बस तु हीं तु

ना नींद आती है रातों को, ना दिन में चैन आता है,
सखी री यह क्या हुआ जाता है, हर तरफ वहीं नजर क्यों आता है|

क्यों आज मुझे मौसम भी बेईमान सा लगे है,
यह चाँद भी जरा उँघता हुआ सा लगे है|
क्यों होती है तमन्ना हरदम ही जुल्फें खुली रखने की,
ये मेरा दिल भी क्यों मचलता हुआ सा लगे है||
सखी री यह...................................................

ये हवायें भी क्यों मुझसे बदमाशियाँ सी करती है,
ये मेरी चुनर भी बार बार क्यों जाती सरकती है|
क्यों छा गई है अजब सी लाली मेरे गालों पे,
ये मेरी आँखे भी क्यों उसके दीदार को तरसती है||
सखी री यह............................................

ये मेरे हौंठ भी क्यों लाल सुर्ख हुए जाते है,
ये मेरे कंगन भी क्यों बेवजह खनखनाते है|
क्यों हर पल ही छाई रहती है मेरे तन में मस्ती सी,
क्यों मेरे लब हर पल उसी का नाम गुनगुनाते है||
सखी री यह.............................................

जिंदगी क्यों पहले से ज्यादा हसीन सी लगती है,
क्यों मैं हर पल ही ख्वाबों में खोई सी रहती हुँ|
क्या मुझको मुझसे ही चुराने लगा है करन,
मैं प्रीत कर बैठी सखी आज तुझे दिल की बात कहती हुँ||
सखी री यह.....
©® jangir karan dc

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