मंगलवार, 18 अगस्त 2015

ये कैसी आजादी?

यहाँ बचपन कहीं पे चाय के ठैले पे कैद है,
तो कहीं खिलोने की दुकान पर खिलोनों को घुरते हुए कैद है|
कहीं पे बचपन मजबूर है करने को मजदूरी,
कहीं पे बचपन अखबार वाले छोटु के रूप में कैद है||

कोई युवा यहाँ किसी की बाहों में कैद है,
तो कहीं पे रोजगार की तलाश में कैद है|
कहीं पे दबा हुआ है कुछ अरमानों की चाहत में,
तो कहीं किसी बेदर्दी की यादों में कैद है||

यहाँ के अधेड़ दिनभर के कामकाज में कैद है,
तो कोई यहाँ ऑफिस की भागदौड़ में कैद है|
इन पर बोझ है बच्चों की ख्वाहिशे पुरी करने का,
तो कोई बिटिया के घर संसार के सपनों में कैद है||

बुढ़ापा यहाँ वृद्धाश्रमों में कैद है,
तो कहीं पे बहु के तानों में कैद है|
कोई तड़पता है यहाँ खाँसी की दवाई के लिये,
तो कहीं पे दो टूक रोटी के लिये कैद है||

यहाँ औरत एक मशीन की तरह कैद है,
तो किसी के सपने दहेज की प्रताड़ना में कैद है|
कहीं पे डर से सहमी हुई सी है दामिनी,
तो कोई तेजाबी हमले के भय में कैद है||

यह कैसी आजादी? जहाँ हर कोई कैद है,
मैं समझा नहीं अब तक, क्यों यह मासुमियत सी कैद है|
खुद 'करन' को गुमान था खुद की आजादी का,
आज वो भी एक परिंदे की जद में कैद है||
©® Karan dc

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