रविवार, 30 अक्तूबर 2016

यह मेरी दिवाली

काली घटा है या लहराई जुल्फें उनकी,
यह इंद्रधनुष है या उठी पलकें उनकी।

मेरे घर के बर्तन भी नाचने लगे है सब,
यह कैसी मदमस्त सी चाल है उनकी।

सारा शहर रोशन हुआ है दिवाली पर,
जब रात को सूरत सबने देखी उनकी।

फुलझड़ियाँ पटाखें सब धरे रह गये,
एक हँसी जब आई अधरों पे उनकी।

मेरे ख्वाबों में वो पायल खनकाते है,
मेरी नींद से है शायद दुश्मनी उनकी।

सीमाओं पर जो डँटे ही रहे है करन,
यह दीवाली कर दुँ मैं तो नाम उनकी।
©® जाँगीड़ करन kk
30/10/2016__6:00AM

फोटो- साभार इंटरनेट

शनिवार, 29 अक्तूबर 2016

धूल और जल

मैं धरा की धूल विचलित सी
कहीं उड़ती फिरूँ,
बेखबर सी,
बेबस सी,
मैं चुभ रही
कितनी आँखों को।
बस तुम्हारी मोहब्बत की
बारिश का
इंतजार करूँ।
तुम बनके जल
बरस जाओ,
मैं जमीं पर
जम जाऊँ।
तुम बहना नदी में,
मैं संग तेरे सरका करूँ,
पहुँच जाऊँ मैं जब
समंदर में
कोई डर नहीं
फिर
तुम्हारे बिछुड़ने का
सदा के लिये
तुम वहाँ रहोगे
है ना....
ओ जल मेरे!!
मैं धरा की धूल,
तेरा इंतजार करूँ।
©® जाँगीड़ करन kk
29/10/2016//...7:00AM

गुरुवार, 27 अक्तूबर 2016

ख्वाहिशें

कहीं शौर से  जिंदगी  चलती है।
कहीं मौन अभिलाषा मचलती है।
आदमी आदमी से ही खफा है यहाँ,
कहते सब यह जमाने की गलती है।
दूर से देख चिंगारी आतिशबाजी की,
गरीब की आँखों में दीवाली जलती है।
तुम जब से रूख्सत हुए हो शहर से,
हर इक शाम तब से उदास ढलती है।
तुम्हें क्या मालुम उदासी क्या है करन,
हर रात में नींद मुझे हर पल छलती है।
©® जाँगीड़ करन kk
27/10/2016_5:00AM

फोटो- साभार गुगल

बुधवार, 26 अक्तूबर 2016

A letter to swar by music 12

Dear SWAR,
First of all happy Diwali....
.........
हाँ तो तुम्हारे पिछले खत में तुमने सिर्फ एक खाली कागज भेज दिया था, शायद थोड़ी खफा हो या तुमने खत लिखा तो है मगर हड़बड़ी में कहीं वो रह गया हो और खाली कागज भेज दिया हो...... हो सकता है क्योंकि आजकल दीपावली की सफाई चल रही है और घर के सब सामान इधर ऊधर रखे जा रहे हो तो तुमने भी शायद भूल से कहीं रख दिया हो... तुम कितनी भूलक्कड़ हो यह तो मैं जानता हुँ। एक बार तुमने भूल से खत की जगह अपने घर का बिजली का बिल भी तो भेज दिया था... खैर ये छोड़ो.. मैं खाली पन्ने से भी तुम्हें पढ़ सकता हुँ.. तुमने कितने सलीके से इसे समेटा है.. पन्ने के ऊपर तुम्हें हाथ की रेखाओं के निशाँ.... पन्ने को समेटने का अंदाज...और पन्ने से आती एक दिलकश खुशबु..... काफी है मेरे समझने के लिये कि मोहब्बत तो तुम अब भी करती हो.... वो भी बेइंतहा...
.....
खैर... सुनो!! हम भी यहाँ दीपावली की सफाई में जुटे है.. दो तीन दिन से... कहते है कि साफ सफाई अच्छी हो तो लक्ष्मी जी जल्दी आयेंगे.. पर मुझे तुम(सरस्वती पुत्री) चाहिये... और तुम भी वैसे हमें खुश देखकर और साफ सफाई देखकर ही तो आओगी ना...... चलो यह तो मैं बाद में और लिखता हुँ, पहले एक बात सुनो।।।
साफ सफाई के दौरान मुझे एक किताब मिली जिसमें कुछ कहानियाँ है तो उसमें से एक छोटी सी कहानी तुम्हें सुनाता हुँ.....
.....................................................
      "धीरे धीरे हो जायेगा प्यार बलिये".          

ये उस समय की बात थी जब भारतीय समाज कबीलों में बँटा हुआ था। अलग अलग भू प्रदेश पर अलग अलग कबीलों का साम्राज्य था। मगर चारों तरफ शांति थी, कोई कबीला एक दुसरे की सीमा पर अतिक्रमण नहीं करता। उसी समय के दौरान पर मेवाड़ में भी भील कबीले का आधिपत्य था, भील कबीले के सरदार किंजाल थे, वो बहुत ही विनम्र, प्रजा प्रेमी और वीर सरदार थे। उनके दरबार में एक प्रधानमंत्री थे जिनका नाम जयदीप था उनका एक लड़का था धनुष। धनुष के नाम की चर्चा चारों तरफ थी, क्योंकि वो बहुत ही बहादूर, होनहार और चपल बालक था, अभी उसकी उम्र मात्र पंद्रह वर्ष थी मगर अभी से उसमें राजसी लक्षण दिखने लगे थे, वो अपने पिता के साथ दरबार में आता रहता इसलिये था। राजा के दरबार में एक वैद्यराज थे कस्पल्य, जो बहुत ही पुराने राजवैद्य थे, दरबार के प्रति समर्पित, सेवा में तत्पर। इस उम्र में भी वो एकदम चुस्त रहते थे। इतनी फुर्ती देखकर ही सरदार ने आज कर उन्हें दरबार में बनायें रखा था। वैद्यराज और जयदीप के बीच अच्छी दोस्ती थी, दरबार में दोनों साथ आते थे , साथ बैठते थे।
.........
जब वैद्यराज ने धनुष को देखते तो उनके मन में एक विचार आता कि लड़का तो बड़ा ही कमाल का है क्यों न अपनी पौत्री नौबिता का विवाह इसके साथ ही कर दिया जायें। हाँ!!! नौबिता!!! अभी बारह साल की लड़की!! उसे गुड्डे गुड़ियाँ खेलने से ज्यादा मजा तो जंगल से बैर तोड़ने, तालाब के पानी में तैरने या गिलहरियों के पीछे पीछे दौड़ने में आता था, पूरे दिन जंगल की खाक छानती रहती थी, पेड़ पर चढ़ना तो उसके लिये जैसे बायें हाथ का काम था,बंदर से ज्यादा फुर्तीली!!
हाँ!!! तो वैद्यराज ने एक दिन जयदीप को अपना प्रस्ताव सुना दिया।। जयदीप ने पहले तो सोचा और फिर कहा कि इससे बढ़िया बात तो कुछ हो ही नहीं सकती। हमारी दोस्ती रिश्ते में बदल जायें यह तो अहोभाग्य होगा मेरा। अब बात बच्चों को समझाने की थी क्योंकि उस कबिलाई जमाने में शादी ब्याह का मामला वर्तमान समाज के जैसा था बच्चों की पसंद के बगैर शादी नहीं की जाती थी तो तय हुआ कि दोनों को साथ साथ खेलने का मौका दिया जायें!!
और दुसरे दिन नौबिता भी दरबार में थी, दोनों को कहाँ गया कि आप लोग शाही बगीचे में खेलने जा सकते है। दोनों ने एक दुसरे को खा जाने वाली नजरों से देखा और फिर चल दिये। वहाँ जाकर खुद में व्यस्त हो गये। एक दुसरे पर बिल्कुल ध्यान न देते थे। दुसरे दिन भी वापस वहीं। फिर एक दिन नौबिता के सामने एक काला सर्प आ गया। और उस समय उसके पास कुछ नहीं था। वो निडर तो थी मगर निहत्थे क्या करती। जोर से चिल्लाई।। धनुष दौड़ कर आया तो देखा कि फन किये बिल्कुल सामने बैठा है नाग तो नौबिता के। धनुष ने बिना ज्यादा सोचें दूर से ही लकड़ी को हवा में लहराकर उस तरफ फेंक दी। एक सधा हुआ निशाना और तीव्र गति का। सर्प एक ही पल में दूर जाकर झाड़ियों में जा गिरा। और नौबिता के आश्चर्य का ठिकाना न रहा। उसने धनुष को धन्यवाद कहा और चलती बनी
पर अब वो थोड़ी बदल गई थी, अब वो रोज धनुष के साथ ही खेलती और पुरे दिन उसके साथ ही रहती।
हाँ... पर अब भी वो कम ही बोलती! न जानें क्या? उसके मन में क्या चलता था! क्या सोचती थी पता नहीं।। अक्सर धनुष उससे किसी न किसी बहाने से बात करने की कोशिश करता पर वो बात को बदल देती और उल्टा धनुष उसकी उल्टी सीधी बातों में ही ऊलझ कर रह जाता।। क्योंकि इतना साथ खेलने से और साथ रहने से धनुष को शायद नौबिता के प्रति लगाव हो गया था पर नौबिता के द्वारा ज्यादा बातचीत न करने से वो अपने मन की बात नहीं कह पाता। पर वो मौका ढुँढ रहा था कि कभी तो उसकी बात सुनेगी।।
और फिर इधर सरदार के पुत्र के जन्मदिवस पर एक शानदार कार्यक्रम रखा गया, जिसमें धनुष ने बहुत ही अच्छा नृत्य प्रस्तुत किया उसका नृत्य देखकर नौबिता तो जैसे बिल्कुल हतप्रभ रह गई। उस समय उसने सिर्फ यहीं कहाँ, "गज्जब"....
अगले दिन जब वापस बाग में धनुष पहुँचा तो नौबिता वहाँ पहले से बैठी थी, धनुष ने जाकर पुछा क्या हुआ?
नौबिता बोली, "अरे!! मैं तुम्हारा इंतजार ही कर रही थी, तुम इतनी देर से आयें!! क्यों?
धनुष थोड़ी देर तो नौबिता को ही देखता रहा कि आज सूरज पश्चिम में कैसे ऊग गया? पर अगले ही पल संभलकर बोला आज बाबा को कुछ काम था घर पे थोड़े लेट हो गये।।
"ओहो!! मैं कब से यहाँ बैचेन हुँ तुम्हारे लिये!!"
"बैचेन!! क्युँ क्या हुआ?"
"तुम ना बुद्धु ही रहोगे!! लड़कों का दिमाग कहाँ चलता है, चलो बाद में बताऊँगी"
"बुद्धु"!!! धनुष जानबुझकर बोला और फिर कहने लगी, " चलो खेलते है"
"नहीं!! आज तुम मुझे नृत्य सीखाओगे?" नौबिता ने खड़े होकर कहा।
"नृत्य!!!!! और यहाँ!! कैसे भला।। न साज बाज है न गायक!!"
"वो गाने का काम मैं कर लुँगी, बिन साज बाज के ही केवल भाव भंगिमा ही सीखा दो, कदमताल में घर पे सीखुँगी।" नौबिता ने कहा।
"ओहो!! ठीक है फिर!! कोशिश करते है"
....... नौबिता ने जैसे ही गाना शुरू किया तो धनुष नाचने की बजाय उसे देखने लगा।
इतनी मधुर आवाज में गाना उसने कभी नहीं सुना था। इसलिये धनुष तो उसे ही देखे जा रहा था। नौबिता ने जब देखा कि धनुष नहीं नाच रहा तो नहीं भी रूक गई और बोली तुम नाच नहीं रहे हो?
धनुष थोड़ा मुस्कुराया और बोला चलो अब अब नाचेंगे। नौबिता फिर गाने लगी तो धनुष इस बार नाचने लगा। नौबिता ने जब नृत्य देखने लगी तो गाने में उसे और भी मजा आने लगा। इस तरह दोनों अब ऐसे गाने बाने में समय बिताते। और दोनों के बीच नजदीकियाँ बढ़ने लगी। पर कभी एक दुसरे को कुछ न बोलें। दोनों के मन में जानें क्या शंका थी।
और फिर धनुष को तो दरबार में ही प्रहरी बना दिया गया। अब उसके खेलने कूदने के दिन नहीं थे, रोज सुबह से शाम तक दरबार में उपस्थित रहता। इधर नौबिता भी घर के का में व्यस्त रहने लगी।
और वक्त युहीं गुजरता गया। और दोनों की उम्र विवाह लायक हो गई।
एक दिन फिर नौबिता के घर पर उसके दादाजी ने चर्चा की कि नौबिता ब्याह लायक हो गई है अब उसका ब्याह कर देना चाहिये। जब दूर खड़ी नौबिता ने सुना तो चेहरा उतर गया, जाने कहाँ ब्याह होगा, धनुष से दूर कैसे रहेगी, घरवालों के कैसे कहुँ कि धनुष से शादी करनी है(लाज आ रही थी), इसलिये वो बैचेन हो गई। पर फिर भी वो चुपचाप सुनने लगी।। दादाजी ने आगे बताया कि प्रधानमंत्री जी का बेटा है इसके लायक है और दोनों एक दुसरे को जानते भी है, इसलिये अगर नौबिता हाँ कर दें तो बस पक्का कर दें।
नौबिता ने जब सुना तो उसका चेहरा लाज से बिल्कुल गुलाबी हो गया, और मारे खुशी के आँसु आ गये। उसे अचानक कुछ न सुझा और दूर से ही चिल्ला पड़ी, "हाँ"
और सुनते ही घर में हँसीं का फँवारा छूट पड़ा। हँसी सुनकर नौबिता को और ज्यादा लज्जा आ गई और वो वहाँ से भाग गई।
और फिर रस्मों रिवाजों के साथ ही नौबिता धूमधाम के साथ विदा हुई अपने ससुराल के लिये। ब्याह में सरदार द्वारा भोज की व्यवस्था की गई थी क्योंकि वैद्यराज दरबार के सबसे वरिष्ठ और हितैषी थे।
अपने नये घर(ससुराल) में आई तो नौबिता को जरा सी असहजता महसूस हुई। क्योंकि स्वच्छंद रहने वाली लड़की घर के बंधनों में बंद गई। धनुष तो पूरे दिन दरबार में रहता, घर पे शाम को लौटता। अब भी नौबिता और धनुष एक दुसरे को मन की बात न कह पायें थे। काफी दिनों तक युहीं चलता रहा।
फिर एक दिन शाम को धनुष ने जब नौबिता को अकेले देखा तो पास जाकर धीरे से कहा, " क्या हुआ!! तुम इस शादी से खुश नहीं हो क्या?"
"खुश!! खुश ही तो हुँ!! वो तो दिनभर काम से थक जाती हुँ तो तुम्हें ऐसा लगता होगा। खैर छोड़ो!! तुम थक गये हो सो जाओ!!"
और धनुष के पास अब कोई जवाब नहीं बन रहा था.... सो गया।
अब धनुष भी उदास हो गया कि क्या करें। एक दिन उसने देखा कि राजकुमार के लिये अनेक तौहफे लायें गये है जो अच्छे से सजा रखे है। इससे धनुष के दिमाग में भी विचार आया क्यों न नौबिता को सरप्राइज दिया जायें। उसने फिर शाम को घर आते वक्त बाजार से लाख के दो सुंदर कंगन खरीदें और जेब में रख लिये। हमेशा की तरह घर आकर खाना खाकर सो गया(नींद नहीं थी, बस नाटक).....
सब कामकाज निपटाकर जब नौबिता उसके पास आकर सो गई और आँखें बंद की तब धनुष ने जेब से कंगन निकालें और नौबिता के का में के पास खनकाया...
नौबिता चौंक गई। आँखें खोली पर कुछ न दिखा। कुछ सोचकर फिर सो गई। फिर से उसके कानों में वहीं आवाज आई। फिर आँखें खोली तो आँखों के सामने कंगन थे जो धनुष के हाथों में बिल रहे थे। नौबिता ऊठबैठी। और हाथ से छीनकर बोली," ये मेरे लिये है!!!! तुम लायें हो?"
"हाँ, हाँ!! तुम्हारे लिये है!! पहनो तो सही"
नौबिता ने वापस धनुष को देकर कहाँ, "नहीं!!! तुम्हीं पहनाओगे तो पहनुँगी, वरना नहीं।"
और फिर धनुष ने पहली बार नौबिता के हाथ को प्रेमपुर्वक पकड़ा और कंगन पहनायें। उस समय नौबिता की खुशी का कोई ठिकाना न रहा। और उसने धनुष को गले लगाकर कहा कि तुम कितने अच्छे हो।
और फिर तो उनकी प्रेम की गाड़ी पटरी पर दौड़ने लगी.....
.....................
हाँ!!!! तो यह थी एक कथा जो मैनें बहुत सालों बाद पुन: पढ़ी थी कल। और तुम्हें सुना रहा हुँ।।देखो तुम सोचकर देखो कि कैसे उन दोनों के बीच प्रेम के बीज पैदा हुए। कभी तुम भी अपने मन यह उत्पन्न करके देखो!! अपने दिल में फिर वो दिन याद करके तो देखो।। मुझे मालुम है तुम भी अपने घर की सफाई में व्यस्त हो, मगर काम के बाद भी समय तो रहता ही है। खैर!! तुम्हारी मरजी?? बाकी हम तो युहीं तंग किया करेंगे, अपने खतों के जरिये।
हाँ!! हल्की हल्की तुम्हारे गालों सी गुलाबी ठंड शुरू हो गई है, अपना ख्याल रखना और खता का जवाब जल्दी देना.....
.......
With lots of love..
Yours
MUSIC
......
©® जाँगीड़ करन kk
26/10/2016_5:00AM

शुक्रवार, 21 अक्तूबर 2016

तीसरा चाँद

रोहित 35 वर्षीय प्रोढ़ घर में बिल्कुल अकेला रहता था। मुंबई मेट्रो सिटी में एक ऑफिस का वाईस मैनेजर था रोहित। काम का बोझ और ऊपर से अकेलापन वह उसे थका देता था।वैसे वह बहुत मजबूत इंसान था। ऑफिस से कभी व्यक्तिगत छुट्टी नहीं लेता था क्योंकि वह ज्यादा लोगों से संपर्क नहीं रखता बस घर से ऑफिस और ऑफिस से घर भी उसका था वह कभी किसी से मिलता जुलता नहीं था। लेकिन उस दिन रोहित को ऑफिस जाना शायद अच्छा न लग रहा था तो छुट्टी लेकर घर रूक गया। वो करवा चौथ का दिन था।  आज रोहित खुद को बहुत थका थका महसूस कर रहा था। सुबह का नाश्ता करके थोड़ी देर गार्डन में जा बैठा और चिड़ियों के कलरव को सुनने लगा रोज तो समय ही नहीं मिलता था गार्डन में जाने का इसलिये आज उसे यहाँ आकर बहुत सुकुन मिला। जिंदगी की उस भाग दौड़ से दूर यहाँ वो शांति से बैठा था। फिर कुछ देर बाद वो घर गया और टीवी ऑन कर दी।। टीवी पर समाचारों में करवा चौथ पर एक खास रिपोर्ट आ रही थी। इस फास्ट जमाने में त्यौहार के पारंपरिक तौर तरीकों पर चर्चा की जा रही थी। और यह सब देख कर रोहित रोहित भी जीवन के पंद्रह वर्ष पीछे की यादों में खो गया।......
..................
कॉलेज की b.com प्रथम वर्ष की क्लास में वो सबसे होशियार छात्र था, यहाँ तक की लेक्चरर भी उसकी बुद्धिमता और प्रतिभा से हैरान थे, हर सवाल का जवाब जैसे ऊँगलियों पर था उसके। उसी की क्लास में एक लड़की पढ़ती थी रवीना।। आवाज की मल्लिका।। कॉलेज की स्वागत  सेरेमनी में ही उसकी आवाज ने सब पर जादु कर दिया। वो कॉमर्स की पढ़ाई के साथ साथ संगीत सीखती थी इसलिये पहले दिन ही स्टेज से एक गीत सुनाया। कॉलेज का हर लड़का उससे दोस्ती करना चाहता था। पर क्योंकि रवीना अमीर घर की लड़की थी और रोज सुबह नौकर कार से छोड़ने आता और शाम को छुट्टी से पहले बाहर गाड़ी तैयार रहती इसलिये वो किसी से ज्यादा मिलती जुलती नहीं। फिर क्लास में जब उसने रोहित की प्रतिभा देखी तो हैरान रह गई। क्योंकि रवीना पढ़ाई में औसत थी तो उसने रोहित से हेल्प लेनी शुरू कर दी। और उनमें दोस्ती हो गई। अब वो अक्सर कॉलेज केंटिन में साथ साथ चाय पीते मिल जाते थे। बस वहाँ बातें सिर्फ पढ़ाई पर या संगीत पर होती थी। फिर एक दिन रवीना ने कहाँ कि रोहित तुम्हारे नंबर तो दो ताकि मैं जरूरत पड़ने पर सवाल पूछ सकुँ!!
रोहित ने कहा कि रोज तो मिलते है यहीं पूछ लेना। पर रवीना न मानी और नंबर ले लिये!! समय युहीं निकल रहा था और परीक्षा नजदीक आ गई।। रोहित अब और भी ज्यादा गहनता से मेहनत करने लगा। अब कॉलेज नहीं लगता था सब घर पे ही पढ़ते थे। रवीना भी अक्सर हेल्प के बहाने रोहित से फोन पर बात करती थी क्योंकि उसे रोहित के बिना कुछ अच्छा नहीं लगता था,
फिर वैलेंटाइन डे की सुबह रोहित के पास रवीना का मैसेज आया, "मैं तुम्हारे कमरे पर आ रही हुँ ,तुमसे मिलना है" एक बार तो रोहित को आश्चर्य हुआ पर अगले ही पल वो संभल गया और रिप्लाई दिया, "रवीना!! पढ़ाई नहीं कर रही हो?"
और फिर तो फोन की घंटी बजी नंबर रवीना के थे, रोहित ने कॉल अटेंड किया तो सामने से आवाज आई, " बुद्धु पढ़ाई तो करनी ही है, और सुनो मैं तुमसे मिलने आ रही हुँ, पापा को बोल दिया है कि कुछ सवाल समझने है"
रोहित कुछ समझ नहीं पा रहा था बस इतना सा बोला, "आ जाना"
और वो भी बैचेन अब पढ़ाई से मूड हट गया था कोई घंटे भर बाद एक गाड़ी उसके कमरे के बाहर आकर रूकी। उसकी धड़कन बढ़ गई थी। उसने कमरा खोला तो बाहर रवीना गाड़ी से उतर रही थी और आज खुद ही गाड़ी चलाकर आई थी। रवीना को अंदर बुलाया। और रवीना को आज एक अलग ही स्पेशियल रूप में देख कर रोहित बस यहीं बश सका, " आज तो तुम बहुत सुंदर लग रही हो"
रवीना ने कहाँ, " तुम बुद्धु ही रहोगे" कहते हुए ही रोहित का हाथ पकड़ लिया। रोहित को डर लगा पर रवीना ने आगे कहाँ, " देखो रोहित!! मुझे तुमसे प्यार है, मैं तुम्हारे बगैर नहीं जी सकती हुँ, और मैं तुमसे ही शादी करूँगी किसी और से नहीं।
पर रोहित ने हाथ छुड़ाया और उदास मन से नीचे बैठ गया।
रवीना बोली, "क्या हुआ रोहित"
रोहित ने नजरें नीचे रखते हुए ही कहा, " मैं एक गरीब परिवार से हुँ और तुम अमीर घराने से, यह जमाना हमें एक होने देगा क्या? तुम इस गरीब को युँ झुठे ख्वाब मत दिखाओ।। हाँ!! हम अच्छे दोस्त है और रहेंगे।"
रवीना अब उसके पास ही बैठ गई और बोली कि तुम क्या सोचते हो कि मैं झूठ बोल रही हुँ, अरे!! सच्ची में तुमसे प्यार करती हुँ और तुम मुझे समझ ही नहीं रहे हो।

रोहित बोला, " मैं तुम्हें समझ रहा हुँ, पर तुम शायद जमाने की हकीकतों से अनजान हो, और तुम्हारे पापा मान जायेंगे क्या?"
"मैं मनाऊँगी उन्हें!! तुम उनकी चिंता करे।। मैं उनकी लाडली बिटिया हुँ।। और रोहित मैं तुम्हारे बिना नहीं जी सकती। प्लीज!!" रवीना लगभग रो पड़ी।
रोहित बोल पड़ा," अरे पागल प्यार तो मुझे भी है तुमसे और बहुत ज्यादा मगर इसी डर की वजह से आज तक कहा नहीं मैनें।"
रवीना ने चेहरे पर मुस्कान बिखेरते हुए कहा कि सच्ची?
"हाँ!! और तुम्हारी आवाज ने तो जादु करके रखा है मेरे दिल पर बस डर की वजह से कभी कहाँ नहीं। और मैं अब तुम्हारे प्यार के साथ तुम्हारे और ज्यादा मेहनत करूँगा ताकि  अच्छी जॉब मिल सकें।"
रवीना ने रोहित के सर पे एक किस किया और कहा कि चलो आज बाहर चलते है कहीं। रेस्टोरेंट पर।
रोहित बोला, "अरे!! कहीं नहीं!! आज तुम पहली बार कमरे पे आई हो!! यहीं चाय पीते है और चाय मैं बनाऊँगा।"
रवीना हँस पड़ी और बोली, "जी हुजुर"
और फिर दोनों ने चाय पी ।।
अब रवीना बोली कि मुझे चलना चाहिये काफी देर हो चुकी है घरवाले भी चिंता करेंगे।
और कार से रवाना हो गई। रोहित एकटक उस ओर देखता ही रहा!! पता नहीं कब तक खड़ा रहा।। फिर फोन की घंटी बजी तो अंदर आकर देखा कि रवीना का ही कॉल है, अटेंड करते ही आवाज आई ,"घर पहुँच गई हुँ, बाद में मिलते है"!
और फोन कट गया..... और रोहित भी वापस पढ़ने बैठ गया, जैसे आज ही सब कुछ सीख जायेगा। अब तो जुनुन सवार हो गया था उस पर.........
प्रथम वर्ष में रोहित ने क्लास टॉप की और रवीना का भी पाँचवा स्थान था।। और आगे की क्लास में भी दोनों के बीच प्यार मोहब्बत की बातें चलती रही... वक्त को जैसे पंख लग गये थे!!
B.com फाइनल इयर में नवंबर महीने में रवीना के लिये एक रिश्ता आया, लड़के के पिता का खुद का बिजनेस था और बहुत ईज्जतदार घराना था, लड़का भी सुंदर था। रवीना के पापा ने रवीना से पूछा तो उसने मना कर दिया और पहली बार पापा को बताया कि उसे रोहित से प्यार है और उसी से शादी करना चाहती है।
यह सुनते ही उसके पापा को गुस्सा आया और उस दिन से रवीना का कॉलेज छूट गया!! फोन, गाड़ी सब कुछ छीन लिया गया!! बस एक कैदी की तरह घर में ही समय बिताना था।
इधर रोहित को जब रवीना कई दिन नजर न आई और न कॉल आया तो परेशान हो गया और कॉल किया तो भी फोन बंद बताया। रोहित बहुत चिंतित हो गया पर कर भी क्या सकता था, रवीना की सहेलियों से भी पूछा मगर सब यहीं बोली कि कहीं नजर नहीं आई। अब परेशान रोहित ने कॉलेज जाना भी छोड़ दिया और न उसका मन पढ़ाई में लगता। बस कमरे पे पुरे दिन उदास उदास सा सोया रहता।
फिर जनवरी में फोन पर एक अनजान नंबर से मैसेज आया।
"सॉरी रोहित!! मैं मजबूर हुँ, इतनी मजबूर कि तुमसे एक बार मिल भी नहीं सकती! और मार्च में मेरी शादी है। हो सकें तो माफ कर देना!! और मैसेज का रिप्लाई मत करना क्योंकि यह बड़े भाई के नंबर है!!"
रोहित के पाँवों तलें कि जमीन खिसक गई हो जैसे!! वो बिस्तर में ही मुँह छुपाकर रोने लगा। लगभग पुरे दिन रोता रहा।। फिर जानें कब नींद आ गई, भूखे पेट ही.......
सुबह जब दूधवाले ने आवाज लगाई तो नींद खुली!!!
अनमने मन से चाय पी पर आँखें लाल होने से अब भी उसे नींद सी महसूस हो रही थी और मन में जानें क्या ऊथल पुथल था।। फिर भी कोशिश करके नहाकर कॉलेज की तरफ रवाना हुआ बिना कॉपी पेन किताब के। बस वहाँ जाकर केंटिन में एक चेयर पर बैठकर न जानें क्या सोचता रहा फिर ऊठकर वापस कमरे पर।। और अब उसके हाथ में किताब थी।। पढ़ने में मन नहीं लग रहा था मगर शायद कुछ संकल्प करके बैठा था बस लगातार किताब को ही घूर रहा था.....
और इसी बीच वक्त गुजरता रहा और फाइनल इयर की परीक्षा आ गई... रोहित ने बहुत कोशिश की पर पेपर बिगड़ गये।। और रिजल्ट में पिछड़ गया।। फिर भी नहीं घबराया!! आगे पढ़ाई जारी रखी।।
और दो साल बाद ही मुंबई की एक प्रसिद्ध कंपनी में जॉब लग गई।।.......
.........
और दस साल बाद वो उस कंपनी का वाइस मैनेजर था। और कंपनी के मैनेजर ( स्वयं मालिक ) के कोई संतान न थी काफी उम्र का था वो तो कंपनी का सारा लेनदेन और कामकाज रोहित के जिम्मे था।......
..............
और पुरानी यादों में खोयें रोहित की आँखें नम हो गई थी। टीवी ऑफ किया ही था कि अचानक से मोबाइल की घंटी बजी, कोई अनजान नंबर थे। बैमन से कॉल अटेंड किया तो ऊधर से एक सुरीली आवाज आई, "हैलो!! इज दिस रोहित"....
और आवाज सुनते ही रोहित की आवाज ही रूक गई, हृदय की धड़कन सी गई, वो सुन्न हो गया।
फिर से आवाज आई फोन पर , "क्या आप रोहित बोल रहे है"?
रोहित की तंद्रा टुटी तो कहा जी हाँ!! रोहित बोल रहा हुँ।। और तु!!! तु! तुम!! तुम रवीना हो ना!!?
"अरे!!! तुम मेरी आवाज पहचानते हो अब भी!!" ऊधर से आवाज आई।
"हाँ!! तुम्हारी आवाज कैसे भूल सकता हुँ मैं, रोज ही तो तुम्हारी आवाज में गानें सुनता हुँ। पर तुम्हें नंबर कहाँ से मिलें।"
"नंबर तो!!! परसों एक मीटिंग थी ना!! तुम भी थे वहाँ!! उस मीटिंग में,. मैं अपने हजबेंड के साथ आई थी गेस्ट रूम में थी मैं, जब तुम्हारी आवाज सुनी तो जानी पहचानी आवाज लगी इसलिये बाहर से ही देखा कि तुम बोल रहे हो!! मैं तुम्हारे मैन्जमेंट फंडे की कायल हो गई।। कितने बढ़िया सुत्र बता रहे थे, फिर घर जाकर मीटिंग की फाइल देखी तो तुम्हारा नाम और और नंबर मिलें।"
"ओहो!!! वो तो छोड़ो।। सुनाओ कैसी हो?"
"ठीक है!! तुम सुनाओ!! और यह क्या है!! तुमने शादी नहीं की अब तक!! तुम्हारी फेसबुक प्रॉफाइल देख रही हुँ।। सिर्फ शायरी, गीत, कवितायें।। शायर बन रहे हो शायद।"
"ह ह ह ह!! अरे!! शादी करके भी क्या करना है।"रोहित ने ठहाका लगाया।
पर ऊधर रवीना शायद बहुत सीरियस हो गई और बोली, "तुमने मुझे माफ नहीं किया शायद"
रोहित ने हँसी कंट्रॉल करते हुए कहा," माफ!! अरे तुम्हारी क्या गलती है जो माफी चाहिये। तुम मस्त रहा करो।। टेंशन नहीं लेना।"
पर रवीना को यह जवाब अच्छा नहीं लगा, वो बिल्कुल रोते हुए कहने लगी, " प्लीज रोहित!! मान जाओ। मुझे समझ आ रहा है तुमने मेरी वजह से ही शादी नहीं की है, पर मैं मजबूर थी..."
रोहित ने बात बीच में काटते हुए कहा कि नहीं!! नहीं रवीना!! मैं तुमसे नाराज नहीं हुँ ।। पर मैं शादी नहीं करूँगा? तुम मजबूर हो जो तुम्हें शादी करनी पड़ी, पर मैं नहीं। बस निकल जायेगी युहीं जिंदगी।
रवीना बोली, " ओके रोहित!! आज करवा चौथ है। मैं शाम को व्रत खोलते समय तुम्हारी भी लंबी उम्र की दुआ करूँगी!! ओके फोन रखती हुँ पतिदेव आ गये है।"
फोन कटने पर रोहित कुछ देर खड़ा जानें क्या सोचता रहा फिर गाड़ी लेकर निकल पड़ा।
....…....
दुसरे दिन अखबार में खबर छपी जिसकी हैडलाइन ली-- कार एक्सीडेंट में प्रसिद्ध कंपनी के वाइस चैयरमेन की मौत।
©® जाँगीड़ करन kk
20/10/2016

Alone boy 20

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