शर्मो हयाँ

बागों में तो फूल युहीं खिलते है।
भँवरों के दिल भला क्यों मचलते है।।

युँ तो बहुत शर्माते है वो महफिल में,
अकेले में पर हमसे बेपर्दा मिलते है।

नफरतों की हवा है शहर में तुम्हारे,
लफ़्जों में हम मोहब्बत लिये फिरते है।

सिलती है कमीज का टूटा बटन जब,
तराने मोहब्बत के दिल में उठते है।

कहाँ तक भाग पायेगी तु हमसे दूर,
हम बाँहें आसमाँ तक पसारे रखते है।

जो ख्वाबों में तो रोज ही आते है 'करन',
वहीं 'स्वर' क्यों खफा खफा से रहते है।।

@करन जाँगीड़ kk
15/01/2016_20:30 pm

#चित्र_साभार_गुगल

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