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यह मेरी दिवाली

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काली घटा है या लहराई जुल्फें उनकी,
यह इंद्रधनुष है या उठी पलकें उनकी।मेरे घर के बर्तन भी नाचने लगे है सब,
यह कैसी मदमस्त सी चाल है उनकी।सारा शहर रोशन हुआ है दिवाली पर,
जब रात को सूरत सबने देखी उनकी।फुलझड़ियाँ पटाखें सब धरे रह गये,
एक हँसी जब आई अधरों पे उनकी।मेरे ख्वाबों में वो पायल खनकाते है,
मेरी नींद से है शायद दुश्मनी उनकी।सीमाओं पर जो डँटे ही रहे है करन,
यह दीवाली कर दुँ मैं तो नाम उनकी।
©® जाँगीड़ करन kk
30/10/2016__6:00AM
फोटो- साभार इंटरनेट

धूल और जल

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मैं धरा की धूल विचलित सी
कहीं उड़ती फिरूँ,
बेखबर सी,
बेबस सी,
मैं चुभ रही
कितनी आँखों को।
बस तुम्हारी मोहब्बत की
बारिश का
इंतजार करूँ।
तुम बनके जल
बरस जाओ,
मैं जमीं पर
जम जाऊँ।
तुम बहना नदी में,
मैं संग तेरे सरका करूँ,
पहुँच जाऊँ मैं जब
समंदर में
कोई डर नहीं
फिर
तुम्हारे बिछुड़ने का
सदा के लिये
तुम वहाँ रहोगे
है ना....
ओ जल मेरे!!
मैं धरा की धूल,
तेरा इंतजार करूँ।
©® जाँगीड़ करन kk
29/10/2016//...7:00AM

ख्वाहिशें

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कहीं शौर से  जिंदगी  चलती है।
कहीं मौन अभिलाषा मचलती है। आदमी आदमी से ही खफा है यहाँ,
कहते सब यह जमाने की गलती है। दूर से देख चिंगारी आतिशबाजी की,
गरीब की आँखों में दीवाली जलती है। तुम जब से रूख्सत हुए हो शहर से,
हर इक शाम तब से उदास ढलती है। तुम्हें क्या मालुम उदासी क्या है करन,
हर रात में नींद मुझे हर पल छलती है।
©® जाँगीड़ करन kk
27/10/2016_5:00AM
फोटो- साभार गुगल

A letter to swar by music 12

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Dear SWAR,
First of all happy Diwali....
.........
हाँ तो तुम्हारे पिछले खत में तुमने सिर्फ एक खाली कागज भेज दिया था, शायद थोड़ी खफा हो या तुमने खत लिखा तो है मगर हड़बड़ी में कहीं वो रह गया हो और खाली कागज भेज दिया हो...... हो सकता है क्योंकि आजकल दीपावली की सफाई चल रही है और घर के सब सामान इधर ऊधर रखे जा रहे हो तो तुमने भी शायद भूल से कहीं रख दिया हो... तुम कितनी भूलक्कड़ हो यह तो मैं जानता हुँ। एक बार तुमने भूल से खत की जगह अपने घर का बिजली का बिल भी तो भेज दिया था... खैर ये छोड़ो.. मैं खाली पन्ने से भी तुम्हें पढ़ सकता हुँ.. तुमने कितने सलीके से इसे समेटा है.. पन्ने के ऊपर तुम्हें हाथ की रेखाओं के निशाँ.... पन्ने को समेटने का अंदाज...और पन्ने से आती एक दिलकश खुशबु..... काफी है मेरे समझने के लिये कि मोहब्बत तो तुम अब भी करती हो.... वो भी बेइंतहा...
.....
खैर... सुनो!! हम भी यहाँ दीपावली की सफाई में जुटे है.. दो तीन दिन से... कहते है कि साफ सफाई अच्छी हो तो लक्ष्मी जी जल्दी आयेंगे.. पर मुझे तुम(सरस्वती पुत्री) चाहिये... और तुम भी वैसे हमें खुश देखकर और साफ सफाई देखकर ही तो आओगी ना..…

तीसरा चाँद

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रोहित 35 वर्षीय प्रोढ़ घर में बिल्कुल अकेला रहता था। मुंबई मेट्रो सिटी में एक ऑफिस का वाईस मैनेजर था रोहित। काम का बोझ और ऊपर से अकेलापन वह उसे थका देता था।वैसे वह बहुत मजबूत इंसान था। ऑफिस से कभी व्यक्तिगत छुट्टी नहीं लेता था क्योंकि वह ज्यादा लोगों से संपर्क नहीं रखता बस घर से ऑफिस और ऑफिस से घर भी उसका था वह कभी किसी से मिलता जुलता नहीं था। लेकिन उस दिन रोहित को ऑफिस जाना शायद अच्छा न लग रहा था तो छुट्टी लेकर घर रूक गया। वो करवा चौथ का दिन था।  आज रोहित खुद को बहुत थका थका महसूस कर रहा था। सुबह का नाश्ता करके थोड़ी देर गार्डन में जा बैठा और चिड़ियों के कलरव को सुनने लगा रोज तो समय ही नहीं मिलता था गार्डन में जाने का इसलिये आज उसे यहाँ आकर बहुत सुकुन मिला। जिंदगी की उस भाग दौड़ से दूर यहाँ वो शांति से बैठा था। फिर कुछ देर बाद वो घर गया और टीवी ऑन कर दी।। टीवी पर समाचारों में करवा चौथ पर एक खास रिपोर्ट आ रही थी। इस फास्ट जमाने में त्यौहार के पारंपरिक तौर तरीकों पर चर्चा की जा रही थी। और यह सब देख कर रोहित रोहित भी जीवन के पंद्रह वर्ष पीछे की यादों में खो गया।......
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