मंगलवार, 27 दिसंबर 2016

Alone boy 2

#Alone_boy_2
एकांत में एक लड़का
पढ़ाई की मेज पर
हाथ में
दर्पण
लिये बैठता है।
और दर्पण में
देखता है,
सिर्फ अपने
बालों को।
ढुँढता है इनमें
एक दो
सफेद हुए बाल।
जब उखाड़ लेता है
वो बाल तो
हाथ में ले कर
गौर से
देखता है
सोचता है
काल के उस
खंड को
जिसने
सफेद किया इसको।
सोचता है उस वजह को
जिसके कारण
बाल सफेद हुए.....
जानता है वो
कि
इससे
सफेद बाल और बढ़ने है......
फिर भी,
एकांत में
सोचता है.....

#एकांत_मैं_लड़का

@जाँगीड़ करन

सोमवार, 26 दिसंबर 2016

Alone boy 1

#alone_boy

एकांत में
समंदर किनारे बैठकर
एक लड़का सोचता है,
जिंदगी के पिछले पन्नों को।
समंदर की लहरों के
आने जाने की
गति में ढुंढता है...
खुद को,
सपनों को,
हर लहर से
काल के एक खंड की
कल्पना करता है,
और ज्युहीं लहर
वापस जाती है तो
अपने गाल से उस
लहर के निशान को मिटाकर।
चल देता है घर,
सुना है कि वो हँसता बहुत है...
हाँ!!! अब
फिर से कोई सपना बुना है शायद...
कल फिर समंदर किनारे आना है उसे!!
#एकांत_मैं_लड़का

@जाँगीड़ करन

रविवार, 25 दिसंबर 2016

A letter to swar by music 15

Dear SWAR,

तराना मोहब्बत का सीखने निकला हुँ,
फिर मंजिल से दूर फिसलने निकला हुँ।
होठों के मिलन से जिंदगी की मदहोशी,
कोई महफिल ऐसी सजाने निकला हुँ।।"

देखो इधर साल का अंतिम सप्ताह चल रहा है और साल 2016 को मैंने अपनी जिंदगी का सबसे खराब साल पाया था, जहां साल में पूरे समय सिर्फ बेबसी दिखाई दी और कहीं कुछ टूटती आस ही दिखाई दी। मगर इस अंतिम सप्ताह में जिंदगी को कुछ नया देखने को मिला। हाँ।। हर वक्त खोया खोया रहने वाला मैं शायद तुम्हारे होठों पर छाने लगा हुँ। और मैं वर्तमान में जीने वाला इंसान हुँ आगे क्या होगा फर्क नहीं पड़ता। बस तुम्हारी चेहरे पर मुस्कान अच्छी लगी और पुराने नटखटपन वाले दिन याद आने लगे हैं। और मैं इस पल को जीना चाहता हुँ।
तुम जानती हो ना मैंने इंतजार भी किया है इस दिल के लिए, इस एक पल के लिए इतना लंबा इंतजार किया है। जबकि यह पल गुजर जाएगा थोड़ी ही देर में और फिर वापस बचेगी वहीं बेबसी और इंतजार। मगर मैं इस पल को जीना चाहता हुँ, इसे सजाना चाहता हुँ अपनी कल्पना से सजाना चाहता हुँ ताकि यह पल सदियों तक याद रखा जायें। जहां की हर जुबां पर यह पल छा जायें।
हाँ!!! तुमने ठीक सुना था बिल्कुल...
What?? What what  मत करो साहिबा,  हम यही कह रहे थे सच्ची।।। अब आँखें फाड़ फाड़ के दीवार को घूरना बंद करो, यह आदत है तुम्हारी जानता हूं मैं।।।
और पिछले खत में तुमने कहा कि मैं बदल गया हुँ। लेकिन मेरी जाना!!! मैं नहीं बदला हुँ, मैं आज भी वहीं संगीत हुँ जो सिर्फ तुम्हारे सुर पे बजता हुँ।।
और सुनो!!! मैं वो संगीत हुँ जिसे तुम हर जगह महसूस करोगे, अपने दिल में, घर के आंगन में, खेत की मेड़ पर, या झील के किनारे।।।
कभी आकाश में तारों के बीच मुझे देख पाओगे तुम।।
.......
और!!! सुनो कल कमरे में सामान व्यवस्थित कर रहा था तो कुछ ग्रीटिंग कार्ड्स मिलें हैं, करीब 3 साल हो गए हैं तुम्हारे लिए लाया था,  लेकिन आज तक उन पर कुछ नहीं लिख पाया, तुमने मौका ही नहीं दिया कि मैं कुछ लिखकर तुम्हें दुँ।  हाँ !! बड़े करीने से सजाकर आलमारी में रखें हैं। देखो अगर आकर ले जा सको तो।
और हाँ!!! इनकी एक प्यारी सी तस्वीर खींची है, पत्र के साथ भेज रहा हुँ।
........
तो सुनो पार्टनर!!!
तुम एक बार आओ ना!! फिर से।।
अरे!!!
सुन लिया तुम्हें बहुत काम है, मैं कह तो रहा हुँ कि मैं हेल्प कर दुँगा, तुम आओ तो सही।।
क्या कहा??
लोग क्या कहेंगे!!!
तो सुनो!! कोई कुछ कहे मुझे फर्क नहीं पड़ता है अब।। क्योंकि मैं जिस राह पर निकला हुँ, उसका परिणाम पहले ही मालूम कर चुका हुँ।। और मैं यह जानबुझकर कर रहा हुँ, शायद दिल की भी यही इच्छा है----

          "  किसी सुनी राह पर
              मुसाफिर
              फिर मिलो तो सही.......
              किसी पेड़ की
              छांव में
              उधड़ते ख्वाब सिलो तो।।"

With love & good regards
Yours
Music

©® जाँगीड़ करन kk
25_12_2016____5:00 evening

गुरुवार, 22 दिसंबर 2016

करार

बिन उसके उस पर एतबार कर लुँ,
बंद आंखों से उसका दीदार कर लुँ।

सासों का लश्कर बोलता है जहां तो,
धड़कनों का तुझसे इकरार कर लुँ।।

इक बार गर आ जायें सामने फिर वो,
हद से भी ज्यादा में उनसे प्यार कर लुँ।

जानें  को जब  जब वो हो जायें आतुर,
मैं खुद को मिलनें को बेकरार कर लुँ।।

कोई बात है जो दिल में चुभती है करन,
ग़ज़ल के स्वर से अब मैं करार कर लुँ।।
©® जाँगीड़ करन kk
22_12_2016___07:20 morning

सोमवार, 19 दिसंबर 2016

इक शायर

घर में रहकर बेघर होता है,
शायर शहर शहर होता है।

सबकी वाही वाही लूटकर
अकेले  में  मगर  रोता  है।।

लोग जिन्हें लफ़्ज समझते,
छालों का वो सफर होता है।

आज यहाँ कल देश पराया,
जानें  कब  किधर होता  है।

शांत समंदर के बैठ किनारे,
खुद  में  वो लहर  होता है।।

किस कश्ती की करूँ सवारी,
कैसा  हरदम  भरम होता है।

जिंदगी तो बन गई है करन,
बस होठों पर तो स्वर होता है।
©® जाँगीड़ करन kk
19_12_2016____7:30morning

शुक्रवार, 16 दिसंबर 2016

आशीर्वाद

और जैसे ही डॉक्टर ने कहा कि हम कामयाब हुए, यह सुनते ही रमेश बाबु के चेहरे पे अचानक आश्चर्य और खुशी एक साथ आ गई। खुशी तो इस बात की कि बेटा बच गया पर आश्चर्य इस बात का हो रहा था कि पिछले तीन दिन से O- खून के लिये भागादौड़ी की मगर खून नहीं मिला और अब मैं थक हार कर बैठ गया तो अचानक अब खून देने कौन आ गया। रमेश बाबु तुरंत डॉक्टर की तरफ भागे और एक ही प्रश्न किया कि खून कहाँ से आया?
डॉक्टर ने मुख्य दरवाजे की तरफ जाते हुए एक आदमी की तरफ इशारा किया और कहा 'वो लाल शर्ट वाले ने दिया'

रमेश बाबु तुरंत उस आदमी की तरफ दौड़ पड़े और पीछे से पुकारा, 'रूकिये'
वो आदमी जब पीछे मुड़ा तो चेहरा देखकर रमेश बाबु के पैरों तले की जमीन खिसक गई बस मुँह से इतना ही निकला, "तुम!!!!"
'हाँ बाबुजी।।. जब परसों के अखबार में पढ़ा तो बाहर था तुरंत रवाना हो गया, आज पहुँच पाया!! पर अब आप चिंता न करें राजकुमार को कुछ नहीं होगा।।
'मैं तुम्हारे अहसान का कर्ज कैसे चुका पाऊँगा' ,रमेश बाबु बोलें।।
'अरे!! बाबुजी कैसा अहसान!!! मैं तो अपने गुरू के आशीर्वाद की लाज रखने आया हुँ। वो नहीं रहे पर उनका आशीर्वाद आपके बेटे के साथ रहेगा' ,वो युवक अब कुछ टूटती आवाज में बोला।
रमेश बाबु की आँखों में पानी भर आया और वो उस युवक के सामने अपराध के स्वीकार करने की स्थिति में बोलें, 'मुझे माफ कर दो बेटा, मुझसे बहुत बड़ी गलती हो गई, अगर मैनें बेटे जन्म की पार्टी में तुम्हारे गुरू का अपमान न किया होता तो वो दुनियाँ छोड़ कर नहीं जाते'
युवक ने रमेश बाबु के हाथ पकड़ते हुए कहा, 'अरे!! क्या कर रहे है आप?? हम किन्नर तो हर रोज किसी न किसी से अपमानित होते है और हमारा क्या मान अपमान?? यह तो आप बड़े लोगों का होता है।।
'बस बेटा!! अब तो माफ कर दो' ,रमेश बाबु गिड़गिड़ायें।
युवक ने रमेश बाबु के हाथ जोड़कर जानें की अनुमति माँगी तो रमेश बाबु ने कहा, 'बेटा कुछ लेते..........

उनका वाक्य अधुरा ही रह गया कि बीच में ही युवक बोल पड़ा, 'मैं यहाँ समारोह में नहीं आया!! बाबुजी।। और हम खून नहीं बेचते है,!!! अच्छा चलता हुँ।।।
और वो युवक औझल हो गया।।
रमेश बाबु किंकर्तव्यमूढ़ होकर न जानें कितनी देर खड़े रहें।।
©® जाँगीड़ करन kk

8-12-2016

Sorry Damini

बचालो  मुझे  वो पुकार रही हमको,
सपनें में वो आत्मा बुला रही हमको।

इक बिटिया को जन्म देने वाली हुँ मैं,
कोख में मार दुँ इक माँ कह रही हमको।

क्या मैं वहशी नजरों के लिये बनी हुँ,
हर बिटिया चीखकर बता रही हमको।

बहुत स्नेह की जरूरत है उसको तो,
दर्द के मारे ही वो सता रही हमको।

दामन में हमारे कितने दाग है करन,
दामिनी हर पल धिक्कार रही हमको।
©® जाँगीड़ करन kk
16_12_2016___7:30morning

बुधवार, 14 दिसंबर 2016

लिख रहा हुँ

मैं उस दर पे बंदगी लिख रहा हुँ,
छोड़ भरम सारे सादगी लिख रहा हुँ।

जहाँ रास्ते बदल जाते है सफर में,
मोड़ की मैं बदनसीबी लिख रहा हुँ।

जुगनुँ की रोशनाई से परे है जो,
चाँद की वो चाँदनी लिख रहा हुँ।

रिश्तों की अहमियत कब समझोगे,
दिल की मैं तिशनगी लिख रहा हुँ।

हर  हर्फ की अपनी  ही कहानी है,
मैं एक शेर में जिंदगी लिख रहा हुँ।

एक स्वर पर न्यौछावर है करन तो,
मैं  गीत  से  दीवानगी लिख रहा हुँ।।
©® जाँगीड़ करन kk
14_12_2016___07:20morning

शनिवार, 10 दिसंबर 2016

काजल

मोहब्बत के दिन याद आने लगे है।
वो फिर से सज सँवर जाने लगे है।।

जब से कदम रखा है उन्होनें बाग में,
पतझड़ में भी फूल खिल जाने लगे है।

जब जिंदगी की तप रही ऊलझनों में,
अपनी जुल्फों से घटा बरसाने लगे है।

कैसे  रोकुँ  हुस्न से खुद को बचाने,
हर रोज मुझे अब आजमाने लगे है।

भला कोई अब कैसे बच पाये करन,
काजल  से  वो  कत्ल कराने लगे है।
©® जाँगीड़ करन kk
10_12_2016___6:00morning

मंगलवार, 6 दिसंबर 2016

ऊजाले का स्वर

अंधियारी रात के बाद,
तारों की बारात के बाद,
उजाले ने
पैर अपने
पसारे है
तुमने
घुँघट जरा
हटाया है शायद.....

किसी छोर से,
कहीं ओर से,
आवाज आती है,
खनक की,
कि पनघट पर,
तुमने
कदम अपने
रख दिये है शायद......

कहीं दूर से,
उस सदूर से,
हवाएँ,
लेकर आई है,
खुशबु की सौगात,
कहीं तुम में,
जुल्फें अपनी
बिखेर दी है शायद......

किसी पेड़ पर,
या खेत की मेड़ पर,
चिड़िया भी
चहकी है अब,
तुमने स्वर
अपना
उनको
सुना दिया है शायद.......

©® जाँगीड़ करन kk
06/12/2016___6:30AM

फोटो साभार इंटरनेट

शनिवार, 3 दिसंबर 2016

मदहोश दिल

तेरी जुल्फों से खेलों कि खुद पे बारिश कर दुँ,
तेरे दामन में सो जाऊँ खुद को गुलाब कर दुँ।

तेरे होठों के प्याले से जब जाम छलकता हो,
मैं क्यों खुद की राह मयखाने की ओर कर दुँ।

तेरे चेहरे की ही रंगत है या चाँद की परछाई है,
मैं इसे निहारते हुए न्यौछावर सारी रात कर दुँ।

गुलाब खुद तुमसे अपना नूर माँगने आता है जब,
मैं अपनी नजरों का रूख कहीं और कैसे कर दुँ।

जो तुम अपनी पायल का स्वर सुना दो मुझको,
मैं खो के धुन इसकी खुद को मदहोश कर दुँ।।
©® जाँगीड़ करन kk
03/12/2016__20:00pm

गुरुवार, 1 दिसंबर 2016

अरदास

कोई चलता है मोहब्बत की प्यास लिये,
कोई छलता है जिंदगी की आस लिये।

हर पल नजरें दरवाजे पे ही टिकी हुई,
पलकें झपकती है तेरा ही आभास लिये।

अंधेरी रातों में वीराने का तुम्हें डर कैसा,
बेधड़क चलो संग जुगनु का प्रकाश लिये।

कोई मुस्कुराने की वजह तो ढूँढ लें तु भी,
क्यों हर वक्त रहता है चेहरा उदास लिये।

हे जगदाता विश्वविधाता सुन ले तु मेरी भी,
आया करन अब द्वार पे तेरे अरदास लिये।।
©® जाँगीड़ करन KK
01-12-2016__07:30 morning

A letter to swar by music 34

Dear Swar, .................. बहारें तस्वीर से आयें या हकीकत से, जिंदगी तो हर हाल में खिलखिलानी है।। ........ और देखो, इधर बरसात के ब...