गुरुवार, 13 अगस्त 2015

न जाने क्यों

रेत पर अक्सर
लिख देती है वो
नाम मेरा
फिर कुछ बुदबुदाती है
न जाने क्या?
फिर अचानक
मिटा देती है
हथेली से नाम मेरा
फिर से लिख देती है
वही नाम
फिर बुदबुदाना
हाँ इस बार
मुसकुराहट है चेहरे पे उसके
न जाने क्यों?
मैं दूर से ही
देखता हुँ सबकुछ
और मुस्कुरा देता हुँ
मन ही मन में
न जाने क्यों?
©® karan DC

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

A letter to swar by music 37

Dear swar, ........ Happy birthday... हां, तुम्हारा जन्मदिन भला हम कैसे भूल सकते हैं तुम भी जानती ही हो... दिल से आज भी एक ही दुआ है कि ...