Friday, 8 January 2016

आरजु का मुसाफिर

आरजू का मुसाफिर हुँ मैं चलता रहा हुँ।
ठोकरों में ही सही पर पलता रहा हुँ।।

जिन्हें हमने माना था सबसे करीबी खुद के,
अक्सर उन्हीं लोगों से मैं छलता रहा हुँ।

लोगों को मैनें टूटते देखा है एक ही चोट मैं,
मैं तो यहाँ लम्हा लम्हा खुद ही ढहता रहा हुँ।

सर्द रातों में चांद से तुम्हारा दीदार करने,
अक्सर मैं छत पर युहीं ठिठुरता रहा हुँ।

बहुत से गिले शिकवे है तुमसे भी  ए खुदा,
फिर भी देख तेरी इबादत में खड़ा रहा हुँ।

बेबसी को लिए आंखों में जीता हुँ 'करन',
फिर भी 'स्वर' खुशी के गुनगुनाता रहा हुँ।

©® करन जाँगीड़ kk
08/01/2016_08:30am

2 comments:

  1. शुक्रिया पवन सिंह जी।।।

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A letter to swar by music 49

Dear swar, गणित तुम्हारी आदत है, मगर मुझे तो यूं लगता है कि तुम्हें गिनती भी नहीं आती होगी, हैरान होने की बात नहीं है!! तुम्हें कैलेंडर...