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माँ कहाँ हो तुम

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जो पल चला गया है वो कभी लौटकर नहीं आया,
गौरैया भी उदास है आज उसने गीत नहीं गाया।बहला के देख चुका हुँ दिल को हजार बहानों से,
बचपन का सा मजा फिर भी कहीं नहीं आया।कैसी भागदौड़ में गुम सुम हुआ सा जाता हुँ मैं,
दर्पण भी बोला मुझसे कई दिनों से नहीं मुस्कुराया।आज कार का सफर भी उदासी भरा लगता है,
पिता के कंधे पे मेले में जाने सा मजा नहीं आया।कैसी बैचेनियाँ दिल में घर कर चुकी है न जानें,
कई दिनों से 'स्वर' खुशी का कोई नहीं गुनगुनाया।हर एक दर पर सजदा कर के देख चुका है 'करन',
माँ के चरणों सा सुकुन फिर भी कोई दे नहीं पाया।©® जाँगीड़ करन kk
28/01/2016_22:30 pmचित्र- साभार गुगल

शर्मो हयाँ

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बागों में तो फूल युहीं खिलते है।
भँवरों के दिल भला क्यों मचलते है।।युँ तो बहुत शर्माते है वो महफिल में,
अकेले में पर हमसे बेपर्दा मिलते है।नफरतों की हवा है शहर में तुम्हारे,
लफ़्जों में हम मोहब्बत लिये फिरते है।सिलती है कमीज का टूटा बटन जब,
तराने मोहब्बत के दिल में उठते है।कहाँ तक भाग पायेगी तु हमसे दूर,
हम बाँहें आसमाँ तक पसारे रखते है।जो ख्वाबों में तो रोज ही आते है 'करन',
वहीं 'स्वर' क्यों खफा खफा से रहते है।।@करन जाँगीड़ kk
15/01/2016_20:30 pm#चित्र_साभार_गुगल

दिव्यांग

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काल की गति से कदम आगे रखता हुँ।
बेबस न समझो हौंसले मैं भी रखता हुँ।।माना तुम हुनरमंद हो अपनी जालसाजी के,
दिल में निर्मलता की ताकत मैं भी रखता हुँ।बेशुमार दौलत रख लो तुम अपने हिस्से में,
माँ के पैरों की सुगंध घर में मैं भी रखता हुँ।दुनियाँ की तड़क भड़क से मुझे क्या मतलब,
एक मासुम सा बैचेन 'स्वर' मैं भी रखता हुँ।तुम मुझे कह लो जो मर्जी हो तुम्हारी 'करन',
दिव्यांग हुँ पर जुनुन जीत का मैं भी रखता हुँ।©® करन जाँगीड़ kk
11/01/2016_14:25 pm

पत्थरों का शहर

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आँखें तो नम है मुस्कुराता रहा हुँ फिर भी।
बोझिल सी है राहें चलता रहा हुँ फिर भी।।जानता था मैं कि यह फरेब ही है,
दिल दे बैठा इक मुस्कान पे फिर भी।बिखर गया है दिल आइने की तरह,
तस्वीर को पुरी दिखाता है फिर भी।नींद नहीं है मेरी आखों में यहाँ,
संजोने ख्वाबों को सोना है फिर भी।पत्थरों का शहर है यह तो 'करन',
घायल नहीं हुआ मुसाफिर फिर भी।
©® करन जाँगीड़ kk
10/01/2016_20:00 pmफोटो- साभार गुगल

तस्वीर तुम्हारी

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तेरी तस्वीर को लिये जहन में निकल पड़ा हुँ मैं,
चेहरे की चमक से जहाँ में हीरे के ज्यों जड़ा हुँ मैं।लोग यहाँ किताबों में ढूँढ रहे है इश्क को कब से,
रख के सर गोद में तेरी आँखों में इसको पढ़ा हुँ मैं।मालुम है ना तुम्हें कि रुकने को कभी कहा था तुमने,
देख तो आज भी उसी मोड़ पर इंतजार में खड़ा हुँ मैं।इक तुझ से जो मोहब्बत है साबित करने की खातिर,
सारी दुनियाँ से यहाँ पर खुद अकेले ही लड़ा हुँ मैं।मेरी अमीरी के दिनों में महफिलें जवाँ थी बहुत,
आज गुरबत जो आई तो अकेला आ पड़ा हुँ मैं।समय का तुफान गिराने को बैताब है कब से 'करन',
इक तेरी मुस्कुराहट  के सहारे 'स्वर' जमकर खड़ा हुँ मैं।©® करन जाँगीड़
09/01/2016_21:30pmफोटो- साभार गुगल

आरजु का मुसाफिर

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आरजू का मुसाफिर हुँ मैं चलता रहा हुँ।
ठोकरों में ही सही पर पलता रहा हुँ।।जिन्हें हमने माना था सबसे करीबी खुद के,
अक्सर उन्हीं लोगों से मैं छलता रहा हुँ।लोगों को मैनें टूटते देखा है एक ही चोट मैं,
मैं तो यहाँ लम्हा लम्हा खुद ही ढहता रहा हुँ।सर्द रातों में चांद से तुम्हारा दीदार करने,
अक्सर मैं छत पर युहीं ठिठुरता रहा हुँ।बहुत से गिले शिकवे है तुमसे भी  ए खुदा,
फिर भी देख तेरी इबादत में खड़ा रहा हुँ।बेबसी को लिए आंखों में जीता हुँ 'करन',
फिर भी 'स्वर' खुशी के गुनगुनाता रहा हुँ।©® करन जाँगीड़ kk
08/01/2016_08:30am

A letter to swar 4

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पोस्टमार्टम ऑफ लाइफ............
।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।Dear swar,
सर्वप्रथम तो शुक्रिया कि तुम ने मेरे जन्मदिन पर मुझे शुभकामनाएं दी।
आज लगभग चार महीने बाद तुम्हारी तरफ से कोई लब्ज सामने आया है।
कुछ पल के लिए तो मुझे यकीन नहीं हुआ कि सच में तुमने ही विश किया!
और हां तुमने आज इनबॉक्स भी चैक किया है देखा मेरे लफ्जों को!
ओफ्फ्फो मैं भी पागल हूं तुम्हें क्यों मेरे लब्ज समझ में आएंगे भला!!!!फिर भी आज मैं बहुत खुश हूं। तुमने देखा होगा कि तुम्हारे प्रश्न का जो मैंने उत्तर दिया है उसे अब तक पूरी तरह निभाया है और देखना आगे भी मैं निभाता जाऊंगा!
देख लेना अपना इनबॉक्स जो कि मात्र गवाह है इस बात का तुम्हें बताने का!
बाकी यहां आकर मेरी डायरी देख लेना जो कि खुद-ब-खुद मुझसे अब तो बोलती है कि चलो स्वर लिखो!और तुमने इनबॉक्स में न जाने क्या क्या भेजा है! सारा अंग्रेजी में!!
वह क्या है ना कि मैं हिंदी भाषी हूं। समझ तो आ गया है पर जवाब हम हिंदी में ही देते हैं। किसी कवि की पंक्ति में संसोधन के साथ यह रहा जवाब----
मैं हिंदी भाषी खत हूं प्रिये,
तुम इंग्लिश का ईमेल प्रिये।
मैं गाँव का सादा सा इंसान,
तुम…

A letter to swar by music 3

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Dear swar,आज साल 2016 का पहला दिन है। यह पत्र आज शाम को मैं तुम्हें लिखने जा रहा हुँ। वैेसे मैनें किसी को नववर्ष की शुभकामनाएँ नहीं दी है और न हीं किसी से स्वीकार की है। पर तुम्हें तो जरूर देनी पड़ेगी।
So Happy new year dear......
और क्या चल रहा है। अरे हाँ। पता चला है कि तुम बहुत व्यस्त हो आजकल। जानता हुँ मैं। पर यह व्यस्तता भी नियती का नियम है। मैं तो सबकुछ सहन कर चुका हुँ। तुम पर तो इस तरह की विपत्ति तो नहीं आई ना।
खैर छोड़ो व्यस्तता खत्म होने पर ही सही जवाब दे देना खत का।
और हाँ सुना है कि इसी व्यस्तता के दौरान तुम्हें लंबी यात्रा पर जाना पड़ा। जो घर से बाहर भी न निकलें वो लंबी यात्रा पर?? थेंक गॉड!! सही सलामत वापस आ गये। व्यस्तता खत्म होने पर मुझे भी बताना अपना यात्रा वृतांत!!हाँ।।आज काफी दिनों के बाद मैं अपने खेतों की तरफ गया था। हाँ। वो भी पैदल पैदल। पर फर्क था कि आज मैं अकेला था। इन तन्हा राहों में अकेला जा रहा था । तुम्हारे ही ख्याल में खोया खोया। रास्ते में अचानक कहीं से एक पतंग आई और झाड़ में उलझ गई। और पीछे एक बच्चा दौड़कर आया, कहने लगा कि भैया मेरी पतंग छुड़ा दो ना! पता ह…