इक शायर

घर में रहकर बेघर होता है,
शायर शहर शहर होता है।

सबकी वाही वाही लूटकर
अकेले  में  मगर  रोता  है।।

लोग जिन्हें लफ़्ज समझते,
छालों का वो सफर होता है।

आज यहाँ कल देश पराया,
जानें  कब  किधर होता  है।

शांत समंदर के बैठ किनारे,
खुद  में  वो लहर  होता है।।

किस कश्ती की करूँ सवारी,
कैसा  हरदम  भरम होता है।

जिंदगी तो बन गई है करन,
बस होठों पर तो स्वर होता है।
©® जाँगीड़ करन kk
19_12_2016____7:30morning

टिप्पणियाँ