Wednesday, 18 April 2018

A letter to swar by music 46

Dear swar,
इधर कई दिनों से एक घटनाक्रम की नींव तैयार हो रही थी, मुझे मालूम था कि यह होना है और होना जरूरी भी था क्योंकि वक्त के साथ कुछ बदल जाता है.....
वो कहते हैं ना....
जिंदगी किसी एक के भरोसे नहीं रूकती,
मुसाफिर कोई और साथी भी हो सकता है।
.........
अक्सर मैं रात को छत पर बैठकर तारों को देखा करता हूं, ठीक उसी तरह जैसे कि तुमने कहां था....
तुमने बताया था ना कि उस चमकते तारे के ठीक सामने वाले तारे से कुछ दूरी पर एक और तारा है जिस पर उस चमकते तारे का ध्यान नहीं जा रहा....
मैं अपनी बात करूं तो इस ध्यान का कोई औचित्य नहीं है क्योंकि ऐसे तो असंख्य तारे है उस चमकते तारे के चारों ओर.......
मगर उस तारे की नजर हमेशा से सिर्फ ठीक सामने वाले तारे पर ही रही है और जब तक ब्रह्मंड है तब तक उस तारे की सोच तो यहीं रहनी है!!
मैं दुसरे तारों की बात ही क्यों करूं?
उन्हें लंबवत के साथ साथ क्षितीज पर चलना आता है वो चल दिए.... यह उनकी विशेषता है और हैं तो अच्छी बात है।
मैं क्या कहना चाहता हूं भली भांति जानते है आप....
क्योंकि वो तारा उसकी परिस्थिति और मन के विचारों से अवगत है, चमकना उसकी नियति नहीं है वो तो बस सूर्य के प्रकाश से चमकता है....
दिन के उजाले में ये सब तारे कहीं खो जाते हैं, यह हमारे लिए गायब हुए हो पर इनका वजूद तो होता ही है ना...
जैसे कि मैं...
बहुत बार लोगों की नजर में कुछ ज्यादा ही आता हूं, लोग तरह तरह के सवाल करते हैं...
पर कभी कभी मैं नज़र नहीं आता उनको, वक्त का कौनसा चश्मा लगा कर देखते हैं वो,
पता नहीं!!
!!!!
हां,
मैं कुछ कह रहा था कि कुछ घटने वाला है यहां, कुछ ऐसा जो...... मेरी जिंदगी में कोई तुफान ला सकता है शायद...
या वो खामोशी आ सकती है जो मरने तक को मजबूर कर दें........
पर मैं,
मैं जानता हूं कि सब कुछ होना है मैं परवाह नहीं करता, बस मुझे तो उस चमकते तारे सा रहना है जिसकी नज़र सामने वाले तारे पर है!!
देखना एक दिन वो सामने वाला तारा कुछ तो जरूर करेगा..........
।।।।।
खैर यह सब मेरी जिंदगी का हिस्सा है, मुझे परवाह नहीं अब किसी भी परिस्थिति की मैं सिर्फ आनंद की पराकाष्ठा हुं, मैं भावनाओं का सैलाब भी हुं....
।।।।
हां, अक्सर लोग एक सवाल करते हैं कि कौन है वो?
तो तुम कहो तो अगले पत्र में तुम्हारा जिक्र करूं?
अनुमति दो तो करेंगे...
।।।।।
बाकी,
हम मस्त है,
आशा है कि आप भी मज़े में होंगे!!

वैसे CCTV की नज़र तेज हो गई है, जरा बचके।
😜

With love

Yours
Music
..
©® जांगिड़ करन KK
18/04/2018__7:30AM

Friday, 6 April 2018

खेल प्रिये

तुम खिड़की स्लाइडर वाली हो,
मैं टूटा फूटा किवाड़ प्रिये..
तुम मार्बल सी प्लेन प्लेन,
मैं आंगन का उबड़-खाबड़ ढाल प्रिये..
🤦‍♀😁🤦‍♀
ओके सॉरी
तुम आर सी सी की स्टाइलिश छत,
मैं टूटा फूटा खपरैल प्रिये।
तुम डाइनिंग टेबल का हुनर हो,
मैं देशी थाली में जमा मैल प्रिये।
#सॉरी
🤦‍♀😍🤦‍♀

तुम रेलिंग कांच की चमक-दमक,
मैं पुरानी ईंट की दीवार प्रिये।
तुम स्टेंडर्ड किचन जैसी हो,
मैं देशी चुल्हा धुआँदार प्रिये।।
🤦‍♀🤔🤦‍♀
अच्छा सॉरी

चलो खत्म करें ये खेल प्रिये,
तुम्हारी छूट जायेगी रेल प्रिये।
मुश्किल है अपना मेल प्रिये,
यह प्यार नहीं कोई खेल प्रिये।
😜🤦‍♀😜
बस खत्म

#जांगिड़ करन KK

Tuesday, 3 April 2018

Recall of love

धनुष की प्रत्यंचा को जितना खींचते हैं लक्ष्य उतना ही सटीक और तीव्रता से भेदा जा सकता है, मगर यह भी है प्रत्यंचा को इतना अधिक भी नहीं खींचना चाहिए कि प्रत्यंचा ही टूट जायें.
और यहीं बात रिश्तों में भी लागू होती है,आपका हर बात पर सफाई लेना या देना प्रत्यंचा खींचने जैसा है, बिल्कुल इन बातों से रिश्ता मजबूत होता है, एक दूसरे की परवाह करने की प्रवृत्ति बढ़ती है.
मगर इसकी अपनी कुछ मर्यादाएं होती है.
इसलिए ध्यान रखें.
और किसी की अहमियत उसके न होने पर समझने से बेहतर है कि उसके होने पर ही समझ लें।
एक बात और है...
रिश्ता सिर्फ सच की बुनियाद पर टिक सकता है, झूठ बोलने की आदतें बहुत महंगी साबित होती है जब कभी वह बाहर आ जायें और झूठ को बाहर आना ही है........
इसलिए अपनी अहमियत अगर सामने वाले को समझानी है तो सिर्फ सच बोलिए... और झूठ बोलते ही क्यों?
किस बात का डर अगर आप सही है तो!!
प्रेम के रिश्ते में शंकाओं और किसी तरह की लुकाछिपी की कोई जगह नहीं होती है, सामने वाले का विश्वास कितना है आप पर; इस बात पर गौर कीजिए कभी.... यह नहीं कि आप ज्यादा होशियार है उनसे और जो चाहे कर सकते हैं.. माना कि वो आप पर विश्वास के कारण कुछ नहीं कहते वो या आपको खोने का डर हो, हां डर!! उनके इस डर को उनकी ताकत बनाइये न कि मजबूरी....
फिर अगर आप कुछ छुपाते हैं तो......

1. अगर आप आस्तिक है तो जानते ही होंगे कि आपके कर्मों का परिणाम आपको मिलना है...
2. आप नास्तिक है तो विज्ञान तो मानते होंगे, टेस्ट ट्यूब में जैसा मिश्रण डालेंगे.. परिणाम वैसा ही मिलना है ऐसे ही....
सच+सच= आत्मसंतोष
सच+झूठ= भ्रम
झूठ+झूठ= द्वंद्व
& Final in next post
जिए.
3. अगर आप मेरी तरह आस्तिकता और नास्तिकता के भंवर में उलझे हैं तो....
जो सर्वशक्तिमान है उसके पास या वो खुद 10 अरब मस्तिष्क( एक मस्तिष्क = 35000 सुपर कंप्यूटर) से मिलकर बना हुआ है, आपकी हर पल, हर हलचल की रिकॉर्डिंग करता है वो, हर पल की डिटेल के अकॉर्डिंग अपना next command ऑटोमैटिक जारी करता है...
_KK_

Sunday, 25 March 2018

उलझन कैसी है

उलझती जो जूल्फें तेरी
सुलझा भी लेता मैं,
मगर
क्या जिंदगी का
उलझना
जरूरी था।
............
बातों का उलझना
सुलझ
सकता है,
मगर
क्या कहानी का
उलझना
जरूरी था।
............
रिश्तो की तो
उलझन
सुलझें,
मगर
क्या नयनों का
उलझना
जरूरी था।
..............
ज़िक्र वक्त का
ही हो तो
फिर भी
जायज है,
मगर वक्त से परे
क्या परों में
उलझना जरूरी था,
...........
बात सिर्फ
मोहब्बत
की हो तो ठीक है,
मगर दुनिया बेगानी लगे
क्या ऐसे
इश्क में
उलझना जरूरी था।
..........
गांव शहर
जंगल
बग़ीचा
तो अच्छी बात है,
मगर आसमान में उड़ती
चिड़िया
के
दिल में
उलझना
जरूरी था।
©® जांगिड़ करन DC
25_03_2018___20:30PM

Saturday, 17 March 2018

A letter to swar by music 45

Dear swar,
.................
मौसम की मस्ती और मन की तरंगों का जब मेल हो जाये तो जिंदगी के समंदर में मौजों की रवानी सी आती है....
लेकिन किसी उदास मन को कोई मौसम नहीं सुहाता, दिल का कौना जब जख्मी हो तो महफ़िल भी खाली खाली सी लगती है........
बसंत कब आया कब गया मालूम नहीं....
इधर हवाओं में जब जब बेरुखी सी छाई तो...
...
अक्सर खिड़कियां अपने पर्दे को हटाकर कमरे के अंदर झांकती है तो उदास हो जाती है, तुम्हारा न होना कितना अखरता होगा उनको...
घर का आंगन भी उदास है जानती हो ना तुम्हारे पैरों के निशान अब फीकें पड़ रहे हैं इस पर... ये उन निशानों को हमेशा के लिए संजोकर रखना चाहता है, पर वक्त की रेत मिटाती जा रही है उनको.... बस उनको इंतजार है कभी तुम आओ और निशान फिर ताजा हो जायें... तुम्हारे हाथ की रंगोली तुम्हारे बिन रंगहीन लगती है..... अरे!! तुमने उस कहां था ना कि रंगोली की रेखाएं अपनी जिंदगी के सफ़र को तय करेगी,
मैं ढूंढ रहा हूं मगर वो रेखा नहीं मिल रही जो इस सफ़र में तुम्हें मेरे साथ रखें तो तुम आकर मेरी मदद कर दो ना...
मैं तुम्हारे बिन सिर्फ काली रेखाएं देख पा रहा हूं जो आगे अंतहीन अंधेरे की तरफ जाने का इशारा करती है... तुमने वो लाल पीली रेखाएं जानें किधर बनाई है... आकर ढूंढकर बता दो..... यह रंगोली भी तुम्हारी तरह एक पहेली बन गई है जो मुझसे नहीं सुलझ रही है.... आओ... सुलझा दो ज़रा... तुम्हारी जुल्फें तो मैं सुलझा लूंगा!!!!
और सुनो तो,
ये घर की हवाएं भी जलने लगी है लोग कहते हैं कि गर्मी आ गई है इसलिए ऐसा हो रहा है मगर मैं तो यह सोच रहा कि तुम नहीं हो इसलिए ऐसा हो रहा है.... तुम अगर यहां हवा में गीली जुल्फें लहराओ तो हवाएं अपने आप ठंडी होगी ना! इन हवाओं को भी तुम्हारा इंतज़ार है ताकि इनका रूखापन दूर हो सकें और इनमें ठंडक और खुशबू आ सकें।
देखो,
पतझड़ चल रहा है पेड़ पौधों से पते गिर रहें हैं बेहिसाब गिर रहें हैं.... इन सुखे पत्तों को जब हवा इधर उधर सरकाती है तो एक मधुर आवाज आती है मगर यह मधुर आवाज एक उदासी से भरी होती है। दुख की वजह बिछुड़ना, पत्तों का पेड़ से अलग होना!
मगर देखो ना,
ये पत्ते उदास हो कर भी मधुर धुन सुना रहे हैं!! मैं भी तो यहीं करता हूं ना!!!
......
चलो
गीत कोई गाये,
हवाओं को सुर बना लें,
पत्तो की खनखन को थाप बना लें,
आओ,
मुस्कुरा लें,
इस रूखे मौसम के
चेहरे पर
हंसी तो
बिखेर दें...
उदासियों की चादर फेंक,
आसमान में रंग भर दें कि
फिर
खुशियों की बारिश हो....
फिर पेड़ पौधे हरे भरे हो...
फिर चिड़िया चहकें
और
फिर
जिंदगी मेरी जन्नत हो!!!
.....
सुनो,
आज अमावस्या है,
चांद नहीं होगा आसमां में,
तुम छत पर आ जाना जरा...
मैं चांदनी देखना चाहता हूं
अमावस्या को भी!!

With love yours
Music

©® जांगिड़ करन KK
17-03-2018__06:00 AM

Thursday, 1 March 2018

दोहे- होली

बादळ आज थु आवज्ये, बरसा दीज्ये रंग।
होळी खेले गोरड़ी, मैं भी खेलूं संग ।।

पिचकारी ले आवज्ये, लाज्ये रंग गुलाल।
मैं तो थारे रंग में, रंगस्यु मारा गाल।।

होली के रंग जांगिड़ करन के संग।
#Happy_Holi

Monday, 19 February 2018

शून्य या अनंत

मैं
शून्य हुं
या
हुं अनंत......
खुद को भी
मालूम नहीं!!
पेड़ से
टूटकर पता
गिरता है....
हर तरफ से अकेला,
दर्द से कराहता..
बस
सूखकर पीला पड़ता जाता है....
जानें किसकी आस में
फिर भी
इधर उधर उड़ता
भटकता है।
खुद के वजूद को
बचाने खातिर
हर क्षण वो
लड़ता है....
पता नहीं
कोई
पशु कब चबा जायें उसको
और
शुन्यता को चला जायें वो....
या
कोई
जलाकर राख बना दें..
वो तो फिर भी
सही है..
जलना जरा मुश्किल है,
पर
अनंत युहीं नहीं
बना जाता....
राख होकर
हर जगह बिखर जाना है..
हर पौधे में
समाकर
खुद को
बचायें रखना है....
बस
देखना अब यह है
नियती
किस ओर
लें जाती है
शुन्य होने को
या
अनंत का
मार्ग दिखाती है........
मैं
पता टूटकर जानें
किसकी
तलाश
करता हुं.....
छलने का ही दौर है,
खुद को ही
छलता हुं....
©® जांगिड़ करन kk
19-02-2018__07:00AM

A letter to swar by music 53

डियर स्वर, दिन ढल चुका है। शहर की शोरगुल भरी सड़कें अब धीरे-धीरे शांत होने लगी हैं। दिनभर लोगों की आवाजाही, गाड़ियों के हॉर्न और भागती-दौड़त...