Monday, 11 January 2016

दिव्यांग

काल की गति से कदम आगे रखता हुँ।
बेबस न समझो हौंसले मैं भी रखता हुँ।।

माना तुम हुनरमंद हो अपनी जालसाजी के,
दिल में निर्मलता की ताकत मैं भी रखता हुँ।

बेशुमार दौलत रख लो तुम अपने हिस्से में,
माँ के पैरों की सुगंध घर में मैं भी रखता हुँ।

दुनियाँ की तड़क भड़क से मुझे क्या मतलब,
एक मासुम सा बैचेन 'स्वर' मैं भी रखता हुँ।

तुम मुझे कह लो जो मर्जी हो तुम्हारी 'करन',
दिव्यांग हुँ पर जुनुन जीत का मैं भी रखता हुँ।

©® करन जाँगीड़ kk
11/01/2016_14:25 pm

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