Friday, 2 June 2017

अच्छा तो मैं चलूं

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बचपन से वो दोनों साथ खेलें थे, एक ही गली के अलग अलग छोर पर मकान थे उनके, स्कूल भी एक ही था दोनों का। पढ़ाई में भी दोनों अव्वल, अक्सर होमवर्क भी साथ किया करते थे, अच्छे दोस्त की तरह थे। कभी कभी मन करता तो दोनों गांव के बाहर पानी की टंकी पर चढ़कर बैठ जाते और घंटों आसमान को घूरते हुए जानें क्या बातें करते रहते, अपने भविष्य के बारे एक दूसरे की बातें और सपने जानने की कोशिश करते थे शायद, हां, कभी दोनों के मन में एक दुसरे के प्रति कोई अलग ख्याल नहीं आया, क्योंकि वक्त के तो जैसे पंख लग गए और........
मयंक को कॉलेज की पढ़ाई के लिए अब बाहर जाना पड़ा और उधर देविका क्योंकि लड़कियों को ज्यादा पढ़ाया नहीं जाता तो स्कूली शिक्षा के बाद उसकी पढ़ाई रोक ली गई, और कुछ समय बाद ही देविका की सगाई कर दी और शादी की तारीख भी तय कर दी लेकिन अभी तक मयंक तक यह खबर नहीं पहुंची थी, इधर घरवालों के आनन फानन में लिये निर्णय से देविका भी परेशान थी,  मगर करती भी क्या? मयंक तक समाचार पहुंचायें कैसे?
क्योंकि उन दिनों मोबाइल फोन का चलन तो था नहीं, पर मयंक के घरवालों से खबर मिली की मयंक उसकी शादी के एक दिन पहले ही शहर से परीक्षा देकर लौट रहा है, उसकी तो जैसे मन की मूराद पूरी हो गई वो अब शादी की तैयारी से ज्यादा मयंक के आने का इंतजार करने लगी।
और उस दिन सुबह से ही वो शहर से आने वाली हरेक बस को देखने लगी शाम की बस से​ मयंक आया तो वो दौड़ी और झट से हाथ पकड़​कर उसे पानी की टंकी पर ले गई। मयंक तो कुछ समझा ​ही नहीं कि हो क्या रहा है।
वहां ऊपर पहुंच कर फिर मयंक बोला," आखिर कुछ बोलोगी भी क्या हुआ है और मुझे यहां क्यों लाई?"
देविका एक ही झटकें सारी बात बता दी और कहा कि कल सुबह ही शादी है।
मयंक हतप्रभ होकर देविका को देखता रहा मगर फिर संभल कर बोला, "अच्छा है ना, खुश रहना और अपने पति का ख्याल रखना।"
देविका की आवाज में अब एक शांति सी थी, "तो तुम मेरे बिन जी पाओगे?", उसने अपने हाथों को उन हाथों से खींचते हुए कहा।
और वो बिन जवाब के ही चुपचाप आसमान को घूरता रहा, न जानें वो कब चली गई पता ही नहीं चला। बहुत देर बाद पटाखों की आवाज से उसका ध्यान टूटा, उसने नीचे आकर देखा तो..............
और उस दिन से उसके चेहरे पर एक उदासीनता छा गई, लोग कहने लगे कि शहर में पढ़ने से छोरे में अक्ल आनी शुरू हो गई।
©®करन
02_06_2017__21:00PM

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