रविवार, 25 दिसंबर 2016

A letter to swar by music 15

Dear SWAR,

तराना मोहब्बत का सीखने निकला हुँ,
फिर मंजिल से दूर फिसलने निकला हुँ।
होठों के मिलन से जिंदगी की मदहोशी,
कोई महफिल ऐसी सजाने निकला हुँ।।"

देखो इधर साल का अंतिम सप्ताह चल रहा है और साल 2016 को मैंने अपनी जिंदगी का सबसे खराब साल पाया था, जहां साल में पूरे समय सिर्फ बेबसी दिखाई दी और कहीं कुछ टूटती आस ही दिखाई दी। मगर इस अंतिम सप्ताह में जिंदगी को कुछ नया देखने को मिला। हाँ।। हर वक्त खोया खोया रहने वाला मैं शायद तुम्हारे होठों पर छाने लगा हुँ। और मैं वर्तमान में जीने वाला इंसान हुँ आगे क्या होगा फर्क नहीं पड़ता। बस तुम्हारी चेहरे पर मुस्कान अच्छी लगी और पुराने नटखटपन वाले दिन याद आने लगे हैं। और मैं इस पल को जीना चाहता हुँ।
तुम जानती हो ना मैंने इंतजार भी किया है इस दिल के लिए, इस एक पल के लिए इतना लंबा इंतजार किया है। जबकि यह पल गुजर जाएगा थोड़ी ही देर में और फिर वापस बचेगी वहीं बेबसी और इंतजार। मगर मैं इस पल को जीना चाहता हुँ, इसे सजाना चाहता हुँ अपनी कल्पना से सजाना चाहता हुँ ताकि यह पल सदियों तक याद रखा जायें। जहां की हर जुबां पर यह पल छा जायें।
हाँ!!! तुमने ठीक सुना था बिल्कुल...
What?? What what  मत करो साहिबा,  हम यही कह रहे थे सच्ची।।। अब आँखें फाड़ फाड़ के दीवार को घूरना बंद करो, यह आदत है तुम्हारी जानता हूं मैं।।।
और पिछले खत में तुमने कहा कि मैं बदल गया हुँ। लेकिन मेरी जाना!!! मैं नहीं बदला हुँ, मैं आज भी वहीं संगीत हुँ जो सिर्फ तुम्हारे सुर पे बजता हुँ।।
और सुनो!!! मैं वो संगीत हुँ जिसे तुम हर जगह महसूस करोगे, अपने दिल में, घर के आंगन में, खेत की मेड़ पर, या झील के किनारे।।।
कभी आकाश में तारों के बीच मुझे देख पाओगे तुम।।
.......
और!!! सुनो कल कमरे में सामान व्यवस्थित कर रहा था तो कुछ ग्रीटिंग कार्ड्स मिलें हैं, करीब 3 साल हो गए हैं तुम्हारे लिए लाया था,  लेकिन आज तक उन पर कुछ नहीं लिख पाया, तुमने मौका ही नहीं दिया कि मैं कुछ लिखकर तुम्हें दुँ।  हाँ !! बड़े करीने से सजाकर आलमारी में रखें हैं। देखो अगर आकर ले जा सको तो।
और हाँ!!! इनकी एक प्यारी सी तस्वीर खींची है, पत्र के साथ भेज रहा हुँ।
........
तो सुनो पार्टनर!!!
तुम एक बार आओ ना!! फिर से।।
अरे!!!
सुन लिया तुम्हें बहुत काम है, मैं कह तो रहा हुँ कि मैं हेल्प कर दुँगा, तुम आओ तो सही।।
क्या कहा??
लोग क्या कहेंगे!!!
तो सुनो!! कोई कुछ कहे मुझे फर्क नहीं पड़ता है अब।। क्योंकि मैं जिस राह पर निकला हुँ, उसका परिणाम पहले ही मालूम कर चुका हुँ।। और मैं यह जानबुझकर कर रहा हुँ, शायद दिल की भी यही इच्छा है----

          "  किसी सुनी राह पर
              मुसाफिर
              फिर मिलो तो सही.......
              किसी पेड़ की
              छांव में
              उधड़ते ख्वाब सिलो तो।।"

With love & good regards
Yours
Music

©® जाँगीड़ करन kk
25_12_2016____5:00 evening

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