में होते हैं जहां पर जल्दबाजी या किसी और वजह से चूक कर बैठते हैं,
और उन चेहरों पर विश्वास कर देते हैं जिनकी नजरें काली हो, हां इसी चूक की वजह से पता नहीं किसकी काली नजर ने एक काली दीवार खड़ी करी जिसके पार तुम्हें देख पाना बहुत मुश्किल हो रहा है,
और तो और तुम्हारे मन में मेरे लिए भी न जाने क्या क्या विचार भर दिए मालूम नहीं,
तुमने इस बात का अहसास करा दिया मुझे कि तुम उस दिन से बहुत कुछ बदलते जा रहे हो, मगर सुनो,
हां,
पहले यह जान लो कि 28-05-17 को सुबह 9 बजे जो तुम्हारा निर्णय था, वैसे मुझे उसी समय बताते तो मैं तुम्हारे पक्ष के दोनों इंसानों के सामने तुम्हें जवाब देता, मगर तुमने बहुत देर बाद संदेश पहुंचाया,
तो जवाब यहां सुन लो,
हां, तुम तुम्हारी मन मर्जी हो वो करो, मगर मेरी तो अंतिम सांस तक भी जुबान से एक ही बात निकले​गी, "स्वर!! तुम सिर्फ मेरी हो"
शायद तुम जवाब समझ जाओगे।
चलो अभी परेशान मत होओ, बाद में देखते रहेंगे यह तो, अभी तो यह सुनो कि मेरे एक मित्र ने बताया कि तुमने बकरियां चराना छोड़ दिया है,
क्यों?
बकरियों को बेच क्यों दिया?
क्या तुम्हें वो जंगल, वो पथरीले रास्ते, वो कंटीली झाड़ियां, वो आम का पेड़, वो झील का शबनमी किनारा....
कुछ भी याद नहीं आता? क्या तुम्हें मालूम है उन रास्तों पर बैठे पशु 🐦 पक्षी  भी तुम्हें देखने को बैताब है, और आम के पेड़ के नीचे हिरणी का बच्चा तो तुम्हारे गीत के लिए कितना बैकल है कि पानी तक पीने नहीं जाता है,
वो तितलियों का झूंड न जाने किस सुगंध की तलाश में है कि अब किसी भी फूल पर बैठ नहीं रहा, शायद तुमसे कुछ लेना देना है उनका भी,
और रहा मैं,
मैं तुम्हें क्या कहुं,
आम के पेड़ पर लटकते झूलें पर बैठा हुं, मेरी इच्छाओं का कोई औचित्य भी नहीं लगता अब....
मुझे मालूम है कि तुम उधर लौट के नहीं आने वाले हो,
पर एक बात बताओ तुम घर पर पे अकेले कैसे समय काट लेते हो?
तुम्हें जरा सा भी अहसास नहीं होता है कि तुम मुझसे मिलने आ जाओ?
अरे हां!! तुम्हें होगा भी क्यों, तुम तो दूरी ही चाहते हो ना, मगर सुनो पार्टनर,
मैं पहले भी कह चुका हूं और कह रहा हूं,
वो आंगन,
वो झूला,
वो आंखें,
वो डायरी का पन्ना......
सब तुम बिन सुने ही रहने हैं...
हो सके तो लौट आना।


(Edited at 23:00 pm)

लो, यह आंधी और बारिश भी कोई संदेश लेकर आई है, हां, मैंने इन बुंदों के संग कुछ संदेश भेजा है,

शायद तुम इनकी भाषा समझ पाओगे, समझ जाओ तो उस पर विचार करना,

फिलहाल तो सो जाओ, बारिश भी थम गई है अब छम छम छम बंद करो। 😂😂😁

शुभरात्रि


With love yours
Music

©® जांगिड़ करन kk
29_05_2017___21:40PM

शुक्रवार, 26 मई 2017

दिल्ली वाली गर्लफ्रेंड

#आया_दिल्ली_वाली_गर्लफ्रेंड_छोड़_छाड़_के....
हां! तकरीबन चार साल पहले यह गाना सुनने में बहुत अच्छा लगता था, और इसका विडियो तब से आज तक है मेरे मोबाइल में, पर साल भर में शायद नहीं सुना है। अब सुनने का मन भी करता। हां, तुम्हारा सबसे पसंदीदा डांसिंग सोंग था और शायद आज भी यही हो, और जब जब मुझे तुम्हें चिढ़ाना होता तो मैं कॉल पर यह गाना बजा दिया करता था और मैं जब इसे सुनता अकेले में तो मुझे युं लगता कि यह गाना मॉडर्न न होकर क्लासिकल टाइप का है, जिसमें नायक ने अपने मन के भावों को अच्छे से उकेरने का प्रयास किया है.....
मगर वक्त की कुछ साजिशों ने मेरे मन और मस्तिष्क के भावों को बदलने पर मजबूर कर दिया और मैं फिर जो सुनने लगा वो थे, "कभी कभी मेरे दिल में", "हम तेरे शहर में आये है मुसाफ़िर की तरह, "आजा रे आजा रे ओ मेरे दिलबर आजा".... हां, यहीं सुनने पर मजबूर था....
मगर आज,
मगर आज एक गांव गया था सुबह ही, वहां मैं बैठा था, टीवी पर बच्चे कार्टून देख रहे थे, बीच में जब विज्ञापन आया तो चैनल बदलते ही गाना चल गया, "दिल्ली वाली गर्लफ्रेंड छोड़ छाड़ के"
पता नहीं किस गति से पर मन झट से चार साल पीछे भाग गया, वो डांस देख रहे थे मगर मैं तुमको....
😘😍😍😍😘😍😍😍
#thank_you_kids
#thank_you_9xm

शनिवार, 6 मई 2017

A letter to swar by music 26

Dear swar,
चंद दिनों की जिंदगी है,
मालुम तुमको भी है,
मालुम हमको भी है,
मगर
जानें क्या हो गया है,
न जानें क्यों,
समय कुछ थम सा
गया लगता है,
खैर,
जो भी हो,
मगर आस अब भी है,
वक्त को
पंख लगेंगे,
जब जिंदगी मेरे
पास होगी........
हां, उम्मीद पे तो दुनिया
कायम है।
।।।।।।।।।।।।।।।।।
तो देखो,
पिछले दिनों की बात है, तुम्हें याद न हो तो मैं बता दूं वो 1 दिसंबर, 2016 था, तुमने कोई गलती की थी, हां, गलती अच्छी थी,और इस गलती के बाद तो तुमने मेरी जिंदगी में फिर से हलचल ही मचा दी थी, हर दिन का हरपल जैसे तेरी जुस्तजु में गुजरता था, मन में कोई तरंग हरदम ही हिलौरें ले रही थी, जिंदगी जैसे जन्नत का अहसास करा रही थी,
तुम्हें याद नहीं है क्या?
दिन के 24 घंटे तुम मुझे बताती थी,
अरे बताओ ना आज कौनसी ड्रेस पहनुँ?
कौनसा गाना सुनुँ?
या
कहो क्या इरादा है?
सब याद है मुझे!!!!
तुम्हारा युँ सीढ़ियों से उतर कर आना,
युँ तिरछी नजरों से देखना,
आज भी आँखों में समाया हुआ है,
एक बात बताओ, यह सब क्या था? मेरी तो समझ से परे थी हर बात, मैं तो बस तुम्हारे ख्यालों​में ही खोया रहा, पता नहीं ही नहीं चला कि वक्त कब हाथ से फिसल गया,
अचानक से तुमने अलविदा कह कर जैसे उस ख्वाब को नींद उड़ाकर तोड़ दिया है,

तुमने जिंदगी के कुछ हसीन सपनों की सैर कराने का इरादा किया था शायद, मगर जाने फिर तुम्हारे दिल ओ दिमाग में क्या सुझा कि वापस चल पड़ी। देखो एक बात मैं तुम्हें हमेशा ही कहता आया हुँ मगर तुम समझती नहीं हो, यह जिंदगी में सिर्फ बाहरी दिखावे में खुश रहना असली खुशी नहीं है, असली खुशी तो तब है ना जब हम मन से खुश रहे।
और तुम.......
हर बार खुद को ही समझ नहीं पाती कि क्या करना है, कभी इधर कभी उधर,
कभी शांत चित्त से सोचकर कोई ठोस निर्णय लो, हां या अपने मन की सुनो......
अगर तब तुम्हें लगे कि मैं तुम्हारे लिए कुछ नहीं हुं तब बेशक तुम मुझे छोड़कर चली जाना...
मैं तुम्हारे इंतज़ार में ही उम्र बिता सकता हूं तब भी.....
।।।
खैर देखो......
तुम जरा बदली नहीं हो, वहीं बदमाशियां वहीं चंचलता,
तुम वही हो जो पहले थी।
मैं अब भी वहीं देखता हूं, झाड़ियों में फुदकता चाँद...
हाँ,
ध्यान रखना....
काँटों का।
.......
#गली_में_आज_चाँद_निकला

जुल्फें ऊलझन में थी
कि बंधी रहे
या खुल के बिखर जायें,
होठों पर कुछ लफ्ज़
नाचते रहे मगर
बाहर आने से थोड़ा
शरमा से रहे थे,
अपनी कलाई का
वो
वहीं अंदाज
लिये
जानें क्या इशारा किये
जाते थे,
कंगन भी खनक
उठा,
जरा आहिस्ते से
हाथ हिलाओ
कि जाग न जाए,
आँखों ने फिर
संसार देखा
आँखों में,
रात को
कोई
ख्वाब में
चाँद
जैसे मुखड़ा लिए
जानें मेरे आँगन में
यह
कौन चला आता है।।।
😍😍😍😍😍😍

@करन kk
5-5-2017__22_00PM

Pic borrowed from Google with due thanks

शुक्रवार, 28 अप्रैल 2017

Alone boy 21

आज कुछ रंगत
चेहरे की
उड़ी हुई लगती है,
साँस में
भी कुछ
बदहवासी सी लगती है,
कल कोई
ख्वाब बुना था,
आज आँख
सूनी सूनी
सी लगती है,
परेशान
इश्क की
परेशान दास्तां है,
हवाएं भी उसे
सहमी सी लगती है,
कोई रो रहा या
खामोश है युहीं,
हर बात उसे
कुछ बदली बदली
सी लगती है,
किसी की पुकार
पर वो
ऊठ बैठा है,
हर आहट
उसे आगमन सी लगती है,
मालुम उसे
वक्त के हर
दांव है मगर,
जिंदगी फिर
उसको अलमस्त सी लगती है।
©® जाँगीड़ करन kk
28_04_2017__20:00PM

बुधवार, 26 अप्रैल 2017

Morning song

Chipping of birds on the banyan tree,
Makes the environment light & free.

Always a poet listen these sounds,
Feel the voice of Merle with loving bounds.

As he looks the birds by the near,
Just feel presence of his fiance with sheer.

He just smile & pick up the pen,
Draw the scatch of her what he can.
©® KK
25_04_2017__6:00AM

सोमवार, 24 अप्रैल 2017

Alone boy 20

A boy
All in in alone
Goes to
A shop
At a
Fashion shop,
Just for
Watch out
What things
Are to be
Sold there.
But as he
Look
These things
He just think
About the MOON
Of his life.
He look the
Rings of glass,
& Just dream the
Soft hand of his
Partner,
Just imagine
How he will
Coat these
In her hand.
And how she
Will got
Gloom on her face
With blush.
And they
Both
Got
Addicted of
Each other
In attraction of
Hearts.
Just watch
In each other's eyes.
For
A long time.

Suddenly the shopkeeper
Ask the boy for
What he needed.
And in hurry
He just says
"A bunch of glass's rings"

©® जाँगीड़ करन kk
23_04_2017__19:00PM

शुक्रवार, 21 अप्रैल 2017

Alone boy 19

कि
सूरज
को देखो,
क्षितिज से उठकर
अपनी यात्रा पे
निकला है,
शायद किसी
साथ की
तलाश उसे भी है,
देखो तो
उसे
इस नीले
आसमान में
वो तन्हा ही
निकल पड़ा है,
हां,
उसे
मालूम भी है कि
उसे
अपना काम तो
करना ही है,
हां,
निगाहें अब भी
उसकी
क्षितिज की
ओर है,
कि
कब मिलन होगा,
और फिर जानती हो ना,
शाम हो जानी है,
ऐसे ही
मैं
सूरज की तरह
अनवरत
हुं,
जिंदगी की राह में,
तेरी तलाश में,
पर
डर
अब भी
है कि
मिलन से पहले
कहीं
जिंदगी की
शाम न हो जायें।
©® जाँगीड़ करन kk
21_04_2017__8:00AM

बुधवार, 19 अप्रैल 2017

Alone boy 18

महफिल में
देखो तो
चारों ओर
उल्लास है,
हर चेहरे
पे आज अलग
ही रौनक है,
यहां संगीत की
स्वर
लहरी गूंज रही है,
चारों तरफ
रोशनी का सैलाब है....
मगर कोई
यहां भी
उदास है,
खुद को
तन्हा तन्हा
महसूस
करता है....
उसकी आंखें
हर वक्त
इक शख्स की
तलाश में
इधर उधर
झाँकती है,
जानती है ये
भी
कि वो
यहां
नजर नहीं
आनी है.....
मगर उस
तन्हा
दिल के
पास
और कोई
चारा भी तो नहीं......
©® जाँगीड़ करन kk
19_04_2017__22:00PM

माँ

हर अहसास की आखिरी उम्मीद होती है माँ,
मेरी  ग़ज़लों  की  किताब  सी होती  है  माँ।

मेरी हर खता को नजरअंदाज कर जाती है,
मौसम की  पहली  फुहार सी होती  है माँ।

मेरी मुस्कराहट की तो दीवानी ही रहती है,
हर चोट  की  मगर  दवा  होती  है  माँ।

बिन मां के सुना सुना कितना यह संसार है,
हर ख्वाब की मगर तस्वीर तो होती है माँ।

हर शाम बस उदास सी लगती है करन,
अंधेरे में पीठ थपथपा रही होती है माँ।

©® जाँगीड़ करन kk
19_04_2017__5:30AM

सोमवार, 17 अप्रैल 2017

हिंदी की रसधार

तुम इंग्लिश की कड़वाहट हो,
मैं हिंदी की रसधार प्रिये।

तुम यम की दूत बनी बैठी,
मैं जीवन का आधार प्रिये​।

तुम शहर का फास्ट-फूड हो,
मैं शुद्ध देशी आहार प्रिये।

लड़ाई झगड़े की तुम नानी हो,
मैं हरदम करता करार प्रिये।

जहां जहां मैं खाई देखुंं,
भरता वहां मैं दरार प्रिये।

बस तेरी कमी ही रह गई है,
बिन तेरे मन भी है बेकरार प्रिये।

छोड़ो सारे भरम अब तो,
कभी कर लो तुम भी इकरार प्रिये।

Photo from Google due thanks

©® जाँगीड़ करन kk
17_04_2017___15:00PM

रविवार, 16 अप्रैल 2017

Alone boy 17

Suno,
देखो
यह रात
गहरी हुई जाती है,
तारे
कुछ तेज
चमकते से
दिखते हैं,
दूर कहीं
कोई
शहनाई बज रही
मन में
कोई
तरंग हिलौरे ले
रही,
और फिर
देखो ना,
आँखें
अब भी
एक टक
झाँक रही
आसमान की ओर,
किसी तारे की
मुस्कान के लिये,
देखो
जरा तुम भी
क्या तारा अभी
खिलखिला,
हां,
तो तुम्हें
अहसास होगा ना,
जिंदगी भी
इसी इसी
मुस्कान की
खातिर
कुछ ख्वाब बुनती है,
हां,
पुरे हुए तो
मुस्कान,
न हुए तो
उम्मीद
पर दुनिया
कायम है......
कहो नाम
साथ साथ
हां,
हम अब भी
अहसास के
बंधन
से
बंधे हैं.......
©® जाँगीड़ करन kk
16_04_2017__21:40PM

शनिवार, 15 अप्रैल 2017

Alone boy 16

Suno.

यह मंदिर
से आ रही
घंटी की
आवाज
जिंदगी के
स्वर को
झंकृत
करती है,
कि दिल में
कोई
हलचल सी
मचती है।
कब सुनाई
देगा
ऐसे ही
तेरे पैरों
से
पायल की
झंकार जो
सुन लुँ
तो दिल
को जैसे
शुकून
मिल जायें,
और
मेरी रातों
की
नींद
भी चैन से
आ जायें,
सुना नहीं तुमने,
कोई तुम्हारी
आहट
के इंतजार में
अब भी
दरवाजे को ताकता है,
हर शाम
युहीं
मंदिर की
घंटी के संग
तेरे ख्याल में
खोया
कोई अब भी.......

©® जाँगीड़ करन KK
15_04_2017__19:20PM

Alone boy 15

देखो
तो जरा
आसमान को
तारे तो
अपनी अपनी
जगह पर है,
मगर यह
चांद
जानें कहां
छुपा बैठा है,
न इसकी
फितरत
मालुम
न ही इसके
मन की व्यथा,
शायद खुद में
किसी
उलझन को....
अरे! ऊधर देखो
पूर्व में
चांद आया
थोड़ा
शरमा रहा,
शायद
इसलिए
लालिमा लिए है,
या
रूठा हुआ हो
शायद,
मगर देखो
तारें
को विश्वास है
कि
चाँद
आयेगा जरूर
अपनी छटा से
रात को
चमकायेगा जरूर...
©® KK
14_04_2017__22:50pm

सोमवार, 10 अप्रैल 2017

Alone boy 14

और
आज भी
वो तन्हा तारा
अपनी जगह
उसी ओर निगाहें जमायें
खड़ा है।
हां,
उस चमकीले तारे
की तरफ
कुछ उम्मीद है,
कुछ अहसास है,
कुछ जज्बात है,
और फिर
उसे फिक्र भी
कि
चमकीले तारे की
चमक
सही तो है,
या मन में
वो भी पीड़ा
लिए ही
तो नहीं चल
रहा कहीं.....
मगर चमकीले तारे की
अकड़ तो
देखो,
जानें क्या ठान के
बैठा है,
जानें कहीं ओर
क्या ढुंढता फिर रहा,
कभी मन की
क्यों
सुनता नहीं.....

©® जाँगीड़ करन kk
10/04/2017___21:30PM

गुरुवार, 6 अप्रैल 2017

गुमनाम तारा

रात गहरी है
चांद चमक रहा
मगर वो तारा
जानें कहां गया
देखो रात भी
उदास है
उस बिन
और शायर की
आँख तो
कब से
ढूँढ रही उसको,
हां, देर रात
वो
नजर आया फिर
बोला
मन उदास है
इसलिए
खुद को
छुपा लिया
अंधेरे में
कोई देख न ले,
इसलिए।
और तुम शायर भी
तो
यह करते हो,
खुद को डायरी से
बांधकर,
हां,
तुम बाहर कितना
मुस्काते हो,
सारी दुनिया को
झुठलाते हो,
मगर मैंने रात में
तुमको
तन्हा देखा है,
टेबल पर टिकी कोहनी
को
आँखें छुपाते देखा है,
बिस्तर की सलवटों में
इक वजूद को
खोते देखा है,
काली अंधेरी रात में
शायर को
जीते मरते देखा है।

©® जाँगीड़ करन kk
06/04/2017___02:30AM

A letter to swar by music 29

Dear SWAR, जीत  पर  तो ठीक है मगर हार  पे  क्या  पहरा  लगाना, चिड़िया चुरा लें ख्वाब जब फिर क्या कोई ख्वाब सजाना। ........ जिंदगी की भाग...