गुरुवार, 15 अक्तूबर 2015

दर्द का दरिया

मेरे साथ राह में तुम नहीं चल पाओगे,
मैं काँटों से छलनी हुँ तुम भी हो जाओगे|

मैं मुरझाया फूल हुँ कुचलने से फर्क नहीं पड़ता,
तुम कोमल सी कली हो सहन नहीं कर पाओगे|

रख सपनों को ताक में श्वास लें रहा हुँ मैं,
तुम मीठे सपनों को कैसे भुला पाओगे||

अगर जो सोचा मुझको कभी मोहब्बत की नजरों,
जिंदगी से तुम अपनी बेशक नफरत कर जाओगे||

मैं दरिया हुँ दर्द का करन तुम मौज समंदर सी,
बोलो क्या तुम फिर भी मुझको खुद में समा पाओगे||

©® करन

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